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मेरे हार्टब्रेक ने एक इंसान के तौर पर मुझे किस तरह बदल दिया

उसके अतीत के हार्टब्रेक ने उसे प्रभावित किया कि वह नए आशाजनक संबंध के साथ किस तरह का व्यवहार करती है, लेकिन उसे पछतावा नहीं है
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“और उस पूर्ण समर्पण के पल में, मैं स्वतंत्र थी, मुक्त थी।” मैंने इस पंक्ति को अनगिनत बार सुना या पढ़ा था, और हमेशा सोचती थी कि इसका मतलब क्या है! लेकिन समर्पण में, झुक जाने में किसको मुक्ति प्राप्त हो सकती है? मैं एक विनम्र व्यक्ति रही थी और इसी चीज़ ने मुझे मुसीबत में डाल दिया। विनम्रता आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास की कमी एवं असुरक्षा की ओर ले जाती है। यह बुरा है!

लेकिन अब मैं जान गई हूँ। जैसे की हर दूसरी चीज़ के साथ है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की आपको डर को जाने देना चाहिए या हर किसी के सामने खुद को कमज़ोर बनाने देना चाहिए। यह महत्त्वपूर्ण है कि आप अपनी कमज़ोरियाँ किसे दिखाते हैं।

मेरे हार्टब्रेक ने मुझे क्या सिखाया

दो साल पहले एक विनाशकारी घटना के बाद, मुझे पता था कि मैं दूर हो गई थी, विश्वास की समस्याएं उत्पन्न हो गई थीं और मैंने लोगों को दूर कर दिया था। ऐसा तब होता है जब वही मित्र आपकी भावनाओं का लाभ उठाता है जिसपर आप सबसे ज़्यादा भरोसा करते हैं और जब मज़ा खत्म हो जाता है, आपको त्याग दिया जाता है। कोई आश्चर्य नहीं कि मैं दुबारा अंतरंग होने से डरती थी!

मेरे हार्टब्रेक और विश्वासघात ने मुझे खुद को ज़्यादा महत्त्व देना, दूसरों के सामने कमज़ोर ना बनना सिखाया, क्योंकि आपका दिल आपके साथ चाल चल सकता है और आपको सावधान कर सकता है कि एक पुरूष कहता कुछ और है और करता कुछ और। मेरे दोस्तों ने शिकायत की कि मैं उनसे बात नहीं करती, मैं खुद में कुछ ज़्यादा ही खोई रहती थी। और मेरी मम्मी कहती थी, ‘‘जब तक तुम किसी को अपने करीब आने नहीं दोगी उन्हें पता कैसे चलेगा? लोगों को खुद से दूर मत रखो।”

मेरे नौकरी छोड़ने से भी इसमें मदद नहीं मिली। हालांकि तब से मैंने अपने कैरियर को अच्छी तरह से संभाला है, लेकिन मैं चिंता की ओर ज़्यादा प्रवृत्त हो गई हूँ। क्लोज़र की इच्छा ने मुझसे बदला लेने की मांग की या सामने वाले व्यक्ति द्वारा माफी मांगे जाने की उम्मीद की।

क्लोज़र की इच्छा ने मुझसे बदला लेने की मांग की या सामने वाले व्यक्ति द्वारा माफी मांगे जाने की उम्मीद की।

मुझे लगा कि यह मुझे आवश्यक मन की शांति देगा जो मैं चाहती हूँ। कोई भी इसे समझ नहीं पाया। मेरे ज़्यादातर दोस्तों के लिए, मैं मज़ाक या दया का विषय थी। मुझे उनमें से एक भी नहीं चाहिए था। मैंने विक्टिम कार्ड नहीं खेला क्योंकि किसी ने भी दोषी व्यक्ति को सुधरने को नहीं कहा! और फिर भी आप कहेंगे कि यह पुरूषों की दुनिया नहीं है।

