मैं जानती थी कि मेरा पति मुझे धोखा दे रहा है फिर भी मैं चुप रही

Amandeep Kaur
Sad beautiful woman

(जैसा अमनदीप कौर को बताया गया)

घड़ी ने आठ बजाए और मैं जल्दी लंचबॉक्स तैयार करने लगी क्योंकि समीर को लेट होना बिल्कुल पसंद नहीं था, लेकिन जो प्रतिक्रिया मुझे मिली वह ज़्यादा स्वीकार्य थी। उसने मेरे माथे को चूमा और कहा ‘‘मैं ड्राइवर से कह दूंगा कि बच्चों को स्कूल से ले आए और इससे पहले कि मैं भूल जाउं, मैं तुम्हें बता देता हूँ कि शायद आज रात मैं देर से घर लौटूंगा” और गुडबाय कहता हुआ वह चला गया। उसके व्यवहार में कुछ अलग था, और वह पिछले कुछ महीनों से मुझ पर ज़्यादा ही प्यार बरसा रहा था। मैंने खुद से मज़ाक में कहा कि शायद दस साल की मेहनत का फल अब मिल रहा था। वास्तव में हम हमेशा से ऐसा सुखी जोड़ा नहीं थे। कॉलेज के दिनों में मैं एक बेस्ट फ्रैंड के तौर पर उसका साथ देती थी जबकि वह अपनी लंबी अवधि की गर्लफ्रैंड सुष्मिता के साथ संबंध में था।

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वह वापस आ गई

मैं यह जानते हुए भी उससे प्यार कर बैठी की उसकी गर्लफ्रैंड थी लेकिन मैंने कभी कदम नहीं उठाया। अफसोस की बात है कि सुष्मिता ने उसे छोड़ दिया और आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चली गई। उसके पसंदीदा व्यक्ति होने और उसके सबसे करीबी होने के नाते, मैं उसके साथ ज़्यादा समय बिताने लगी और एक दिन उसने मुझे कहा कि वह मुझसे प्यार करता था। मैं बहुत खुश थी लेकिन मेरे मन में एक डर भी था कि क्या वह कभी सुष्मिता को भूल पाएगा, क्योंकि जितना प्यार वह सुष्मिता से करता था उतना किसी से भी नहीं करता था, मुझसे भी नहीं। उसने मुझे विश्वास दिला दिया कि वह बहुत पहले ही जा चुकी है और हमने अपनी यात्रा शुरू कर दी। उसने कुछ दिन पहले मुझे बताया कि वह राह में उससे मिला, लेकिन उसने इतनी लापरवाही से बताया कि मुझे राहत महसूस हुई। समीर के सेलफोन पर एक फोन कॉल ने मेरे विचारों को अवरूद्ध कर दिया।

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“अजीब बात है! वह कभी अपना फोन घर पर नहीं भूलता। ऐसा लगता है कि यह कॉल मेरी ही किस्मत में लिखा है,’’ मैं हंसी।

“जान, मैं आधा घंटा लेट हूँ, इसलिए साढ़े आठ बजे मिलते हैं। लव यू और जल्द ही मिलते हैं,’’ और फोन कट गया। आवाज़ जानी पहचानी थी, इतनी परिचित कि मैं भौंचक्की रह गई।

मुझे बेवकूफ बनाया गया था, फोन मेरे हाथ से फिसल गया और मैं दीवार को ताकती रह गई।

“हे भगवान, मैं उसका नाम भी नहीं लेना चाहती लेकिन वह सुष्मिता थी।” मेरी आंख से आंसू बहने लगे और मैं क्रोध और दर्द से तड़प रही थी। देर से घर लौटने का नियमित पैटर्न, रविवार को एक्स्ट्रा वर्किंग आवर्स और बाकी सब अब मुझे समझ आ रहा था। सारे उपहार, मुझ पर प्यार बरसाना और कुछ नहीं बल्कि मुझे मूर्ख बनाने के तरीके थे। मुझे मेरे ही पति ने बेवकूफ बनाया।

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मैंने उसे नहीं बताया कि मैं जानती थी

