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मैं स्वयं पर विश्वास करती हूँ

आरती ओहरी 32 वर्षीय तलाकशुदा और अल्पशिक्षित थी....
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आपकी दुनिया के टुकड़े हो जाने पर उन टुकड़ों को वापस जोड़ने में समय लगता है। मुझे उस स्थान पर पहुंचने में 17 वर्ष लगे जहां मैं विश्वास से कह सकती हूँ कि मैंने तलाक के बाद अपने जीवन पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है।

एक गृहणी से लेकर रूढ़िवादी माता-पिता की तलाकशुदा बेटी से देशव्यापी शैक्षणिक परामर्शदाता का सफर बहुत कठिन रहा है।

32 वर्ष की उम्र में जीवन गुज़ारने के लिए मुझे अकेला छोड़ दिया गया था। 49 की उम्र में, मेरे पास किसी पुरूष के लिए समय नहीं है।

एक बुरे तलाक के बाद, मैंने दुबारा पढ़ना शुरू किया। मेरा शिक्षकों का परिवार है और मेरे पास प्रारंभिक शिशु देखभाल और शिक्षा डिप्लोमा था जो आपका जीवन निर्वाहित करने के लिए पर्याप्त नहीं था। इसलिए फिर मैंने विशेष शिक्षा में स्नातक की डिग्री, एमईडी, विद्यालय नेतृत्व तथा प्रबंधन में एक डिप्लोमा एवं एमए (समाजशास्त्र) प्राप्त किया और फिर मैं दुनिया जीतने के लिए तैयार थी!

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मैंने विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के विद्यालय में काम करना शुरू कर दिया। हमने एक प्रदर्शनी की; जो एक साधारण कार्यक्रम प्रतीत होता था, वह मेरे जीवन का महत्त्वपूर्ण मोड़ था। विद्यालय की एक प्रतिष्ठित श्रृंखला के प्रमुख ने कार्यवाही का उद्घाटन किया। मैंने उन्हें प्रदर्शनी दिखाई और दो सप्ताह बाद उन्होंने यह पूछने के लिए फोन किया कि क्या मैं अहमदाबाद में उनकी आगामी शाखा का नेतृत्व करना चाहूँगी। मैं बहुत हैरान थी, मुझे लगा उन्होंने गलत व्यक्ति को चुना है। स्थानांतरण एक बड़ा निर्णय था, लेकिन मैंने इसे करने का निर्णय लिया।

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अहमदाबाद में, हम एक महीने तक होटल में रहे और गुजरात में उस विद्यालय की पहली शाखा की स्थापना की। हमने 2007 में प्रारंभिक प्राथमिक विंग में केवल 10 बच्चों के साथ शुरूआत की और दो वर्षों में हमारे पास 1000 बच्चे और 50 शिक्षक थे जो 3 केंद्रों में व्याप्त थे। मैं एक प्रायोगिक प्रिंसिपल थी जो शिक्षक प्रबंधन, शिक्षाविदों और बाकी सब देखती थी। मैं हर बच्चे को उसके नाम से जानती थी, उसकी आवश्यकताएं एवं उसके माता-पिता को भी जानती थी। मेरे सलाहकारों के विश्वास और भरोसे ने मेरे आत्मविश्वास को अत्यधिक बढ़ा दिया।

लेकिन मेरे मन में महिला सशक्तिकरण की चाह बार बार सामने आती रही- मुख्य रूप से एक असहाय, अयोग्य महिला होने के मेरे स्वयं के अनुभवों के कारण।

मैंने जितना हो सके उतनी अधिक महिलाओं को शिक्षित और सक्षक्त करने का बीड़ा उठाया। विद्यालय के बाद हर दोपहर को, मैं शिक्षिकाओं को उन विषयों में प्रशिक्षित करती थी, जिनकी वे परीक्षाएं देने वाली थीं, चाहे वह शिशु मनोविज्ञान हो अथवा विशेष शिक्षा या फिर रचनात्मक कला।