इन सब की वजह से मैं दिन-ब-दिन ज़्यादा गुस्से वाली और तामसिक बनती गई।

फिर मैंने तकनीक आज़माने का फैसला किया

फिर एक दिन, आवेगपूर्ण रूप से, मैंने कुछ नया, तकनीक का एक उत्पाद आज़माने का फैसला किया और लोगों से मिलने के लिए इसका इस्तेमाल किया। मुझे हमेशा से ऑनलाइन डेटिंग पर संदेह था। लेकिन मैंने सोचा कि मुझे खुद को बाहर रखना चाहिए और इसके होने का इंतज़ार करने की बजाय कोशिश करनी चाहिए।

और फिर वह आया, उसके बायोडेटा में ‘इम्पल्सिव’ शब्द लिखा था।

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वह एकदम सामान्य, लेकिन त्रुटिहीन तरीकों के साथ था, उसकी आवाज़ मुझे पसंद थी और वह नई चीज़ों, नए लोगों के बारे में उत्साहित था। संक्षेप में, हर तरह से मेरी पहुंच से बाहर। वह एक प्रभावशाली रिस्यूमे के साथ एक महत्त्वाकांक्षी वैज्ञानिक था और वह स्मार्ट था! वह जानता था कि मैं किसके बारे में बात करती थी। उसकी बातचीत और व्यवहार में उसका फ्रांसीसी एक्सपोज़र (उसने फ्रांस में एमएस किया था) झलकता था। संगीत और टीवी शो में भी उसकी पसंद विवेकपूर्ण थी! और उसका खुद का स्टार्ट-अप था! मुझे लगा कि यहां मेरी दाल नहीं गलने वाली।

वह बिल्कुल परफेक्ट लगता था

मुझे उसके साथ डरा हुआ महसूस हुआ। और हमारी पहली डेट में वह घबराहट में 3-4 ग्लास पानी पी गया। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, उसके साथ होना मन को खुश कर देता था। जब वह खुल गया, तो उसके द्वारा कही गई हर बात में मुझे मज़ा आने लगा। उसकी हंसी मुझे क्रिसमस लाइट्स जैसी लगती थी। मैं उसके ‘गुडमॉर्निंग’ मैसेज के साथ जागती थी और दिन भर उसके मैसेज आते थे। यह चीज़ में कितने लंबे समय से चाहती थी।

फिर भी, जिस पल वह मेरे करीब आना चाहता था, मैं उसे दूर कर देती थी। जब भी वह कुछ रोमांटिक या फ्लर्टी बात कहता था तो मैं उसका जवाब नहीं देती थी; वह मेरा हाथ थामता था लेकिन मैं उसे दूर कर देती थी और मैं हमेशा अपने बारे में ज़्यादा बात करने से बचती थी। ऐसा नहीं है कि मैं उसके प्रति आकर्षित नहीं थी। लेकिन जैसे ही वह करीब आने की कोशिश करता था, मेरे दिमाग में एक तरह की खतरे की घंटी बजने लगती थी! मुझे लगता था कि उसका एक गुप्त अभिप्राय था और बाकी लड़कों की तरह, वह भी सिर्फ शारीरिक संबंध बनाना चाहता था, भले ही वह ऐसा कोई काम नहीं करता था जो इस बात का सुझाव दे। लेकिन डर की टीस बढ़ गई थी और यह काम करने लगा, इसने मुझे पागल और असुरक्षित बना दिया।

फिर मुझे संदेह होने लगा

अगर यह सिर्फ एक नाटक हुआ तो?

अगर इन सब कोशिशों के पीछे उसका गुप्त अभिप्राय हुआ तो?

हम ऑनलाइन मिले थे, है ना? क्या डेटिंग एैप्स पर क्रीपी लोग नहीं होते हैं?

क्या होगा अगर उसका मन भरने के बाद वह मुझे छोड़ कर चला जाए, जैसे की पहले हुआ था??

मुझे याद है कि उस रात ये डर मेरे भीतर कहीं छुप कर बैठे थे। लेकिन मैंने उन्हें नियंत्रित कर लिया। भले ही उसने मुझे कहा कि मैं फिर से खुद को एक हार्टब्रेक के लिए तैयार कर रही हूँ, मैंने भागने का विकल्प नहीं चुना! और एक पल के बाद, मैंने जाने दिया। भगवान का शुक्र है, मैंने ऐसा किया। और वह समझ गया कि मैं क्या चाहती थी! वह सावधान और विनम्र था और उसने मुझे समय दिया ताकि मैं उसे व्यक्त कर सकूं कि मैं उसके बारे में क्या महसूस करने लगी थी। मैं नहीं जानती कि एक अजनबी मुझे इतना आरामदायक और सुरक्षित कैसे महसूस करवा सकता है। और कितने पुरूष सहमति के लिए पूछते हैं? उसने ऐसा किया!

