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मैं प्यार के लिए तरसती हूँ…मैं स्वीकृति के लिए तरसती हूँ

वह अपने पति से अलग रहती है लेकिन तलाक लेने का निर्णय नहीं ले सकती
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हमारे आखरी फोन कॉल में, मेरे पति ने मुझ पर चिल्लाया, ‘‘तुम पृथ्वी पर सबसे बेहूदा इंसान हो।” मैं फिल्में देखने अकेली जाती हूँ। मैं अक्सर कैफेज़ और बार में अकेली देखी जाती हूँ, हाथ में एक किताब लिए। काम, मेरे लिए सिर्फ एक पेशा नहीं है। अगर मेरे कुछ अति उत्साही दोस्त नहीं होते, तो मैं अपने जन्मदिन पर भी अकेली होती, जैसे कि मैं अधिकांश त्यौहारों में होती हूँ। मैं थोड़ी शराब पीती हूँ। मेरे दोस्त कहते हैं ये थोड़ी नहीं कुछ ज़्यादा ही है। वे सोचते हैं कि मैं अयोग्य, बेवकूफ और अजीब हूँ और अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर रही हूँ, जबकि मैं सिर्फ खुशी ढूँढने और जीवित रहने की कोशिश कर रही हूँ।

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मैं अब भी अपने पति से प्यार करती हूँ। वह मुझसे प्यार नहीं करता। वह मुंबई में है और मैं कोलकाता में और हम दो महीनों में एक बार बात करते हैं और वह बातचीत भी ज़हर भरी होती है। मैं कानूनी तौर पर अलग होने का सोच रही हूँ लेकिन मेरे विचार कमज़ोर पड़ जाते हैं क्योंकि मैं अब भी उससे प्यार करती हूँ।

ना जाने यह समझने में उसे कितना समय लगेगा कि उसकी सारी खामियों के लिए मैंने उसे माफ कर दिया। और उसे भी मेरी खामियों के लिए मुझे माफ कर देना चाहिए। हमने एक वचन लिया और हमें उसपर काम करने की आवश्यकता है। हम क्यों कतराएं, भागें या छुपें?

मेरे पति के साथ मेरा संबंध मेरे लिए एक बहुत बड़ी रूकावट है और शायद मेरे अंत का कारण भी बनेगा। मुझे समझ जाना चाहिए कि शायद यह खत्म हो चुका है। लेकिन मुझे उम्मीद है। बहुत थोड़ी सी। यही शब्द मुझे आगे बढ़ने से रोकता है।

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मेरा यही निर्णय लोगों को मेरे साथ प्यार में पड़ने से रोकता है और मैं प्यार के लिए तरसती हूँ। अगर किसी ने मुझसे मेरी विचित्रताओं के साथ प्यार किया होता तो शायद मैं इस अनिश्चित अवस्था से बाहर निकल पाती। लोगों ने मुझे सिर्फ दोस्त बनाया। मेरे स्त्रीत्व को नज़रअंदाज़ किया जाता है। मैं सभी की दोस्त हूँ और कभी-कभी ‘ब्रो’ भी। मैंने बहुतों को सलाह दी है। बहुतों का साथ दिया है। लेकिन जब बात मेरी आती है, तो कोई भी देखने की ज़हमत नहीं उठाता है। मैं इस दिवाली पर अकेली थी। मैंने मेरा घर साफ किया। खाना बनाया। दिए जलाए। ‘ओलौखी’ को दूर किया। लेकिन मुझे कभी इतना अकेला महसूस नहीं हुआ। अगले दिन, मैंने फैसला किया कि अकेली नहीं रहूंगी, और एक दोस्त के साथ ‘उत्तेजोना’ की योजना बनाई और दूसरे को भी इसके लिए मनाने में कामयाब हो गई।

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वह शाम भावनात्मक रूप से पिछली वाली से अलग थी । इतनी ज़्यादा शारीरिक थकावट के कारण, मैं सो गई और जब जागी, तब सवेरा भी नहीं हुआ था। मेरे फोन पर कुछ मिस्ड कॉल्स थीं। किसी ने पुष्टि करने के लिए फोन किया था, किसी ने मुझे यह बताने के लिए फोन किया था कि मैंने उनकी दिवाली खराब कर दी थी, किसी ने मुझे आज़माने के लिए फोन किया था। कुछ मुझे पार्टियों में बुला रहे थे। लेकिन मेरी अंतआर्त्मा चीख-चीख कर मुझसे पूछ रही थी ‘‘यह रात है। तुम शायद अपनी गर्लफ्रेंड्स और पत्नियों को इस समय घर से अकेले बाहर नहीं जाने दोगे। क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैं भी एक लड़की हूँ? तुम मुझे आने के लिए क्यों कह रहे हो? तुम मुझे लेने आने की ज़हमत क्यों नहीं उठा सकते?’’ क्यों हमेशा मैं ही लोगों को मिलने जाती हूँ? वे मुझसे मिलने क्यों नहीं आते? लेकिन शायद यह भी, कुछ ज़्यादा ही है। मैं चुप हूँ, मैं एक शब्द भी नहीं कहती।

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एक पुरूष था जिससे मुझे प्यार हो गया था। वह हमारे घर आया करता था और मेरे पति और मेरे साथ घूमने जाया करता था। हमारा एक गहरा संबंध था और उसके कारण मैं हँसती और नाचती थी। अब जब मेरा पति यहाँ नहीं है, तो वह मेरी उपेक्षा करता है जैसे की मुझे छूत की बीमारी हो। अब मैं अचानक से उसके ‘दोस्त की पत्नी’ बन गई हूँ। हम आँखों से जो बातें किया करते थे उसका क्या।

रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

क्या कभी कोई मर्द मेरा साथ निभाएगा, मेरा साथ देगा ओर मेरे चुप होने पर बात करेगा, एक ऐसी दुनिया में जो दिन-ब- दिन स्वार्थी और बेहद असंवेदनशील होती जा रही है।

मैं अक्सर अपने दोस्तों को उनके बच्चों के साथ देखती हूँ। मुझे उन्हें बड़ा होते हुए देखना अच्छा लगता है। यह अद्भुत है कि किस तरह उनके नन्हें हाथ पैर एक जो पहले गेंद की तरह दिखते थे, धीरे-धीरे समय के साथ स्थिर हो जाते हैं। जब उनकी बुदबुदाहट का अर्थ समझ आने लगता हे और जब वे अपने पहले शब्द कहते हैं, तो मेरा हृदय आनंद से भर उठता है। मैंने कई बार एक बच्चा गोद लेने के बारे में विचार किया है, लेकिन एजेंसिया हर बार ‘अकेली-माँ’ का साथ नही देती। मैं काम करती हूँ। मैं अकेली रहती हूँ। मेरे बच्चे की देखभाल कौन करेगा? पता नहीं कभी मेरा खुद का कोई बच्चा होगा भी या नहीं।

मुझपर आरोप लगाए जाते हैं कि मैं कड़वी बनती जा रही हूँ। मुझे लगता है कि जो भी मेरे बारे में राय बनाते हैं, उन सबसे पुछूँ, ‘‘तुम मेरे बारे में कितनी बार सोचते हो?’’ आखिर मैं हूँ क्या, दुनिया के सामने खड़ी एक लड़की, जो चाहती है कि कोई उसे सच्चाई से और पूरे दिल से प्यार करे?

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