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मैं एक अन्य पुरूष के प्रति आकर्षित हूँ और मुझे इसका पछतावा नहीं है

जब वह अन्य पुरूष के प्रति आकर्षित हुई तब उसने स्वयं को फिर से पा लिया
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(जैसा दिपान्निता घोष बिस्वास को बताया गया)

हर दिन दिनचर्या की एकरसता से भरा हुआ है। मैं एक माँ, एक पत्नी और एक सफल पेशेवर हूँ और ये सारी भूमिकाएं पूरी नहीं, तो मेरी अधिकांश ऊर्जा और समय तो ले ही लेती हैं। घर चलाने से लेकर समय-सीमा में काम समाप्त करना, मुझे यह सब करना होता है और मैं अटल रूप से जानती हूँ कि मैं इसमें अच्छा काम कर रही हूँ। लेकिन प्रत्येक दिन के अंत में जब मैं बैठती हूँ और पीछे मुड़ कर देखती हूँ, मैं सोच में पड़ जाती हूँ कि इसमें ‘मैं’ क्यों नहीं हूँ। मेरे जीवन की यही कहानी है – किसी एक विशेष दिन की नहीं बल्कि हर दिन की। जीवन नाम के होहल्ले के बीच में कहीं ना कहीं, किसी तरह, मैंने अपना बहुत कीमती ‘मैं’ खो दिया है। इसके बारे में सोचने पर, इतना बुरा कुछ नहीं था लेकिन फिर भी, एक दर्दनाक खालीपन था जो दिन-ब-दिन गहरा होता जा रहा था। इतने दिनों से जो दूसरी भूमिकाएं मैं निभा रही थी, वे ‘मैं’ को कुचल रही थी।

जब तक मैं उससे नहीं मिली थी! तब तक मुझे अहसास नहीं था कि क्या कमी थी। तब तक मैं अपने सभी संबंधो को नाम देती थी और उसे पूरी तरह स्पष्ट रखती थी। तब तक मैं अपनी भावनाओं को ऐसे ही व्यक्त करती थी जैसी वे हैं और अपना दिल खोलने पर अच्छा महसूस करती थी। लेकिन इस बार नहीं! कुछ आकस्मिक भेंट, कुछ बातचीत और मैं अंतर महसूस कर सकती थी।
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मैं समझ सकती थी कि मैं दूर की सुरंग से प्रकाश पकड़ने की कोशिश कर रही हूँ। एक उल्लेखनीय परिवर्तन भी था -मेरी चाल में एक लचक, मेरे होठों में छुपी एक मुस्कुराहट, दिल का हल्का होना और स्वयं के इस नऐ रूप को गले लगाने की इच्छा।

मेरे भीतर की पत्नी और माँ मेरे भीतर की स्त्री का विरोध कर रही थी जो शीतनिद्रा में चली गई थी। मैं अपने रास्ते में आ रही तवज्जो, चिंता और रूकावट का आनंद ले रही थी, यह सुखद रूप से भिन्न लग रहा था। लेकिन क्या मुझे इसका आनंद लेना चाहिए? मेरा दिल और दिमाग एक बार के लिए असहमत थे – और मैंने अपने दिल के साथ जाने का फैसला किया। कई वर्षों बाद मैं अपने बारे में अच्छा महसूस करना चाहती थी। ऐसे असंख्य मौके आ चुके हैं जब सही बनाम गलत ने मेरे भीतर एक युद्ध शुरू कर दिया है। पलड़ा एक ओर भारी हो जाता है लेकिन जिस तरह मैंने फिर से स्वयं के लिए जीना शुरू कर दिया है, वह मुझे बहुत पसंद है। उस पुरूष में स्वयं का एक अनूठा आकर्षण है और उसने थोड़ा सा मुझ पर भी छिड़क दिया है। अन्यथा मैं स्वयं में इन सूक्ष्म परिवर्तनों पर इतनी रोमांचित क्यों हो रही हूँ?

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ऐसी अतिउत्साही भावना की शुद्धता और रोमांच, बगैर किसी नाम के आते हैं और मैं इन्हें पकड़ने के लिए तरसती हूँ। हर बार जब हम मिलते हैं, जो बहुत बार नहीं होता, मुझे जो जुनून महसूस होता है, वह अवर्णनीय है और उसका मुझपर एक शांत लेकिन दहला देने वाला प्रभाव पड़ता है। मेरे भीतर उमड़ती भावनाएं अत्यधिक तीव्र हैं और स्वयं के साथ मुक्ति की भावना लाती हैं। और यह सब मेरे भीतर की गहराइयों में दफन है। मैं उसके लिए क्या महसूस करती हूँ या उसका साथ मेरे लिए क्या मायने रखता है सिर्फ मुझ तक सीमित है। अव्यक्त भावनाएं और अनकहे शब्द बहुत कुछ कह जाते हैं और मैं खुलना नहीं चाहती – ना ही उसके सामने और ना ही किसी और के। मैं केवल इस नई प्राप्त हुई अनुभूति में मस्त रहना चाहती हूँ जहां केवल ‘मैं’ मायने रखती हूँ।

हम इस भावना को नाम देना नहीं चाहते, जैसे मैं इसे अगले स्तर तक ना ले जाने के बारे में निश्चित हूँ। मुझे, अभी, ऐसा ही पसंद है।

नृत्य कक्षा और सोशल मीडिया में कुछ मुलाकातों में जो शुरू हुआ, वह जारी रहेगा। पिछले वर्ष में कोई डेट नहीं हुई, ना ही हम दोनों फिल्म देखने गए हैं और ना ही बगीचों में टहले हैं, लेकिन अंगारों को चमकाने के लिए कम बातचीत भी पर्याप्त है। जब भी मैं इस बारे में सोचती हूँ कि वह मुझे कैसा महसूस करवाता है, विचारों के साथ मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं और मेरे पेट में तितलियां उड़ने लगती हैं। मैंने कभी अपनी भावनाएं उसे बताई नहीं है, हालांकि उसने स्वीकार किया है कि वह मेरे प्रति आकर्षित है।
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