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“माँ तुम गलत थी. उसने मुझे धोखा दिया.”

वो हमेशा से अच्छे दोस्त रहे थे मगर फिर भी क्यों नहीं उसे कभी भी कोई आभास हुआ?

उसने ज़ोर से दरवाज़े को अपने पीछे बंद किया. मैं कार के इंजन के स्टार्ट होने की आवाज़ सुन सकती थी. इंजन की आवाज़ से समझ आ रहा था की वो गाडी पर अपना गुस्सा निकाल कर तेज़ी से उसे हमारे बरामदे से निकाल रहा था.

मैं वहीं सोफे पे बैठ गई. अभी आँसूं बहने शुरू नहीं हुए हैं मगर मुझे यकीन है की वो भी जल्दी ही आएंगे.

वो मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकता था?

हमारी शादी की दसवीं सालगिरह अभी पिछले हफ्ते ही तो थी.
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क्या ऐसा कुछ भी था जो मैं उसके लिए नहीं करती? क्या मैंने उसे कभी कोई भी कारण दिया है मुझे छोड़ कर जाने का? क्या इतने सालों से हम दोनों खुश नहीं थे? हाँ, हम दुसरे दम्पतियों की तरह लड़ते भी थे मगर फिर हमारी सुलह भी तो जल्दी ही हो जाती थी.

वो कॉलेज में मेरा सबसे अच्छा दोस्त था. वो उन लोगों में से था जो मुझे देखते ही मेरे बारे में सब कुछ बता देता था और जिसके साथ मैं अपने मन की सारी बातें शेयर कर सकती थी. हम दोनों की शादी हमारे लिए सबसे सहज और आसान निर्णय था.

जब मैं शादी के बाद उसके घर आई तो मुझे बहुत ही अजीब लगा. एक बहुत बड़ा घर और उससे बड़ा उसका परिवार जहाँ एकांत में समय मिलना बिलकुल नामुमकीन था. कई बार तो बच्चों के शोर में अपनी खुद की आवाज़ भी सुनाई नहीं देती थी. ये बिलकुल भी मेरे छोटे से परिवार जैसा नहीं था जहाँ मैं और माँ एक दुसरे के साथ बैठ कर घंटों आराम से बातें करते थे.

जब मैंने माँ से इस बात की शिकायत की तो उन्होंने बस एक ही बात कही, “अगर तुम उसे प्यार करती हो तो ये सारी बातें कोई मायने नहीं रखती.”
उनकी बात सही थी. मैंने धीरे धीरे उसके अंकल को शांत करने का काम किया फिर बच्चों को थोड़ा प्यार से खेलना सिखाया और जल्दी उनके रंग में रंग गई. मैंने उसकी माँ को अपनी माँ की तरह ही प्यार और आदर दिया और बदले में उन्होंने भी मुझे प्यार दिया.

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और उसकी आँखों की चमक से साफ़ झलक रहा है की उसे ये सब कितना अच्छा लग रहा था. उसका और मेरी माँ का रिश्ता बहुत प्यारा था. दोनों ही बहुत हंसी मज़ाक करते और लम्बी गप करते जब भी हम माँ से मिलने घर जाते थे.

माँ के गुजरने के एक हफ्ते पहले, उन दोनों ने हॉस्पिटल में काफी देर बातें की थी. बाद में उसने मुझे बताया था की उन्होंने उससे कहा था की उन्हें अपने बेटों की फ़िक्र है मगर अपनी बेटी की नहीं. क्योंकि उन्हें पता था की उनके पीछे कोई है जो उनकी बेटी का ध्यान रखेगा.

आप गलत थे, माँ. वो वैसे नहीं है जैसे आपने उसे सोचा था.

वो कब बदला और मैंने कभी ध्यान क्यों नहीं दिया?

शायद मैं अपने ही ख्यालों में इतनी गुम थी की मैं अपनी कल्पना को ही असलियत मान रही थी. अपने बच्चे को बड़े होते देखना, उसकी छोटी छोटी उपलब्धियों पर खुश होना और हमारा घर बसाने में ही तो मैं बिलकुल लीं थी.

मगर सबसे बुरी बात ये थी की उसने मुझे कभी कोई चेतावनी तक नहीं दी.

वो इतने दिनों तक इसे राज़ कैसे रख पाया? क्या मैं उसे इतना कम जानती थी की मुझे कुछ आभास तक नहीं हुआ. मेरी छटी इंद्री ने क्यों नहीं मुझे आगाह किया था?

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wife waiting

आज तो जैसे हम दोनों ने सब कुछ प्लान ही किया था. जब घर के सारे लोग एक शादी में गए थे, तब वो ऑफिस से वापस आया और हमने आज फाइनल बातें की.

उसने मुझे साफ़ साफ़ शब्दों में कहा की वो इस तरह नहीं जी सकता है. उसे चुनना होगा की कौन उसका भविष्य होगा और कौन उसका अतीत. मेरे मन का गुबार अब बह चला और मैं चिल्लाने लगी. मैंने उसे कह दिया की वो मुझे हमेशा के लिए छोड़ कर चला जाये.

और वो व्यक्ति जिसका साथ ज़िन्दगी भर के लिए होना था, वो मुझे छोड़ कर चला गया.

दोपहर हो चली थी और परिवार वाले अब वापस आने वाले ही थे.

अब समय आ गया था की मैं अपनी ज़िन्दगी अकेले ही सम्भालूं, बिना उसके हाँथ और साथ के.

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अब वो वापस कभी नहीं आएगा. मुझे पता था की अब ज़िन्दगी में कुछ भी पहले जैसा नहीं होगा.

इस सोच भर से वो रुके हुए आँसूं बहने लगे. मेरी हलकी सिसकियाँ कब तेज़ हो गईं, मुझे पता भी नहीं चला. मैं बहुत ज़ोर ज़ोर से रोने लगी, अपनी उस ज़िन्दगी के खो जाने के दुःख में मैं रो रही थी. तभी एक कार हमारे घर के सामने आकर रुकी. मुझे लगा की परिवार वाले वापस आ गए होंगे.

मैं जल्दी से अपना मुँह पोंछ कर काम करने लगी. मुझे क़दमों की आहट आ रही थी मगर मैंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

और तभी उसकी बाहों ने मुझे पीछे से पकड़ लिया, बिकुल पहले जैसे. उस स्पर्श मात्र से मैं समझ गई की सब ठीक है.

उसने अपना भविष्य चुन लिया है. और वो भविष्य मैं हूँ.

माँ को सही पता था.

(जैसा सुधीर नायर को बताया गया)
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उसके पति ने तर्क दिया, ‘‘किसी के जीवन में दूसरी औरत होना सफलता का हिस्सा है”

“माँ, प्लीज हमें छोड़ कर मत जाओ!”

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