मेरे मामा ने मुझे गलत तरीके से छूआ

(जैसा अरित्रिक दत्ता चौधरी को बताया गया)

मुझे लगता था कि वे आर्ट क्लासेस थीं। जब मैं नन्हा सा बालक था तब से ही मुझे बताया गया था के मेरे सबसे छोटे मामा, जो उस समय नवीं कक्षा में पढ़ते थे, वे एक चित्रकार थे। मैं, दूसरी कक्षा का छात्र था जिसे अपने माता-पिता की पसंद के अनुसार सांस्कृतिक रूप से प्रवीण होने के लिए कला कक्षाओं की ज़रूरत थी। मैं अपने जननांगों के बारे में समझता तक नहीं था; मैं टेस्टिस के बारे में भी नहीं जानता था और यह भी नहीं समझता था कि उन्हें छूने पर दर्द क्यों होता है। मेरे मामा मेरा हाथ पकड़ते थे और मुझे पशु, पक्षी, पेड़ और फिर इंसान के शरीर के अंगों को चित्रित करना सिखाते थे। मुझे एक नाक दिखाई गई और फिर नाक का चित्र बनाने का कहा गया, आँखें दिखाई गई और फिर आँखों का चित्र बनाने को कहा गया। और फिर ऐसा एक अंग दिखाया गया जो मेरे एयरक्राफ्ट खिलौने के आगे के भाग जैसा दिखता था। मुझसे कहा गया कि मेरे पास भी ऐसा एक छोटा सा अंग है, जो मेरे बड़े होने का इंतज़ार कर रहा है बिल्कुल अपने मामा की तरह।

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मुझे गलत तरह से छूआ गया, गलत जगहों पर छूआ गया। मुझे यह मज़ेदार लगता था, और मुझे इससे कुछ फर्क नहीं पड़ा जैसा पड़ना चाहिए था, और मैं जानता था कि माता-पिता द्वारा दिए गए नीरस जीवन से गोपनियता की तलाश करना एक प्रतिकूल खुशी थी।

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मुझसे वादा किया जाता था कि अगर मैंने अपना चित्र पूरा कर लिया तो मुझे इसी तरह का मज़ा दिया जाएगा और चूंकि मैं एक बुद्धिमान बालक था, मैं जल्दी अपना काम पूरा करने लगता था।

मुझे बताया गया था कि एक लड़के से एक पुरूष बनने का यही तरीका था।
मुझे मास्टरबिशन करने के तरीके सिखाए गए,

महीने बीत गए, हर रविवार मैं अपनी आर्ट क्लासेस में पहुंच जाता था, जल्दी अपना काम खत्म कर लेता था और फिर मुझे अटारी वाले कमरे में ले जाया जाता था। मुझे मास्टरबिशन करने के तरीके सिखाए गए, और मुझे कहा गया कि इस तरीके का उपयोग करने की मेरी उम्र नहीं है। अगर मैं अपने चाचा की नकल करने की कोशिश करता था तो मेरा क्रॉच दर्द करने लगता था। मेरे मुंह का इस्तेमाल एक बर्तन की तरह किया जाता था जिसमें मेरे पल्सेट करते हुए चाचा का स्त्राव डाला जाता था। मुझे लगता था यही तरीका था। मुझे बताया गया था कि एक लड़के से एक पुरूष बनने का यही तरीका था। बड़े होने का सपना देखना मेरे क्रॉच को बैचेन कर देता था, एक पुरूष बनने का सपना…..

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आज, मैं कॉलेज में हूँ, मुझे कई लड़कियों से प्यार होता है, मैं उन्हें बिस्तर पर ले जाता हूँ, उन्हें संतुष्ट करता हूँ, एक ठंडी आंह भरता हूँ; और फिर भी मैं अपने मुंह में अपने मामा का अंग नहीं भूल पाता हूँ; मैं अब भी नहीं जानता कि मैं देने के लिए बना हूँ या प्राप्त करने के लिए। मैं जानता हूँ कि मुझे अपने होमोसेक्सुअल ना होने की खुशी है। मैं दो पुरूषों के संभोग करने के विचार से आकर्षित नहीं होता हूँ; फिर भी उस अंग के प्रति आकर्षण को समझने की अस्पष्टता मुझे परेशान कर देती है, मुझे जो सिखाया गया था वह मर्दाना तरीका था। मुझे गहराई से प्यार करना अच्छा लगता है, मैं जानता हूँ कि मैं एक औरत को खुश और संतुष्ट रख सकता हूँ। फिर भी मैं ऐसे किसी यौन मिलन में खुद को संतुष्ट करने में असफल रहता हूँ। मुझे अपने दोस्तों से ईर्ष्या होती है जब वो बताते हैं कि मम्मी-पापा के घर पर नहीं होने पर उन्होंने कितना मज़ा किया, मैं सोचता हूँ कि कब वह दिन आएगा जब एक लड़की को किस या हग करते समय मेरे मामा का चेहरा मेरी आँखों के सामने नहीं आएगा। मुझे उस रात का इंतज़ार है जब तकिए पर से एक पुरूष के पसीने की गंध नहीं आएगी; जब मैं अपने अंग को देखकर परेशान नहीं होउंगा कि यह मेरे मामा जैसा बन चुका है।

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मैं खुश होना चाहता था, मैं उस लड़की के साथ घर बसाना चाहता था जिसे मैं किशोरावस्था की गलियों में छोड़ आया था। वह सब जानती थी! वह मेरी देखभाल भी कर सकती थी और मुझे ठीक भी कर सकती थी।

मेरी बेस्ट फ्रैंड ने मुझे बताया कि मैं बाल शोषण का शिकार था। उसने मुझे विश्वास दिलाया कि मेरे ओरिएंटेशन या यौन रूचियों के बारे में परेशान होना मेरी गलती नहीं है। मेरी इंद्रियां और जीन उस उम्र में परिवर्तित हो गए जब उन्हें आकार मिला।

कब मैं अपने साथी को संतुष्ट करते हुए खुद भी संतुष्ट होउंगा
क्या मेरा बलात्कार किया गया था?

क्या मेरा बलात्कार किया गया था? आप ऐसे बच्चे को क्या कहेंगे जिसके यौन जीवन की शुरूआत ही उसी लिंग के वयस्क व्यक्ति के साथ हुई थी जिसने उसका इस्तेमाल अपनी कामेच्छा को तृप्त करने के लिए किया था? आप उस बच्चे से क्या कहेंगे जो यह जानते हुए बड़ा हुआ कि सेक्स का व्यवहार्य रूप वह है जब उसे वही चीज़ प्राप्त करनी होगी जो उसके शरीर के हर क्षेत्र में पहले ही मौजूद है और जो अलग तरह से इस्तेमाल किए जाने के लिए बनी है?

मैं अब भी सोचता हूँ। मैं अब भी इंतज़ार करता हूँ। कि कब मुझे भगवान का आर्शिवाद मिलेगा और मैं पछतावे और भ्रम के बिना जीयूंगा। कब मैं अपने साथी को संतुष्ट करते हुए खुद भी संतुष्ट होउंगा। कब मैं एक वास्तविक रोमांस की शुरूआत करूंगा जो थोपी गई कामुकता और अस्वस्थ निराशाओं से मुक्त होगा; वह जो यातना देने की बजाए उन्नत करेगा?

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