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मैं पति के साथ हूँ, क्योंकि मुझे बच्चों की चिंता है

उसका पति धोखेबाज़ है और झूठा भी. मगर उसके सामने उसके दो बच्चों का भविष्य है. इसलिए अपनी इस ज़िन्दगी को उसने किस्मत का फैसला मान लिया है.
woman with children

(जैसा सौरभ दास को बताया गया)

मुझे लगा था की वो बदल जायेगा

मैं अपने भावी पति से सन्न २००० में मिली थी जब मैं ग्रेजुएशन कर रही थी. हम दोनों जैसे ही मिले, हम दोनों में काफी अच्छी बनने लगी. वो बहुत ही आत्मविश्वासी, व्यावहारिक और तेज़ था और उसकी व्यवहारिकता ही मुझे सबसे अधिक लुभाती थी. हम दोनों ने करीब दो सालों तक डेट किया और वो दो साल तो अभूतपूर्व थे. हाँ, वो बहुत ही हैंडसम था और उसकी कई महिला मित्र भी थीं मगर मैं उनकी तरफ ज़्यादा ध्यान नहीं देती थी. वो उसे कई बार फ़ोन भी करती थी मगर मैं फिर भी चुप रहती थी क्योंकि मुझे डर था की कहीं वो मुझे ईर्ष्यालु और दकियानूसी न समझने लगे.

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एक साल तक डेट करने के बाद उसने मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा. मैंने भी हां कर दी और तय किया की ग्रेजुएशन खत्म कर मैं शादी करूंगी. सब कुछ बिलकुल अच्छा था सिवाय उन महिला मित्रों के फ़ोन कॉल के. शादी के बाद भी वो फ़ोन आने बंद नहीं हुए. अगर मैं कभी उसे इस बात के लिए टोकती तो उसका एक ही जवाब होता था, “अरे हम बस अच्छे दोस्त हैं.” कभी कभी तो वो अपनी इन दोस्तों से एक एक घंटे बातें करता था और मेरे पूछने पर कोई बेकार सा बहाना बना देता था. कभी देर रात तक उनसे चैट करता था मगर मुझसे कहता की ऑफिस में रात के दो बजे तक काम था. रात के दो बजे तक कौन काम करता है? मगर मैंने सोचा की शायद हमारे बच्चे के जन्म के बाद सब ठीक हो जायेगा.

बच्चे के आने से सब बदल जायेगा?

एक साल बाद हमारी बेटी का जन्म हुआ और मुझे लगा की अब तो सब कुछ अच्छा होने वाला है. मगर ऐसा नहीं था. बेटी के जन्म ने उसे बिलकुल नहीं बदला. अब भी वो पूरी पूरी रात बाहर रहता और सुबह चार बजे घर आता था. उसका मोबाइल हमेशा लॉक रहता था और मुझे उसकी निजी ज़िन्दगी के बारे में कुछ भी नहीं पता था. एक बार तो उसने अपनी इन सहेलिओं को घर पर बुलाया और उनके सामने मुझसे ऐसे बर्ताव कर रहा था मानो मैं घर की कामवाली हूँ, जो उनके लिए खाना बना रही हूँ और परोस रही हूँ. मैं उसके इस बर्ताव से बिलकुल खिन्न होने लगी थी और एक दिन मैंने उससे इस बारे में बात करनी चाही. जवाब में उसने इन बातों को मेरा वहम बताया और मुझे इतनी ज़ोर से मारा की मैं सोचने लगी की क्या सचमुच ये वही आदमी है, जिससे मैंने शादी की थी? एक दिन मैं उसके ऑफिस पहुंच गई और मैंने उसके डस्टबिन में कंडोम देखे.

“रितेश, ये क्या है? क्या तुम इसी काम के लिए रात के दो बजे तक यहाँ रहते हो?” मैंने उससे पुछा.

“मुझे नहीं पता की ये यहाँ कहाँ से आये. मुझे पता करने दो.”

“रितेश, मैं बेवक़ूफ़ नहीं हों. बहुत हुआ तुम्हारा ये ड्रामा. मुझे अब तुम्हारे साथ नहीं रहना है,” मैंने गुस्से में कहा.

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मगर वो फिर भी बोलता रहा की उसे नहीं पता की कंडोम वहां कहाँ से आये.

तंग आकर मैंने उसे कह दिया की अब वो मुझे किसी तरह का संपर्क करने की भी कोशिश न करे.

मैंने उसे छोड़ना चाहा मगर बेटी उसे मिस करती है

अगले दिन मैं अपने माता पिता के घर वापस आ गई मैंने उन्हें अपनी शादी की असलियत बताई. उस दिन पहली बार मुझे रितेश से शादी करने का पछतावा हो रहा था. मैं खुद को कोस रही थी की क्यों नहीं वक़्त रहते मैं उन इशारों को समझ पाई और जान पाई की मेरा पति असल में कैसा है. वो अय्याश था, धोखेबाज़ था और झूठा था. जब मैं माँ के घर रह रही थी तब उसने मुझे एक बार भी फ़ोन करने की कोशिश नहीं की. मैंने भी उसे कभी फ़ोन नहीं किया.

2 baby and mom
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मगर मेरी बेटी अपने पिता को बहुत मिस कर रही थी. वो चार साल की बच्ची लगातार रोती रहती थी और हारकर मुझे अपने पति के घर वापस जाना पड़ा.

वो चार साल की बच्ची लगातार रोती रहती थी और हारकर मुझे अपने पति के घर वापस जाना पड़ा.

मगर जब मैं घर पहुंची, तो उसकी शक्ल पर कोई पछतावा नहीं था. वो तो हंस रहा था मानो कह रहा हो की मैं जा तो रही थी, मुझे तो वापस वहीं आना था.

