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मेरे पति के लिए रुपए से बढ़कर न रिश्ते हैं न ख़ुशी

उसका पति पैसों के मामले में इतना कंजूस है की उसने अपनी बेटी तक से पढ़ाई में हुए पैसे की भरपाई मांगी है. उसके इस रवैये से उसके सभी रिश्ते टूट रहे हैं मगर क्या उसे इसकी चिंता है?
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(जैसा अनीश ए आर को बताया गया)

मेरे पति बिलकुल खर्च नहीं करते.

“अभय, मुझे २०० रुपए दे दो, सब्ज़ियां खरीदनी हैं,” मैंने उससे कहा तो वो मुझ पर चिल्लाने लगा. “मैं नहीं दूंगा. तुम अपने पास से रूपये ले लो. “उसकी बात से मैं जितनी अचंभित थी, मुझे वो उतनी ही हास्यपद भी लग रही थी. अचंभित इसलिए क्योंकि वो अपनी ही पत्नी को मात्र २०० रूपये देने से मना कर रहा था और वो भी सब्ज़ियों के लिए जो यकीनन वो भी खायेगा. मुझे अपने ऊपर हंसी भी आ रही थी की मैंने उससे २०० रूपये क्यों मांगे, जब पिछले हफ्ते जब मैंने उससे बीस रूपये रिक्शे के किराये के लिए मांगे थे तो शाम को उसने वो मुझसे वापस मांग लिए थे.

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मेरे पति कौन हैं?

मेरे पति मर्चेंट नेवी में हेड इंजीनियर के पद पर थे. वो छह महीने जहाज़ पर रहते थे और फिर फिर दो महीने घर रहते थे. ये सिलसिला करीब बीस सालों तक चलता रहा और फिर उन्होंने खुद ही रिटायरमेंट ले ली और हमेशा के लिए घर रहने आ गए. मेरी बेटी की शादी हो चुकी है और वो कनाडा में रहती है. मेरी माँ और सास दोनों ही अब इस दुनिया में नहीं हैं. अब हम दोनों की ही उम्र साठ से ज़्यादा है और देखा जाए तो इस पड़ाव में हमें अब बस ज़िन्दगी आराम और सुकून से गुज़ारनी चाहिए. आखिर हमने तीन दशक इस पल के लिए कड़ी म्हणत की है.

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मैंने हमेशा इस बात में यकीन किया है की आप खुद अपनी सबसे बड़ी पूंजी हो. ये ज़रूरी है की हम पर्याप्त धन अपने बुरे वक़्त के लिए जमा कर के रखें, मगर उसके लिए अपना आज ख़राब करने की तुक मेरी समझ के बाहर है. मेरे पति की सोच मुझसे बिलकुल विपरीत है. उनके पास धन की कमी नहीं है. अगर होती तो शायद मैं उनका रवैया समझ पाती। मैं तो उनका साथ भी देती जैसा मैंने तब दिया था जब हम दोनों की ही मायें बीमार थी और मैंने दोनों की अकेले देखभाल की और अपनी बेटी की परवरिश भी की.

वो स्वभाव से अंतर्मुखी हैं

जहाँ एक तरफ मुझे बाहर जाना, अलग अलग शैलियों का खाना खाना बहुत पसंद है, मेरे पति को अकेले रहना पसंद है. मेरा एक बहुत बड़ा मित्रों का समूह है मगर मेरे पति अकेले ही रहना पसंद करते हैं. अब मुझे समझ आता है की वो बाहर इसलिए नहीं जाना चाहते क्योंकि बाहर जाने का मतलब है खर्च. आप विश्वास नहीं करेंगे मगर वो इतने कंजूस हैं की अगर कभी बाहर जाना भी होता है तो वो मेरी गाड़ी इस्तेमाल करते हैं, अपनी नहीं. एक दिन मैंने तय किया की अपनी बहुओं को घर पर खाने के लिए आमंत्रित करूंगी. जब मैंने पति से कहा की बाहर से कुछ खाना और कुछ ड्रिंक्स माँगा लो तो उनका जवाब था, “तुम पागल हो क्या? जब घर पर बुला रही हो तो घर पर ही कुछ बनाओ. और ड्रिंक्स की क्या ज़रुरत है.” कुछ हज़ार बचाने के लिए वो इस नाज़ुक रिश्ते को भी दांव पर लगाने से नहीं चूकते हैं. मैंने अपनी बहुओं को फ़ोन किया और कुछ बहाना कर के उनका आना रद्द करा दिया.

