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मैं एक अन्य पुरूष के प्रति आकर्षित हूँ और मुझे इसका पछतावा नहीं है

जब वह अन्य पुरूष के प्रति आकर्षित हुई तब उसने स्वयं को फिर से पा लिया
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(जैसा दिपान्निता घोष बिस्वास को बताया गया)

हर दिन दिनचर्या की एकरसता से भरा हुआ है। मैं एक माँ, एक पत्नी और एक सफल पेशेवर हूँ और ये सारी भूमिकाएं पूरी नहीं, तो मेरी अधिकांश ऊर्जा और समय तो ले ही लेती हैं। घर चलाने से लेकर समय-सीमा में काम समाप्त करना, मुझे यह सब करना होता है और मैं अटल रूप से जानती हूँ कि मैं इसमें अच्छा काम कर रही हूँ। लेकिन प्रत्येक दिन के अंत में जब मैं बैठती हूँ और पीछे मुड़ कर देखती हूँ, मैं सोच में पड़ जाती हूँ कि इसमें ‘मैं’ क्यों नहीं हूँ। मेरे जीवन की यही कहानी है – किसी एक विशेष दिन की नहीं बल्कि हर दिन की। जीवन नाम के होहल्ले के बीच में कहीं ना कहीं, किसी तरह, मैंने अपना बहुत कीमती ‘मैं’ खो दिया है। इसके बारे में सोचने पर, इतना बुरा कुछ नहीं था लेकिन फिर भी, एक दर्दनाक खालीपन था जो दिन-ब-दिन गहरा होता जा रहा था। इतने दिनों से जो दूसरी भूमिकाएं मैं निभा रही थी, वे ‘मैं’ को कुचल रही थी।

जब तक मैं उससे नहीं मिली थी! तब तक मुझे अहसास नहीं था कि क्या कमी थी। तब तक मैं अपने सभी संबंधो को नाम देती थी और उसे पूरी तरह स्पष्ट रखती थी। तब तक मैं अपनी भावनाओं को ऐसे ही व्यक्त करती थी जैसी वे हैं और अपना दिल खोलने पर अच्छा महसूस करती थी। लेकिन इस बार नहीं! कुछ आकस्मिक भेंट, कुछ बातचीत और मैं अंतर महसूस कर सकती थी।

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