उस दिन मैंने उस इंसान के लिए सारा प्यार और इज़्ज़त खो दिया और मैं अपनी ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर अपने हिसाब से जीने लगी. अब हम दोनों आपस में कोई बात नहीं करते थे. शादी के आठ साल बाद, जब मेरी बेटी सात साल की हो गई तब मैंने तलाक के बारे में सोचना शुरू किया.

मेरी और मेरी सास की अच्छी बनती है. मैंने अपनी सास और अपनी माँ को तलाक का फैसला सुनाया मगर उन दोनों ने कहा की मुझे इस शादी को एक मौका और देना चाहिए. “क्या पता दुसरे बच्चे के बाद वो बदल जाए.”

शायद दूसरा बच्चा उसे सुधार सके

उन दोनों की बात मान कर मैंने एक दुसरे बच्चे के लिए हामी भर दी. २०१३ में हमारा बेटा हुआ. बेटे के जन्म के तुरंत बाद तो मुझे अपने पति में अंतर दिखने लगा मगर वो तो तूफ़ान के पहले की शान्ति थी. मुझे जल्दी ही पता चला की मेरे पति का अफेयर एक तलाकशुदा स्त्री से है और वो अपना पूरा समय उसी के साथ बिताता है. एक दिन जब मैं रितेश के ऑफिस पहुंची तो वह वो महिला पहले से ही बैठी थी. मैं तुरंत ही घर वापस आ गई और सारा दिन रोती रही. रात को जब वो वापस आया तब उसने एक बार फिर मुझे बहुत ज़ोर से मारा क्योंकि मैं बिना उसे बताये उसके ऑफिस पहुंच गई थी.

मैं गहरे डिप्रेशन का शिकार होने लगी.

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मैंने भी अफेयर करने की कोशिश की

और फिर मैंने एक बहुत ही बेवकूफाना कदम उठाया. मैंने अपने कॉलेज के एक पुराने मित्र से अफेयर शुरू कर दिया. वो कुंवारा था और उन दिनों उस अफेयर से मानो मेरे जीवन में एक स्फूर्ति आ गई. मैं उसके प्यार में पड़ने लगी और ख़ास कर उसका संवेदनशील व्यवहार मुझे उसकी ओर आकर्षित करता गया. वो कहीं ज़्यादा संभाला हुआ इंसान था और मुझे लगने लगा की मैं इसी इंसान के साथ ही अपनी बाकी की ज़िन्दगी बिताना चाहती हूँ. मुझे उसकी ईमानदारी और औरतों के प्रति रवैये सबसे अधिक प्रभावित कर रहे थे. वो एक सफल पेंटर बनना चाहता था और अपने काम की तरफ बहुत ही ईमानदार था. मगर फिर से मेरी इस ख़ुशी की उम्र भी कम ही थी.

मेरा मासूम बेटा अपने पिता को बहुत प्यार करता है. वो अब पांच साल का है और अपने पिता के बिना एक दिन भी नहीं रह सकता. यूँ तो उसका पिता उसके साथ बहुत काम समय ही बिताता है, वो अपने पिता को फिर भी बहुत प्यार करता है. इसके अलावा वो मुझे भी बहुत प्यार करता है. अगर मैं उसे नहीं दिखती हूँ तो वो परेशां हो जाता है. अपने इस बेटे को देखकर मुझे अपने तलाक के फैसले के बारे में फिर से सोचना पड़ा. वो हम दोनों को ही एक सा प्यार करता है और अगर हमारा तलाक हो गया तो वो इतने बड़े हादसे को कैसे झेल पायेगा. और हमारी बेटी-उस बेचारी की भी तो कोई गलती नहीं है.

अपने बच्चों के बारे में सोचकर मैं अपने प्रेमी से दूर होने लगी और वो मेरी मनोस्तिथि समझ कर चुपचाप ही ब्रेक अप के लिए तैयार हो गया. मैं उसके लिए अथाह आदर और स्नेह के साथ अलग हुई हूँ.

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अंत में मैं वापस उसी पति के पास आ गई

अंत में मैं सब कुछ छोड़ कर वापस अपने पति के पास लौट आई.

इस बार ये फैसला मैंने अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए लिया है और मैं जानती हूँ की मेरे पति की हरकतों में तो अब भी कोई अंतर नहीं आया है. हाँ कभी कभी वो पछतावा करता है और उसकी भरपाई के लिए मुझे कीमती चीज़ें दिलाता है मगर ये भाव ज़्यादा दिनों तक नहीं रहता. मुझे तो प्यार और आदर की चाहत थी, इन कीमती वस्तुओं की नहीं. मैंने चाहा था की वो बदल जाए मगर वो न हो सका. क्यों? क्योंकि अब तक वो उसकी आदत और जीवन का एक अटूट हिस्सा बन चुकी है.

मैंने फैसला किया की अब मैं उसकी इन हरकरतों को अनदेखा कर दूँगी और अपने बच्चों पर ही ध्यान दूँगी. मैं अपने बच्चों को एक सुरक्षित भविष्य देना चाहती थी और इसलिए मैंने ये फैसला लिया. मैंने अपनी तकदीर का फैसला मान अब ऐसे ही अपनी ज़िन्दगी गुजरने का फैसला कर लिया है.

कभी कभी हम नहीं हमारी परिस्थितियां ही हमारी ज़िन्दगी तय करती हैं.

एक साल हो गया है जब मैंने अपने साथी को धोखा देते हुए पकड़ा है और अब हम यहां हैं

“माँ, प्लीज हमें छोड़ कर मत जाओ!”

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