उस स्थान में बंध कर, उसने मुझे देखा और जब उसके होंठों ने मेरे होंठों को छूआ, मुझे पूर्ण स्वतंत्रता महसूस हुई, वह आज़ादी जो मैंने अतीत में कैद होकर ढाई साल से महसूस नहीं की थी। बस एक ही पल में मैं मुक्त हो गई। मैं वर्तमान में थी।

मैं खुद को रोक नहीं सकी

लेकिन अंततः मेरा डर जीत गया। भले ही मैंने उनके साथ तर्क, बहस करने की कितनी भी कोशिश की, वे डिगे नहीं। और फिर, सब मिट्टी में मिल गया। एक असुरक्षित पल में, मैंने उससे पूछ लिया कि क्या उसका कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा है, क्या वह सिर्फ अपनी फंतासियों को पूरा करने के लिए मुझसे मिलता है! मुझे यह कहने के तुरंत बाद अफसोस हुआ क्योंकि मैं जानती थी मैंने कुछ ज़्यादा ही कह दिया था।

आज मैं पिछली बातें याद कर के यह कह सकती हूँ। मैंने किसी को दूर कर दिया। हर व्यक्ति आपको चोट पहुंचाना या छोड़ कर जाना नहीं चाहता है। जो भावनात्मक बोझ और आघात मैं लाद कर चलती थी उसने अपना प्रभाव दिखाया। और इसके लिए मैंने उस व्यक्ति को दोषी ठहराने की बहुत कोशिश की जिसने मेरा दिल तोड़ा था। लेकिन मैं यह कर नहीं सकी।

तब मुझे इस बात का अहसास हुआ। अब मैं उस व्यक्ति से क्षमा या जवाब नहीं चाहती थी। अब मुझे परवाह नहीं थी।

तब मुझे इस बात का अहसास हुआ। अब मैं उस व्यक्ति से क्षमा या जवाब नहीं चाहती थी। अब मुझे परवाह नहीं थी।

यह अजीब है कि यह किस तरह हुआ, लेकिन यह हो गया। एक ही महीने में, ढाई सालों की पीड़ा ने मुझे छोड़ दिया, जैसे की भूत उस शरीर को छोड़ रहा हो जिसमें वह वास करता था।

मैं समझ गई कि जब मेरे पास आशा थी और किसी को देने के लिए प्यार था, तब मैंने किस तरह खुद में ज़हर को भरने दिया। यह मुझे नुकसान पहुंचा रहा था; यह उन लोगों को चोट पहुंचा रहा था जिन्हें मेरी परवाह थी।

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खुद को पीड़ा ना झेलने दें

एक बुरे व्यक्ति ने मेरे साथ जो किया उसका खामियाज़ा किसी और को नहीं भुगतना चाहिए, मुझे भी नहीं!

अगर आपका दोषी पीड़ा नहीं झेलता है, तो आपको भी नहीं झेलनी चाहिए। अगर आप पीड़ा झेलना शुरू करते हैं तो आप दूसरों को भी पीड़ित करेंगे, खासतौर पर वे जिनके पास आपको देने के लिए बहुत कुछ है।

जब मैं उसके साथ बिताए गए वे पल याद करती हूँ, मैं बस इतना सोच सकती हूँ कि मैंने एक अनजान व्यक्ति के साथ कुछ विशुद्ध सुख के क्षण गुज़ारे इसके लिए मुझे कितना आभारी होना चाहिए। भले ही यह ज्यादा नहीं टिका, लेकिन मैंने एक दोस्त पा लिया और अपने डर से मुक्ति पा ली।

मेरे दोस्त ने मुझे यह बताया था, ‘‘तुम हार्टब्रेक के डर को खत्म करना चाहती हो ना? तो दिल को फिर से टूट जाने दो! दर्द छूमंतर हो जाएगा।”

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