घंटी बजी और वह आ चुका था। मैंने खुद को शांत करके दरवाज़ा खोला। ‘‘मैं अपना फोन भूल गया था।” मैंने उसे फोन दिया और उसने अजीब से लुक के साथ पूछा, ‘‘क्या किसी ने फोन किया था?’’ पहले मैं चुप रही और फिर कहा ‘‘हाँ” और मेरा उत्तर सुन कर उसका मुंह पीला हो गया। ‘‘लेकिन मैं ठीक से सुन नहीं पाई, शायद नेटवर्क प्रॉब्लम होगी।” उसे राहत मिली, उसने मुझे कस कर गले लगा लिया और चला गया। उससे कॉल के बारे में पूछने के लिए मैं हिम्मत नहीं जुटा सकी, क्योंकि मैं जानती थी कि अगर मैंने ऐसा किया तो चीज़ें हमेशा के लिए बदल जाएंगी।

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दुविधा

अगले कुछ दिन मेरे लिए यातना के समान थे क्योंकि वह मेरे सामने था लेकिन ऐसा लगता था कि वह मेरा नहीं किसी और का है। मैं उसे छू नहीं सकती थी, किस नहीं कर सकती थी और गले भी नहीं लगा सकती थी भले ही मैं उसके साथ होने के लिए तरसती थी। उसने महसूस किया कि कुछ गलत है और मेरी सेहत के बारे में पूछा और इसलिए मैं विश्वास करना चाहती थी कि उसे परवाह थी, लेकिन मैं दुविधा में थी। पिछले कुछ महीनों में वह बहुत खुश दिखाई दिया। वह बच्चों और मुझमें शामिल होने लगा, हमें बाहर डिनर पर ले जाने लगा और उसने सिगरेट लगभग छोड़ दी। इतने वर्षों के बाद मैं सोचती थी कि हर चीज़ के लिए मैं ही उसकी प्रेरणा हूँ, लेकिन मैं गलत थी। मैं कुछ दिनों के लिए बच्चों के साथ अपनी माँ के घर रहने चली गई।

वह यह बताने के लिए मुझे हर दिन फोन करता था कि हमारे बिना घर घर जैसा नहीं लगता और उसे मेरी कितनी याद आती है।

मैं यह सब सोचती हुई सड़क पर चल रही थी और अचानक मूर्छित हो गई।

मैं अस्पताल में जागी और मेरी नज़रें हर जगह समीर को ढूंढ रही थी और वह मेरे ही पास बैठा था। मैं चिंता और लो ब्लडप्रैशर की वजह से मूर्छित हो गई थी। वह मुझे घर ले आया और मेरी देखभाल करते हुए पूरी रात मेरे पास बैठा रहा। सिर्फ मेरे साथ कुछ दिन बिताने के लिए और मेरी देखभाल करने के लिए उसने छुट्टी ले ली, लेकिन उसे किसी चीज़ की कमी खल रही थी।

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वह पुराने समीर को वापस ले आई

उसे सुष्मिता की कमी खलती थी और उसे उसके साथ बिताए समय की याद आती थी और मुझे अहसास हुआ कि उसकी ही वजह से मैं कॉलेज वाले आकर्षक, हमेशा खुश रहने वाले समीर से दुबारा मिल पाई।

वह उसमें खुशी और जीवंतता ले आई और मुझे दुख हुआ कि मैंने उससे उसकी खुशी छीन ली। मैं हमेशा से उसे खुश देखना चाहती थी और इसलिए मैंने चीज़ों को वैसा ही रहने दिया। मेरे पास उसका सामना करने की हिम्मत नहीं थी क्योंकि मैं इतनी स्वार्थी थी कि उसे छोड़ नहीं सकती थी और बच्चों को उसके प्यार से वंचित नहीं रख सकती थी। भले ही अगर उसने हमें चुना होता, तो भी वह खुश नहीं होता और संबंध हमारे लिए एक सज़ा बन जाता।

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मैंने स्थिति को वैसे ही रहने दिया और उसे कभी नहीं बताया कि मैं जानती थी और शायद उपहार और हमारे लिए अतिरिक्त समय उसका पश्च्याताप है। मुझे पता है कि हमारे बीच दूसरी औरत है लेकिन बहुत कुछ दांव पर लगा है और मैं यह जोखिम नहीं उठा सकती।

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