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मेरे सम्बन्ध मुझसे अधेड़ विवाहित महिला से है, मगर क्या यह प्यार है?

कुछ तो है उसके और उस बड़ी उम्र की महिला केइस रिश्ते में जो उसे बाकी रिश्तों से अलग लगता है, मगर क्या ये प्यार है या फिर मात्र एक रिश्ता जो सेक्स पर ही निर्भर है??
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(जोइ बोस को कथित)

पिछले कुछ सालों में मैंने कई शहरों में काम किया है. मेरी जॉब की यह खासियत और खामी दोनों ही है कि मैं नयी जगहों पर काम सेट करता हूँ, चीज़ें व्यवस्थिक करता हूँ, और जब सब ठीक रफ़्तार में चलने लगता है, मैं एक नए ठिकाने पर चला जाता हूँ. इस जीवन शैली से मेरे व्यक्तिगत जीवन पर बहुत ही बुरा असर पड़ रहा था. इस भागते दौड़ते सफर में मेरे कई सेक्स पार्टनर बने (कई दोस्तों ने तो मुझे खिलाडी तक कह डाला) मगर भावनात्मक स्तर पर मैं अब भी अकेला था. और फिर एक दिन मैं उससे मिला.

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उसने कहा कि वह शादीशुदा है

हमारी शुरुवाती मुलाकात बाकि ऐसी मुलाकातों से अलग नहीं थी. हम मिले, साथ कुछ ड्रिंक्स लिए, और फिर मैंने उसे अपने घर आमंत्रित किया. ऐसी मुलाकातों के बाद मैं हमेशा यही करता हूँ, उन्हें घर बुलाता हूँ, दोनों एक अंतरंग रात बिताते हैं और बस. तो मैंने उसे भी घर चलने को कहा. उसने छूटते ही बताया, “मैं शादीशुदा हूँ.” यह सुनकर मैंने उससे बिलकुल साफ़ शब्दों में पुछा कि वह चाहती क्या हैं, जिस पर उसने कहा कि वह इस रिश्ते को आगे नहीं बढ़ाना चाहेगी. मुझे उसके फैसले से कोई ख़ास आपत्ति नहीं थी. असल में शुरू के कुछ पल में ही हमदोनो को एक दुसरे का संग अच्छा लगने लगा था. उसकी शक्शियत काफी दिलचस्प थी और हम पूरी रात यूं ही बातें करते, कहकहे लगाते और साथ में जाम टकराते बिताने लगे. फिर बस यूं ही आँख भी लग गयी और हम दोनों सो गए.
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सुबह जब मेरी नींद खुली तब वो फिर भी सो ही रही थी. उसका मुँह अधखुला था और उसके पास हलकी घरघराती सी आवाज़ आ रही थी. यह कहना तो सरासर गलत होगा कि उस समय वो सुंदरता की मूरत लग रही थी मगर हाँ, उसमे कुछ तो था जो मुझे आकर्षित करने लगा. मैंने बहुत कोशिश की कि खुद को रोकूँ मगर रोक न पाया और उसे अपने आलिंगन में भींच लिया. आश्चर्य तो तब हुआ जब उसने मेरे आलिंगन के जवाब में और ज़ोर से मुझे पकड़ लिया. हम दोनों कि बाहों में उलझा मुझे पता नहीं कब फिर से नींद आ गई. उसके आलिंगन कि गर्मायी और उसके बदन की भीनी खुशबू काफी थी मुझे उसमे खोने के लिए. मैंने उस सुबह ऑफिस फ़ोन कर छुट्टी ले ली. उसका पति किसी जहाज़ का कप्तान था और किसी समुद्री यात्रा पे निकला था. उस दिन वह भी घर नहीं गई.

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वह सेक्स अद्भुत था

उसे अपनी नींद से बहुत प्यार था. दुपहर के ११ बजे भी वो सो रही थी और मुझे बाथरूम जाना था और मैं धीरे धीरे उसके आलिंगन से खुद को निकाल रहा था. उसके हाथ और पैर कुछ इस तरह मुझे जकड़े थे की उनकी गिरफ्त से निकलना मेरे लिए बिलकुल नामुमकीन था. मैंने उसके चेहरे को बहुत करीब से देखा. उसकी आँखें बहुत सुन्दर थी. उसकी घुंघराली कुछ लटें उसके गालों से छेड़खानी कर रही थी और वह मंद मंद मुस्कुरा रही थी. अचानक उसने आंखें खोली और हम एक बहुत ही उत्तेजित किस में जैसे लॉक हो गए. मुझे नहीं पता की उस चुम्बन की शुरुआत किसने की थी.. मगर उसने जिस तरह मुझे किस किया था, आज भी मेरे होठ उस पल को याद कर के गीले हो जाते हैं. उसके बाद हमने सेक्स किया, असल में वह सेक्स से ज़्यादा प्यार था. तो उस पल एक दुसरे में खोए हम दोनों ने प्यार किया. और वह प्यार बहुत ही अद्भुत था. मेरे शरीर पर काफी बाल हैं और इसे लेकर मैं बहुत शर्मिंदा रहता हूँ. मगर उसे इस से कुछ फ़र्क़ ही नहीं पड़ा.

