मेजर हांडा केस: क्यों हमेशा महिला ही दोषी होती है?

Shailja Dwivedi

भारतीय सेना के मेजर निखिल हांडा ने कथित तौर पर एक दुसरे सेना के अफसर की पत्नी को इसलिए बेरहमी से मार दिया क्योंकि उसने मेजर हांडा के शादी के प्रस्ताव को नामंज़ूर कर दिया.

मेजर हांडा केस: क्यों हमेशा महिला ही दोषी होती है?
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हांडा और वो महिला सन्न २०१५ में मिले थे और तब से ही लगातार एक दुसरे के संपर्क में थे. हांडा उस महिला के प्रेम में दीवाना था और उससे शादी करना चाहता था. एक बार उस महिला के पति ने दोनों को वीडियो चैट करते हुए देखा और हांडा को चेतावनी भी दी थी की वो उसकी पत्नी से बात न किया करे. मगर उसने पति की एक बात नहीं सुनी और लगातार उस महिला को फ़ोन नहीं किया. पिछले हफ्ते हांडा के शादी के प्रस्ताव को महिला ने नामंजूर कर दिया, तब हांडा ने उसकी हत्या कर दी.

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हमारा समाज सही गलत के चश्मे लगाए हमेशा तैयार है

एक ज़िन्दगी ख़त्म हो गई और ये दुःख की बात है. इससे भी ज़्यादा दुःख की बात ये है की इस निर्मम हत्या का कारण “प्यार” जैसा कुछ था मगर सबसे ज़्यादा तकलीफदेह बात ये है की हम और हमारा समाज फिर से “सिविक टेस्ट” में फेल हो गए.

हम उस महिला और उसके परिवार के लिए अपार दुःख व्यक्त कर सकते थे, अगर नहीं कर सकते थे हम इस पूरी घटना से अविचलित ही रह जाते, मगर हम हमेशा अपनी राय देना पसंद करते हैं, और इस राय देने में अक्सर कुछ गलत राय चुन लेते हैं.ऐसा ही इस बार भी हुआ. हमने न दुःख प्रकट किया, न तो इससे अनछुए रहे, हमने तो महिला को ही दोषी ठहरा दिया.

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हमने ये प्रश्न करना शुरू कर दिया की वो आखिर विवाहित हो कर भी उस पुरुष से क्यों बातें करती थी? वो आखिर उसकी कार में बैठी ही क्यों? कौन सभ्य महिला किसी पराये पुरुष के साथ यूँ घूमती है? मुझे ज़्यादा आश्चर्य नहीं होगा अगर कोई ये कहे की “उसकी फोटो देखि है फेसबुक पर, वो तो लगती ही है बिलकुल ऐसी ही. उसकी फोटो उसके चरित्र के बारे में सब कुछ बताता है.”

चरित्र!! असल में ये है क्या बिना किसी रीढ़ की हड्डी या वजूद के जो सबको आंकने के लिए इस्तेमाल होता है?

हम ऐसे चरित्र को परिभाषित करते हैं

एक महिला जो शादीशुदा है और एक बच्चे की माँ भी है, एक दिन रेस्टोरेंट में जा कर शराब पीने का तय करती है. वहां पड़ोस की आंटी अपनी सहेलिओ के साथ बैठी खाना खा रही हैं. वो उसे बियर आर्डर करते देखती हैं.. सोचिये ज़रा.. वाइन भी नहीं, बियर!! क्या मैं आपको अब भी बताऊँ की उस महिला के चरित्र के बारे में क्या बातें की जाने लगीं?

एक युवती रोज़ ऑफिस से लेट से आती है. वो अविवाहिता है और हर रात उसे उसके ऑफिस का कोई पुरुष सहकर्मी छोड़ने आता है. इससे भी बुरा सोचना हो तो मानिये की उसे रोज़ छोड़ने ऑफिस के अलग अलग पुरुष सहकर्मी आते हैं. फिर से क्या मुझे बताने की ज़रुरत है की आस पास के अंकल आंटी उस लड़की के चरित्र के बारे में क्या कहते हैं?

भगवन न करे मगर अगर इन दोनों में से किसी भी महिला के साथ अगर कोई भी हादसा होता है, तो तुरंत ही फरमान ज़ारी हो जायेगा की “ये तो होना ही था”. वो सारे अंकल आंटी बड़े गर्व से ये कहेंगे की उन्हें तो पहले से ही शक था की ऐसा कुछ होने वाला है.

मैं कल्पना भी नहीं कर सकती की इस वारदात के बाद उस आर्मी अफसर के परिवार पर क्या गुज़र रही होगी. मगर क्या उन्हें पता है की आज से कई साल बाद भी जब लोग उस पति को देखेंगे, आपस में फुसफुसा कर यही कहेंगे, “देखो वो रहा जिसकी पत्नी का अफेयर था और जिसकी हत्या उसके प्रेमी ने कर दी.” ये पढ़ते हुए क्या आपको भी मेरी तरह वो आवाज़ सुनाई दे रही है?

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हम कुछ भी कहें मगर हम एक बहुत ही क्रूर समाज का हिस्सा हैं, खासकर तब जब बात हमारी महिलाओं की हो रही हो. चाहे घटना बलात्कार की हो या फिर किसी को प्यार कर क़त्ल कर देने की, हमेशा ही कैसे भी गलती हमेशा लड़की की ही होती है. है न?

बोनोबोलोजी में हम जानते हैं की हमारा एक लेख दुनिया की सोच नहीं बदल सकता. मगर एक बार मदर टेरेसा ने कहा था, “मुझे पता है की मैं सागर में एक बूँद हूँ, मगर मैं एक बूँद तो हूँ.” हाँ, कभी कभी बस एक बूँद ही काफी होती है हलचल पैदा करने के लिए.

Swaty Prakash
(संपादकीय कलम से)

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