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मैंने अपनी पत्नी के साथ घर छोड़ दिया क्योंकि मेरी माँ मेरे वैवाहिक जीवन को निर्देशित कर रही थी

यहां एक ऐसे पुरूष की कहानी दी गई है जो अपनी माँ से प्यार तो करता था लेकिन जब उनका नियंत्रण करने वाला व्यवहार बहुत बढ़ गया, तो उसे एक रेखा खींचनी पड़ी और पत्नी के साथ घर से बाहर निकलना पड़ा।
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हमारा परिवार मेरी माँ से ही पूर्ण था

मैंने हमेशा से अपनी माँ को एक देखभाल करने वाले व्यक्ति के रूप में जाना है – उन्होंने तीन बच्चों को पाला है, तीनों के शादी समारोह अच्छे से करने में सफल हुई हैं और बहुत परेशानियों को झेला है। स्वाभाविक रूप से एक बच्चे के रूप में, मेरी बहन और मुझे घर के सख्त नियमों के तहत पाला गया था, जिन नियमों का ध्यान, जी हां आपका अंदाज़ा सही है – मेरी माँ द्वारा रखा जाता था।

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मुझे गलत मत समझना, मैं अपनी माँ से प्यार करता हूँ लेकिन उन्हें सबकुछ नियंत्रित करने की कोशिश करने की आदत थी। वह घर की प्रभारी रही हैं और नौकरी और घर के बीच जगलिंग करना आसान काम नहीं था; उन दिनों में तो बिल्कुल नहीं। लेकिन उन्होंने यह अच्छे से किया। मेरे पिता हमेशा से एक धैर्यवान पुरूष रहे हैं और जब मेरी माँ ने बागडोर संभाली तो वे पीछे हट गए। इसलिए हमें अपनी माँ के आदेशों का पालन करना पड़ता था क्योंकि वे जानती थी कि हमारे लिए क्या सही था।

हम सभी के मन में, संभवतः विवेक में एक आवाज़ गूंजती रहती है जो हमें बताती है कि क्या करना है और क्या नहीं। मेरे लिए, बड़े होने के दौरान, वह आवाज़ मेरी माँ की थी। और मुझे पता लगा कि उनकी बात सुनने का परिणाम अच्छा रहता था। मैंने बोर्ड परीक्षा के दौरान स्कूल में शीर्ष स्थान हासिल किया, मैं एक अच्छे कॉलेज में गया और मैंने पढ़ाई जारी रखने का विकल्प चुना (उनके कहने पर मैंने कॉलेज के तुरंत बाद नौकरी करने की बजाए मास्टर्स किया) जिसकी वजह से मुझे एक कॉलेज में बहुत अच्छी नौकरी मिल गई।

मेरी शादी के बाद कलह

जिस लड़की से मैंने शादी की वह मेरी माँ को पसंद आई। मैं अपनी पत्नी को कॉलेज के दिनों से ही जानता था और मेरी माँ ने इसकी मंज़ूरी दे दी थी। चूंकि हम एक ही शहर में रहते हैं, और चूंकि मेरी बहन की शादी हो चुकी है और वह पुणे में शिफ्ट हो चुकी है, इसलिए मैंने रूकने का, अपने माता-पिता के साथ रहने का और उनकी देखभाल करने का फैसला किया। मेरी पत्नी ने किसी भी बात पर आपत्ति नहीं जताई। हमारे पास एक बड़ा घर और घर का केयर टेकर था। हमारे घर में रहने वालों से ज़्यादा कमरे थे, इसलिए यहां रहना आरामदायक है और मेरी पत्नी को अपना नया घर पसंद आया।

कुछ समय ऐसे भी थे जब बच्चे पैदा करने को लेकर हमारे मामूली झगड़े होते थे। एक दिन जब मैं घर आया तो मैंने अपनी माँ और पत्नी के बीच गर्मागर्म बहस होते देखी।

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माँ: यह समय के बारे में है।
पत्नीः हमारी शादी को अब छह महीने हो चुके हैं। पहले मैं एक अच्छी नौकरी करना चाहती हूँ।
माँ: तुम्हारी पीढ़ी के लिए सही समय कभी होगा ही नहीं। जब मैं तुम्हारी उम्र की थी, मेरे दो बच्चे हो चुके थे।
पत्नीः माँ आपके ज़माने की बात अलग थी।
माँ: तुम्हारी उम्र कम नहीं हो रही है बल्कि बढ़ रही है। और हम मरने से पहले अपने पोतों को देखना चाहते हैं।
पत्नीः मैं सिर्फ इसलिए बच्चे नहीं पैदा करने वाली ताकि आप मरने से पहले अपने पोतों को देख सकें।

