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मैंने शादी की तीसवी सालगिरह को खुद को तलाक़ उपहार में दिया

वो वो सब कुछ थी जो उसे अपनी पत्नी में नहीं चाहिए था. मगर फिर भी उसे तीस साल लगे, खुद को तलाक़ के लिए राज़ी करने में.
Old happy man

(जैसा अनीता बबनरायणन को बताया गया)

हमारी शादी की तीसवी सालगिरह के कुछ दिन पहले ही मैंने तय किया की इस बार मैं खुद को एक बहुत ही महंगा उपहार देने वाला हूँ. मैंने उस उपहार के बारे में काफी बार और काफी सालों से सोचा हुआ था मगर कभी उसे देने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था.

मुझे अपनी कहानी आपको शुरू से बतानी चाहिए.

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जब मुंबई शिफ्ट हुआ

मेरी कहानी तब शुरू हुई जब मैं अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री ले कर उत्तर प्रदेश के अपने शहर को छोड़ कर सपनो की नगरी मुंबई आ गया. मैं असल में काफी खुशकिस्मत निकला की आने के तीन महीनों के अंदर ही मुझे एक बहुत ही अच्छी नौकरी मिली और साथ ही एक बहुत ही शानदार लड़की को मुझसे बेइंतहा प्यार हो गया.

मैं हमेशा से बहुत ही शर्मीला और अंतर्मुखी था. छह महीनों की बातचीत के बाद एक दिन उसने मुझे प्रोपोज़ कर दिया और मैं ना नहीं कर पाया.

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मेरे परिवार वाले इन सब से खुश नहीं थे क्योंकि वो ना सिर्फ उम्र में मुझसे बड़ी थी, बल्कि वो मुझसे कहीं ज़्यादा अमीर भी थी.

मैंने अपने माता पिता की एक न सुनी और उससे शादी कर ली.

हमारे सेक्स में कोई रोमांच नहीं था

शादी के पहले हम कभी कभार एक दुसरे को किस कर लेते थे मगर इससे ज़्यादा कुछ नहीं. हम दोनों सगाई के बाद भी वर्जिन ही थे. मेरी सेक्स लाइफ उतनी रोमांचकारी नहीं थी जितनी मैंने कल्पना की थी.

हमारे बीच का सेक्स बहुत ठंडा सा होता था. मैंने खुद को समझाया की वक़्त के साथ ये भी बेहतर हो जायेगा. मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं. ऐसा लगता था मानो उसकी कोई मानसिक बाधा है जिसके कारण हमारे सेक्स में उबाऊपन था, कोई वैरायटी नहीं. हम पोजीशन तक नहीं बदलते थे, न कुछ नया करने की कोशिश ही करते थे.

हम दोनों की ज़रूरतें भी बिलकुल मेल नहीं खाती थी. शुरुवात हमेशा मेरी तरफ से होती थी और मज़ा नहीं करने का अधिकार उसका. सेक्स धीरे धीरे एक उबाऊ काम हो गया था उसके लिए, और उसे बहुत बेमन से सेक्स करना पड़ता था क्योंकि उसका पति “गन्दा” था. फिर भी पहले दस सालों में हम हफ्ते में बार तो सेक्स कर ही लेते थे.

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धार्मिक असमानताएं

उसने शादी के बाद नौकरी छोड़ दी और अब मैं अकेले ही घर में कमाने वाला था. मगर मुश्किल ये थी की उस के खर्चे मेरी कमाई से कहीं ज़्यादा थे. इसके अलावा भगवान और धर्म को लेकर मेरे विचार और मेरी मीट मछली खाने की आदतें उसके लिए बहुत ही कष्टप्रद थी.

मेरी पत्नी भगवान् से डरने वाली महिला रही है और जब से वो एक धार्मिक समूह की सदस्य बनी, उसके साथ रहना और भी जटिल हो गया. वो कहने लगी की उसके लिए एक ऐसे व्यक्ति के साथ रहना नामुमकीन है जो भगवन पर आस्था नहीं रखता.

उसे लगने लगा की मुझ से शादी करना उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. मैं खुद के अलावा अपनी हालत के लिए किसी को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकता था.

फिर हम दुसरे देश बस गए

एक नया देश, एक नया बिज़नेस और तीन तीन बच्चे– चीज़ें बेहतर होने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

सच कहूँ तो चीज़ें बढ़ से बदतर हो रही थी. उसे लगने लगा था की क्योंकि मेरी उसमे दिलचस्पी ख़त्म हो गई है, मैं इस तरह काम में खुद को व्यस्त रख रहा हूँ. अरे हाँ, उसे इस बात का भी पूरा यकीन था का मेरा किसी के साथ अफेयर भी चल रहा है. (असली बात तो ये थी मैं इतनी मेहनत इसलिए कर रहा था ताकि उसके खर्चों से ज़्यादा मेरी कमाई हो जाये.)


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वो शक्की बनने लगी!

मेरी पत्नी अचानक ताकझांक करने लगी और ये मेरे लिए बहुत ही शर्मिंदगी की बात थी. एक दिन उसने अचानक मुझे फ़ोन किया और ऑफिस से घर आने की ज़िद करने लगी क्योकि उसे पूरा यकीन था की उस समय मैं किसी महिला के साथ प्रेम में डूबा बैठा हूँ.

एक दूसरी बार वो सीधा मेरे ऑफिस पहुंच गई और मीटिंग के बीच अचानक पहुंच गई क्योंकि उसे यकीन था की उस समय भी मैं मीटिंग के बहाने से किसी महिला के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा था.