यह दिलचस्प था कि कुछ पति डरा हुआ महसूस कर रहे थे, यह भी दिलचस्प था कि- उनमें से किसी ने भी अपनी नई-नवेली पत्नी की मोटी कमाई पर आपत्ति नहीं जताई। मुझे कुछ अपशब्द कहे गए जिन्हें मैंने अनदेखा कर दिया। मैं स्थिर रही। मैंने कोमल होने से एक ऐसी महिला होने तक का सफर तय किया जो एक निर्णय ले सकती है। चाहे वे विवाहित हों, अविवाहित अथवा तलाकशुदा हो, मैंने उनके योग्य और प्रशिक्षित होने पर ध्यान केंद्रित किया। निर्वाण मुख्य प्राथमिकता बन गई।

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और इस परिवर्तन ने घर में उनके बातचीत करने के तरीके को बदल दिया। उन्होंने बोलना शुरू कर दियाः ‘‘मैं घर लौट कर आऊंगी और फिर घर के काम निपटाऊंगी।” एक ने कहा, ‘‘मैं अपने बच्चे को विद्यालय में रखूंगी और फिर उसे वहीं पढ़ाऊंगी।” उन्होंने बैंक में खाते खुलवा लिए जिसमें विद्यालय उनके वेतन का भुगतान करता था। कई के पास पहले से बैंक खाते नहीं थे। कई पतियों ने बच्चों की देखभाल कर, घर जल्दी लौट कर, उनकी पत्नियों को विद्यालय ले जाकर और वापस लाकर, उन्हें वाहन दिला कर अपनी पत्नियों का सहयोग करना शुरू कर दिया।

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महिलाएं खुद को बेहतर रूप से प्रस्तुत कर पाती थीं। छुपी हुई प्रतिभाएं बाहर आईं। पति वार्षिकोत्सव में आने लगे और उन्हें पता चला कि उनकी पत्नियां 1500 अभिभावकों का सम्मान प्राप्त कर सकती हैं; अपनी पत्नियों के प्रति उनका आदर बढ़ गया।

बेहद कठिन और गहरे संतोषजनक कार्य के लगभग 15 वर्षों बाद, मैंने विद्यालय से विश्राम लिया एक ऐसे व्यक्ति से हाथ मिलाने के लिए जो मेरे जीवन को बदलने में सहायक रहा था। जो मेरा गुरू, मेरा मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक है। मेरी स्थिरता का श्रेय मैं उसे और केवल उसे दूंगी। उसने मुझ पर विश्वास किया! और मेरे लिए यह बहुत मायने रखता है। अब मैं उसकी फर्म का एक हिस्सा हूँ और हम परियोजना के आधार पर विद्यालय स्थापित करने के लिए साथ में कार्य करते हैं।

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काश की मैं अपने बच्चों की देखभाल कर पाती। मैं उन्हें बड़ा होते हुए नहीं देख पाई, उनके आनंद, उनकी खुशी, उनका दर्द नहीं बांट पाई। यह पीड़ा मेरे मन में हमेशा रहती है। मैं उन्हें यह बहुत बार कहना चाहती थी, लेकिन उनके सुखमय जीवन में व्यवधान डालने के डर से अपने तक ही सीमित रखा। मैंने यह त्याग किया और अब भी कर रही हूँ। मेरी आत्मा पर यह पीड़ा बहुत भारी है!

लेकिन अब मैं एक अधिक सुखद स्थान पर हूँ। दूरी और अलगाव ने मुझे संबंधों की एक बेहतर समझ दी है। मैं संबंधों को धन से अधिक महत्त्व देती हूँ। मैं अपने परिवार को महत्त्व देती हूँ। मैं अपने माता-पिता की देखभाल करती हूँ। मैं खुद की देखभाल करती हूँ।

(जैसा माधुरी मैत्रा को बताया गया)

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