इसके बाद एक गुस्से भरा मुंहतोड़ जवाब आया। मुझे हस्तक्षेप नहीं करना पड़ा। यह मामला धीरे-धीरे खत्म हो गया। यह कुछ हफ्ते बाद डिनर के दौरान फिर से आया।

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और यह सिर्फ एक मामूली सा उदाहरण है। मेरी पत्नी, रानी ने हमारे बेडरूम के लिए एक नया फर्नीचर खरीदा था। जब एक दिन वह नौकरी से लौटी तो उसने देखा फर्नीचर की जगह बदल दी गई है। मेरी माँ ने, अपने विवेक के अनुसार बिस्तर को दीवार के पास रख दिया था। मेरी पत्नी चाहती थी कि बिस्तर खिड़की के पास हो। मैंने अपनी माँ से बात करने की कोशिश की लेकिन वह मेरी बात सुनना ही नहीं चाहती थी।

मेरी पत्नी शायद ही कभी इन छोटी-छोटी चीज़ों के बारे में शिकायत करती थी जो उसे परेशान करती थी और जो मुझे भी परेशान करती थी। मेरी माँ हमें निर्देश देती थी कि हमें बाहर का खाना ज़्यादा नहीं खाना चाहिए और शादी के बाद मेरी इतनी महिला मित्र नहीं होनी चाहिए। वह शिकायत करती थीं कि मेरी पत्नी के पुरूष मित्र हैं जो अच्छी बात नहीं है। और किचन लड़ाई का आम क्षेत्र था। भले ही मेरी पत्नी और मैंने कुछ भी बनाया हो, उन्हें पसंद नहीं आता था। वह हमें यह तक बताती थी कि क्या पकाना है और जब भी किचन में कुछ गड़बड़ होती थी, तो वह कभी भी रानी को दोषी ठहराने से पीछे नहीं हटती थी। यहां तक कि जब रानी ने माँ को खुश करने के लिए कुछ बनाने की कोशिश की (भले ही रानी इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी) तो उन्होंने उसमें भी गलती निकाली। रचनात्मक आलोचना ठीक है लेकिन हमेशा आलोचना करना रचनात्मक नहीं है।

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हमारे पहले बच्चे के जन्म तक चीज़ें ठीक थीं

लेकिन पिछले कुछ सालों में, मेरे विवाहित जीवन के हर पहलू को नियंत्रित करने की उनकी इच्छा हमें व्यथित कर रही थी। मेरे पिता हस्तक्षेप करते थे लेकिन सब व्यर्थ होता था। उन्होंने बच्ची का नाम अपनी दादी के नाम पर रखा जिससे रानी को कोई आपत्ति नहीं थी। फिर वह मांग करने लगीं कि बच्ची को बाल रोग विशेषज्ञ के पास ले जाएं क्योंकि वह ज़्यादा बात नहीं कर रही थी। हर छोटी सी बिमारी उन्हें बहुत ज़्यादा चिंतित कर देती थी और मेरी पत्नी अपनी ही बच्ची के मामले में कोई फैसला नहीं ले पाती थी।

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मेरी माँ हर छोटी चीज़ में दखल देती थी – उसे कैसे कपड़े पहनने चाहिए, उसे कब ठोस भोजन खाना शुरू करना चाहिए, उसे कब सोना चाहिए। यह ऐसा था जेसे वह एक मिनट के लिए भी बाग-डोर नहीं छोड़ सकती थी। मेरी पत्नी ने वास्तव में कभी ज़्यादा बहस नहीं की, क्योंकि नौकरी और घर के बीच में जगलिंग करना वैसे भी बहुत कठिन था। मेरी माँ ने यह सुझाव भी दिया की मेरी पत्नी को बच्ची के साथ घर पर रहना चाहिए लेकिन कभी उसे कोई निर्णय नहीं लेने दिया। वह ऐसा कहती थी, ‘‘मैं बच्ची को खाना खिला दूंगी। आप अपना काम क्यों नहीं करती?’’

जिन भावनात्मक मुश्किलों से हम गुज़र रहे थे, वे बहुत ज़्यादा थीं। मेरी बहन ने हमें सुझाव दिया कि हमें कहीं और शिफ्ट हो जाना चाहिए। लेकिन मैंने यह सुनिश्चित किया कि हम मेरे माता-पिता से 15 मिनट की ही दूरी पर रहें, ताकि मैं एक अच्छा बेटा होने की भी भूमिका निभा सकूं।

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