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मैं दुबारा शादी अपने लिए करना चाहती हूँ, अपने बेटे के लिए नहीं

by Jaibala Rao
Mother Son Silhouette. Divorce and remarriage are not easy but this lady is thinking of it.

समाज और हमारे आस पास के लोग हमेशा लोगों के जीवन में एक ही चीज़ होने की उम्मीद करते हैं: सैटल होने की। पुरूषों के लिए, इसका अर्थ है एक अच्छे वेतन वाली नौकरी पाना और स्त्रियों के लिए, यह सिर्फ शादी करने पर ही हो सकता है। कभी-कभी, प्रगतिशील लोग भी स्त्रियों को इसी मापदंड द्वारा परिभाषित करते हैं। तो यही लोग उस स्त्री पर क्या प्रतिक्रिया देंगे जिसने ‘सैटल होने’ के दो साल बाद ही तलाक ले लिया। और उपर से, उसे अपने बेटे को भी पालना है क्योंकि उसके पूर्व पति ने पिता होने का फर्ज निभाने से इनकार कर दिया था।

मैं तीन साल पहले इस सब से गुज़री। जिस दिन मेरा तलाक तय हुआ, मुझे लगा जैसे शादी के आघात से स्वतंत्रता मिलने का जश्न मनाउं। लेकिन विडंबना यह है कि उसी दिन वैवाहिक साइटों पर दूसरे आदर्श पुरूष की खोज शुरू हो गई। हालांकि मेरे माता-पिता ने कभी मुझ पर शादी करने का दबाव नहीं डाला लेकिन उन्होंने मेरे बेटे के प्रति मेरी ज़िम्मेदारी ज़रूर याद दिलाई। ‘‘बेटे के बारे में सोचो” वाले भाषणों ने मुझे दूसरी शादी करने के लिए सहमत करवा दिया, हालांकि अनिच्छा से ही।
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मैं तुरंत दूसरी शादी नहीं करना चाहती थी क्योंकि मैं एक एकल माँ होने के विचार से निपटना चाहती थी, अपने जीवन के लक्ष्यों को समायोजित करना चाहती थी और स्वयं की खोज करना चाहती थी। शादी तो दूर की बात है, मैं तो एक रिलेशनशिप के बारे में भी नहीं सोच रही थी। मेरा ध्यान बंट चुका था और बहुत कुछ एक साथ हो रहा था। हालांकि, मुझे बार-बार कहा जा रहा था, बेटा अभी छोटा है और वह जल्दी ही एडजेस्ट कर लेगा।” यह बात मेरी समझ में आ गई और मुझे महसूस होने लगा कि समय निकला जा रहा था।

वैवाहिक साइटों में से एक व्यक्ति ने रूचि व्यक्त की। मेरे माता-पिता ने अच्छी तरह उसकी जांच पड़ताल कर ली और फिर हरी झंडी दिखा दी, हमने जल्द ही चैटिंग शुरू कर दी। शुरू में मैं अनिच्छुक थी, लेकिन बाद में मुझे उससे लगाव हो गया। उसे मेरे बेटे के बारे में पता चला और वह उसे अपनाने के लिए तैयार था, या फिर मुझे ऐसा लग रहा था। फिर एक दिन उसने कहा, ‘‘मैं तुम्हारे बेटे की देखभाल नहीं कर सकता, तुम्हें उसे एडोप्शन के लिए दे देना चाहिए। वह मेरे जीवन में एक समस्या बन जाएगा।”

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मैं सोच में पड़ गई कि दो वर्ष का बच्चा कैसे किसी के लिए समस्या हो सकता है, खासतौर पर उसके लिए जो उसे जानता भी नहीं है? यह होने से पहले, मैं अनिश्चित थी कि क्या मैं जल्दी तलाक के बाद भी कभी हतोत्साहित हो सकती थी, लेकिन उस दिन मुझे अहसास हुआ कि ऐसा संभव था।

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हालांकि मैं अपने माता-पिता की खातिर आगे बढ़ने का प्रयास कर रही थी, लेकिन हर बार जब मैं उससे मिलती थी, मैं दुनिया के सामने चिल्लाकर कहना चाहती थी, ‘‘मेरा बच्चा कोई ज़िम्मेदारी नहीं है”।

तब मैंने अपना फोकस, भावी संबंध में मेरी भूमिका की बजाए मेरे बेटे की भूमिका पर स्थानांतरित कर दिया। जिस भी व्यक्ति से मैं बात कर रही थी उसे रिलेशनशिप के लिए एक शर्त दे रही थी, ‘‘तुम्हें मेरे बेटे को अपनाना होगा।”

मैंने ऐसे बहुत से पुरूषों से बात की जो मुझसे अपेक्षा रखते थे कि मैं उनके बच्चों को अपने बच्चों की तरह स्वीकार करूं लेकिन साथ ही वे यह चाहते थे कि मैं अपने बेटे को छोड़ दूँ। एक पुरूष ने तो इतना स्पष्ट सौदा भी रख दिया, ‘‘मैं एक बात स्पष्ट रूप से बता दूँ। मैं तुम्हारे बेटे पर एक पैसा भी खर्च नहीं करूंगा। वह मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है।”

और मैंने यह सब सुन लिया क्योंकि मैंने उससे यही अपेक्षा की थी।

अंत में मैंने फोकस खो दिया और हार मान ली। मैंने मेरे माता-पिता से कहा कि मुझे थोड़ा और समय दें यह जानने के लिए कि मैं कौन हूँ और वास्तव में मैं जीवन से क्या चाहती हूँ और मैं शादी करना चाहती भी हूँ या नहीं।

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और फिर एक दिन, मेरे अंदर से आवाज़ आईः मुझे अहसास हुआ कि मुझे अपने बेटे के लिए नहीं बल्कि खुद के लिए शादी करनी चाहिए। मैं एकल अभिभावक होने का काम सराहनीय तरीके से कर रही हूँ और मुझे किसी से भी कोई मदद नहीं चाहिए। मैं अपूर्ण नहीं हूँ और ना ही मुझे रिक्तता को भरने के लिए किसी की ज़रूरत है।

गलत कारण से शादी करने पर आप उस व्यक्ति को भी एक प्रकार की यातना दे रहे हैं जिससे आप शादी कर रहे हैं; मैं दुबारा उन सब चीज़ों से नहीं गुज़रना चाहती थी।

मैं एक पज़ल को पूरा करने के लिए किसी व्यक्ति के आने का इंतज़ार नहीं कर रही, ना ही मैं एक पज़ल का टूकड़ा हूँ जो किसी के अधूरे पज़ल में फिट हो जाएगा। मैं अपने बेटे के लिए पिता नहीं ढूंढ रही बल्कि ऐसा व्यक्ति ढूंढ रही हूँ जो मेरे जीवन का एक हिस्सा होगा और साथी ही मेरे बेटे का पिता भी बनेगा।
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