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बेटी से उसके ऊपर हुए खर्चे की भरपाई मांगते हैं

.”माँ, वो मुझे हर महीने की तीस तारीख को फ़ोन करके याद दिलाते हैं की मुझे उनके रूपये लौटने हैं जो उन्होंने मेरी पढ़ाई पर लगाए थे. पूरे महीने मेरी खोजख़बर के लिए एक भी मैसेज नहीं आता मगर महीने के अंत में ये ज़रूर आता है,” एक दिन मेरी बेटी ने अपने पिता के लिए मुझे कहा. जी हाँ, जब से मेरी बेटी की नौकरी लगी है, मेरे पति उससे उसकी पढ़ाई के लिए लगे खर्चे की भरपाई की मांग करते हैं. मुझे समझ भी नहीं आता की इस बात की मैं क्या प्रतिक्रिया दूँ. क्या उसको पैदा करना और पढ़ाना हमारी मर्ज़ी और हमारी ज़िम्मेदारी नहीं थी? और रूपये के प्रति उनका ये पागलपन अब दिन पर दिन और भी बढ़ता दिख रहा है.

हम कभी बाहर नहीं जाते

हम दोनों कभी बाहर खाना खाने नहीं जाते, कभी फिल्में नहीं देखते और शॉपिंग तो बिलकुल भी नहीं. वो तो शुक्र है की मेरी एक नौकरी है जिसके कारण मैं खुद को बहुत खुशकिस्मत मानती हूँ. कम से कम मुझे दोस्तों से साथ घूमने न, मिलने का मौका तो मिल जाता है. मेरे पति को मगर ये सब बिलकुल पसंद नहीं है. उनका मानना है की अगर उन्हें कुछ पसंद नहीं तो किसी और को भी नहीं होनी चाहिए. हाँ मगर अगर कोई और खर्च करने को तैयार हो तो मेरे पति को बाहर जाने में कोई आपत्ति नहीं होती है. मुझे आज तक उनसे कोई तोहफे नहीं मिले हैं. एक दिन हम सब मित्रों से साथ शॉपिंग करने माल गए. हमने एक टैक्सी बुक की. जब हम मॉल पहुंचे, मेरे पति ने लिहाज़ में भी किराया देने की बात नहीं की, चुपचाप गाडी से उतर कर चले गए. मुझे उनकी इस हरकत से इतनी शर्मिंदगी हुई की मैंने बाद में आधा किराया दिया. बचत करना और बात होती है और इस तरह कंजूसी करना और पैसों के लिए इतना पागलपन होना और बात.

बचत करना और बात होती है और इस तरह कंजूसी करना और पैसों के लिए इतना पागलपन होना और बात.

अब तो शक होता है की सच में इन्होने रूपये कमाए भी या नहीं?

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अपने पति के पागलपन से इतने साल झूझ कर अब तो कभी कभी शक होता है की इन्होने जहाज़ पर क्या सचमुच कुछ कमाया या नहीं. अगर कमाया होता तो वो इतने कंजूस कैसे हो सकते हैं की रूपये के आगे वो टूटते रिश्तों की भी परवाह नहीं करते. मैं उनकी पत्नी हूँ मगर मुझे उनकी पूँजी के बारे में कोई अंदाजा नहीं है. मुझे नहीं पता की किन बैंकों में उनका खाता है. जब भी मैं उनसे पूछती हूँ, वो मुझे नहीं बताते हैं. जब अपने मित्रों से मैंने इस बारे में बात की तो सबको लगा की मैं ज़्यादा ही ओवर रियेक्ट कर रही हूँ, मगर मुझे पता है की मेरी प्रतिक्रिया बिलकुल स्वाभाविक है.

रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

मैंने ज़िन्दगी अपने आप से जीना सीख लिया है. मैंने उनकी परवाह करना छोड़ दिया है. मेरी एक ही बेटी है जो आज अपने परिवार में खुश है और मैं चाहे धनी न भी होऊं, मगर मैं यकीनन अपने पति से कहीं ज़्यादा खुश और संतुष्ट हूँ. मैं जब उन्हें कभी कहती हूँ की एक पति अपनी पत्नी की मृतरू के बाद बिलकुल अकेला हो जाता है मगर एक पत्नी पति के बिना भी निर्वाह कर लेती है. मेरी बात का आशय वो बिना समझे मुझे कहते हैं, “हाँ बिलकुल! तुम तो बिंदास हो. तुम्हे तो कोई और भी मिल जायेगा.”

आह! काश ऐसा हो सकता.

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