हम अक्सर मिलने लगे. साथ बियर पीते, नाचते, और साथ लंच करते. लंच तो मैं ही करता था. वो बहुत काम खाती थी, चिडिओं सा थोड़ा थोड़ा. हाँ, सारा दिन चॉकलेट्स के टुकड़े ही उसका भोजन थे. वह बहुत सुबह सबके जागने से पहले मेरे पास आ जाती और फिर रात तक रहती. अजीब लगेगा सुनकर, मगर जब वो आती थी तो हम सोते थे, पूरा पूरा दिन बस सोते थे और फिर एक किस के साथ अलविदा कर लेते थे.

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यह सिर्फ सेक्स नहीं था

हमारे बीच जो था वह सिर्फ शारीरिक नहीं था. हाँ हम सेक्स करते थे मगर उसमे एक भावनात्मक पहलु भी आ गया था. वैसे ही हमारे रिश्ते को आंकना इतना मुश्किल हो रहा था और उस पर उसका अपने मन की बात कहने का अंदाज़ भी अजीब ही था. वह हमेशा जो महसूस करती थी, उसका उल्टा ही कहती थी. उसकी आँखों में मुझे साफ़ दीखता था की हमारे बीच कुछ तो जन्म ले रहा था और अब कुछ भी बस संयोग नहीं था.

एक दिन मैंने उससे पूछ ही लिया, “हम दोनों के बीच में जो है, वह क्या है?” “हम सेक्स मित्र हैं,” उसने बहुत ही सहजता से हमारे इस सम्बन्ध को एक नाम दे दिया था. सुन कर थोड़ा सा तो मैं अचंभित हुआ था मगर मैं इस डील से खुश था.

और वो? मुझे पता था कि उसने इस शब्द का ईजाद सिर्फ नाममात्र किया था, जबकि सच्चाई यह थी कि वह विवाहित थी और उसका एक परिवार था. मैंने कभी उससे उसके घर परिवार के बारे में न पुछा न उसने खुद कभी कुछ बताया. क्या उसकी शादी में उसका शोषण होता था, क्या वो अपनी शादी से खुश थी, क्या मैं उसके लिए कुछ पल कि आज़ादी का स्रोत था.. बहुत सारे ऐसे सवाल थे जो शायद मैं कभी पूछ भी लेता मगर उससे पहले ही मेरा तबादला हो गया. हम कुछ आसानी से अपने इस उलझन को काम कर सकें.

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मुझे शहर छोड़े दो महीने हो गए है. मगर हमारे रिश्ते की तस्वीर अब मुझे अब साफ़ होती दिख रही है. मैं जब भी अकेला महसूस करता हूँ, उससे बातें कर लेता हूँ. हाँ, यह बातें अक्सर मेरे दिमाग में ही हो रही होती हैं. वह भी मेरे बारे में बहुत सोचती है. हाँ उतना ज़ाहिर नहीं करती. हम अक्सर स्काइप पर भी बातें कर लेते हैं. असल में तक़रीबन रोज़ ही. एक दिन मैं एक लड़की के साथ डेट पर गया और हमने वो रात साथ गुज़री. हमारा सम्बन्ध बहुत शारीरिक स्तर पर ही रहा. चूँकि वह हमेशा कहती है की हम अच्छे दोस्त मात्र ही हैं, और हाँ सेक्स मित्र भी, मैंने उसे अपनी इस डेट के बारे में सब कुछ सच सच बता दिया. उसने भी सब कुछ बड़े आराम से सुना और लिया. हम मित्र मात्र ही तो हैं.

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उस रात उसके पति के साथ उसका सेक्स हुआ. पति? वह तो कहीं बाहर समुद्र पर था न?, मैंने पुछा. उसने बताया की उस सुबह ही वो वापस आ गया था. यह सब सुन कर मुझे लगा की मैं प्रभावित नहीं हुआ हूँ. आखिर हम मित्र मात्र ही तो हैं. मगर असलियत मैं उस दिन के बाद हमारे बीच कुछ बदलने लगा. मैं कल्पना करने लगा की वो किसी और पुरुष के सामने नग्न खड़ी और वह वो अपरिचित पुरुष उसे छु रहा है. ऐसे कल्पना अक्सर मुझे उत्तेजित कर देती थी मगर इस बार यह कल्पना मात्र तकलीफदेह था.