एक बार उसे मेरी शर्ट की पॉकेट से कोई बिल मिला. उसने उस अनजान दुकान में फ़ोन कर लिया और पूछताछ करने लगी की मैं शॉपिंग में क्या देख रहा था और क्या मेरे साथ कोई स्त्री भी थी. जल्दी ही मेरे सारे स्टाफ को मेरी हालत का पता होने लगा. मैं कई बार उसे समझाता था की वो इस तरह की हरकत न करे क्योंकि ऐसा करके वो हमारे टूटते रिश्ते का तमाशा बना रही थी. मगर मेरी बात ये कह कर काट दी की मेरा स्टाफ बिना किसी रीढ़ की हड्डी वाले हैं जो मेरे प्रति वफादार हैं क्योंकि मैं उन्हें तनख्वाह देता हूँ.

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मैं सिर्फ बच्चों के कारण उसके साथ था

अपनी खर्चीली बीवी और बच्चों के खर्चीली पढाई के लिए मैं अपने बिज़नेस में बहुत मेहनत करता था. इन सब के बीच मैं दुनिया के सामने ऐसा दिखाता था मानो हमारी ज़िन्दगी कुछ भी गलत नहीं है. उसका व्यवहार मेरे परिवार के प्रति बहुत ही अभद्र था मगर उसके अपने परिवार के लिए वो बहुत ही अच्छी थी. इन बातों से हमारे बीच की चीज़ें और ख़राब हो रही थी.

कई बार मेरे मन में तलाक़ के विचार आये मगर फिर मैं अपने दो बेटियों और बेटे के बारे में सोच कर चुप हो जाता था. मेरे बच्चे ही थे जो मुझे उस रिश्ते में रोके हुए थे.

मैं और भी ज़्यादा अपने में रहने लगा था और इस बात की चिड़चिड़ाहड वो अक्सर मुझपर और बच्चों पर निकालती थी. अब मुझमे इतना आत्मविश्वास भी नहीं रह गया था की मैं अपने पुराने दोस्तों तक को घर बुलाऊँ या नए दोस्त बनाऊं क्योंकि मुझे डर था की वो उनमे भी ज़हर भर देगी. हमारी कोई सोशल लाइफ नहीं रह गई थी. ये डर की वो कभी भी बेतुके कारणों से हिंसक प्रतिक्रिया दे देगी, मैं अक्सर चुप ही रहता था. हमारे बीच धीरे धीरे कोई भी बातचीत नहीं होती थी और जब होती थी, तो अक्सर हम लड़ते या शिकायतें ही करते थे.

न सेक्स, न खाना और न ही रूपये

सबसे पहले हमारे बीच सेक्स ख़त्म हुआ. उसने साफ़ कह दिया की क्योंकि मैंने उसे धोखा दिया था, मुझे उससे किसी शारीरिक सम्बन्ध की उम्मीद करना गलत है. शुरू शुरू मैं इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश भी करता था मगर फिर मैंने उसका ज़िद देखकर उसे कुछ भी कहना छोड़ दिया. मुझे खुद को खुश करने के अपने तरीके थे.

फिर दूसरी चीज़ थी खाना. अब वो खाना बनाती थी न कोई लांड्री करती है. मतलब वो चीज़ें जो घर पर रहने वाली गृहणियां करती हैं, वो उनमे से कुछ भी नहीं करती थी.

उसने स्टॉक्स बेचने का काम शुरू कर दिया. और विश्वास करिये, वो मुझसे बेहतर थी पैसे कमाने में. अब उसके पास एक और तर्क था मुझे निकम्मा और बेकार कहने का. वो पैसे कमा ज़रूर रही थी मगर उसने कभी भी घरखर्च में मेरी मदद करने की कोई बात नहीं की. ये बात और है की मैंने भी मदद के लिए नहीं कहा.

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उसका मानना था की घर चलाना एक पुरुष का काम होता है और उसकी तनख्वाह सिर्फ उसकी है जो अपनी फ़िज़ूलख़र्ची के लिए रखती थी, मुझे बात में पता चला की उसने अपने पैसों से कानपूर में अपने नाम से एक फ्लैट भी ले लिया था. उसे घाटा भी काफी हुआ, जब मार्किट गिर रहा था और वो बुरी तरह घबरा गई. इस घबराहट में हमारे उस दरार भरे रिश्ते में कई और गहरे चोट के निशान हो गए थे. जो भी पूँजी हमने इक्कट्ठी की थी वो सब मेरे ही पैसों से थी और वो सभी इन्वेस्टमेंट को ज़बरदस्ती जॉइंट अकाउंट में ही करवाती थी.

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जब सोशल मीडिया का ज़माना आया, मैंने कुछ ऑनलाइन दोस्त बनाये. मगर मेरे अंदर के “सुशिल” पुरुष ने मुझे शादी के बाहर किसी भी तरह के सम्बन्ध बनाने की इजाज़त नहीं दी. ये बात और है की मैं अपने बचपन की क्रश को उत्तेजक मैसेज भेजा करता था. मैं अपनी अकेली शामें बच्चों के साथ बिताना पसंद करने लगा और आगे कई सालों तक वही मेरे सहारा हो गए.

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पता नहीं कितनी ही बार मैं कल्पना करता था की मैं उसे बारूद के गोले से बाँध कर तोप में डाल दूँ और उस तोप को चला दूँ.

शादी के तीस साल बाद जब मेरा सबसे छोटा बच्चा भी अपनी ज़िन्दगी की राह पर निकल गया तब मैंने अपने लिए एक बहुत ही महंगा उपहार लेने की ठानी। मैंने ये तय किया की अब मैं और इस लालची जीवनसाथी के साथ नहीं रहूंगा. असल में बिना सेक्स बिना साथ और बिना बात के हम साथ थे भी कहाँ!

बस मैंने अपना बिज़नेस बेचा, बच्चों की रज़ामंदी ली, और खुद को उससे तलाक़ गिफ्ट में ले लिया.

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