“ये प्यार नहीं है”

उस दिन गुस्से में मैंने काफी पी राखी थी और तभी उसने मुझे फ़ोन किया. उसकी आवाज़ सुनते ही जैसा मेरा गुस्सा काफूर हो गया. “फ़क यू” मैंने हँसते हुए उसे कहा और मैं hasta रहा. “अजीब बात है न, यह किसी और को कहता तो गाली होती, तुम्हे तो कितने आराम से, सच्चाई से कह सकता हूँ. आखिर हम यही तो करते है,” मैंने कहा. उस समय उसने मुझसे कहा, “हम नाजायज़ हैं. हमारे सम्बन्ध के बारे में कुछ भी जायज़ नहीं है.”

“तो आखिर हम क्या हैं?”

“हम बस हैं. हम सच्चाई हैं. तभी तो तुम्हारे साथ मैं जितनी खुश होती हूँ, उतनी और कभी किसी के साथ नहीं.”

“अगर ऐसा है तो तुम मान क्यों नहीं लेती कि हममें जो है, वो प्यार है. मान जाओ कि तुम मुझसे प्यार करती हो.”

“नहीं मान सकती, क्योंकि मैं सच में तुमसे प्यार नहीं करती. इसे प्रेम नहीं कहते.”

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मैंने उससे और कुछ नहीं कहा. किसी बात का कोई फ़ायद नहीं था. वो आज भी उसी शहर में थी. मैं कम से कम एक नए शहर में था. और हम दोनों ये जानते है कि इस परिस्थिति से हम नहीं निकल सकते. न सिर्फ वो शादीशुदा है, बल्कि वो एक अलग जाती की है, मुझसे उम्र में काफी बड़ी भी है. यह सारी बातें यूं मायने नहीं रखती हमारे रिश्ते में मगर इससे ज़्यादा न हम इस रिश्ते को ले जा सकते हैं न ही बदल सकते हैं. हाँ, इस बात में भी दो राय नहीं की हम हमारे बीच जो है, वो अद्भुत है. हम दोनों के बीच का यह जोड़ बहोत अनूठा है. मैं जब उसके साथ होता हूँ, बहुत सुकून महसूस करता हूँ, और वो भी जब मेरे पास होती है, बहुत खुश होती है.

दूरी कष्ट देती है

मैं धीरे धीरे उसके स्पर्श, उसके बदन की खुशबू को भूल रहा हूँ. उसने मुझसे कई बार कहा की मैं उस शहर जा कर उससे मिलूं. मगर क्या ये सही होगा? क्या उचित है की मैं अपनी भावनाएं, अपनी कोशिशें एक ऐसे रिश्ते मैं लगाऊं, जिसका भविष्य ही नहीं है. मैं उसे बहुत अच्छे से जानता हूँ और यकीन है की इस तरह वह इस रिश्ते को ताउम्र निभा सकती है. मगर क्या मैं इसके लिए तैयार हूँ?कभी तो वो मुझे एक खूबसूरत आदत सी लगती है जिसे मैं बदलना नहीं चाहता और कभी खारिश सी लगती है, जिससे मैं तंग आने लगा हूँ. उसे अपनी ज़िंदगी से निकालना चाहता हूँ.

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कल रात मैं बहोत व्यथित और उदास था. मन अत्यधिक उचाट था, और तभी उसका फ़ोन आ गया. मानो अचानक ही मेरे मन की सारी व्यथा उसकी आवाज़ मात्र से छूमंतर हो गयी. जब मुझसे बातें करती है और जब स्काइप कॉल के दौरान मुझे जिन नज़रों से देखती है, मैं जानता हूँ की वो प्यार है. हम दोनों जानते है इस प्यार को मगर हमने ठान लिया है की हम इस प्यार को अनदेखा कर चलेंगे. यूं तो हमने खुद को समझा लिया है, मगर वो अंतर्द्वंद तो निरंतर चलता है हमारे अंदर. मैं जानता हूँ की अगर मैंने उससे हमारे रिश्ते के बारे मैं कुछ पूछ लिया, तो वो छूटते ही कहेगी, “अरे, हम मित्र मात्र हैं,” या फिर “हम तो सेक्स मित्र है न”. फिर जब फ़ोन रख देगी तो घंटो वो रोयेगी. मैं उसे रुलाना नहीं चाहता मगर कई बार मन सवाल करता है की क्या मित्र मात्र यूं कंप्यूटर स्क्रीन को चुम्बन से भर खुश हो जाते हैं या फिर ये की दो शहरों में रह कर कौन से दो लोग खुद को सेक्स मित्र कहते है?” कई सवाल हैं, मगर अब मैं जवाब नहीं ढूंढ़ता. जब कई सवालों की लड़ी सामने आ जाती है तो बस उन्हें कह देता हूँ की पता नहीं क्या है, मगर जो एक बेनाम सा कुछ है, प्यार ना हो मगर है बहुत प्यारा, बहुत अद्भुत.
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