मेरे प्रेमी की प्रिय पत्नी, यह वजह है कि मैं तुम्हारा घर तोड़ने के लिए खुद को दोषी नहीं मानती

Surabhi Pandey
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नोटः लेखक के साथ जुड़े वास्तविक लोगों के सूक्ष्म निरीक्षणों के बाद यह पत्र लिखा गया है

प्यारा चिंताशील समाज और मेरे प्यारे प्रेमी की प्रिय पत्नी

हेलो!

वह मैं ही हूँ – हाँ- वह वेश्या/फूहड़/बदचलन-जो भी नाम आप मुझे देना चाहें। नहीं, नहीं- संकोच मत करना। मुझे कोई ऐतराज़ नहीं। मैं इस तरह के नाम सुनने की आदी हूँ। जब मैं पैदा हुई थी, मुझे ‘बोझ’ कहा गया क्योंकि मैं बेटा नहीं थी। (अरे सुनो! मैं माफी चाहती हूँ कि क्रोमोज़ोम्स ने मेरी सुनी नहीं!)। जब मैं बड़ी हो रही थी और मैं अपने बाकी कज़िन्स जितनी गोरी नहीं थी, मुझे और ‘बड़ा बोझ’ कहा गया (कौन करेगा इस काली से शादी!) बाद में, मैंने अपनी इच्छा से कला का अध्ययन करने का फैसला लिया, और मैं अचानक ‘कम बुद्धिमान’ बन गई थी। तो मैं इतने नासमझ समाज में रहती हूँ जो अपनी ही घिसी-पिटी दुनिया में रहता है, जिसे इतनी बुनियादी चीज़ों को समझने/स्वीकार करने की समझ नहीं है! यकीन मानो, मुझे उम्मीद नहीं है कि समाज कभी प्रेम प्रसंग जैसी जटिल चीज़ को समझ पाएगा।

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अब, तुम्हारी बात करते हुए – मेरे प्यारे प्रेमी की प्रिय पत्नी! अगर तुम्हें लगता है कि तुम और तुम्हारा विवाह बिल्कुल दोषहीन हैं, तो पहली बात यह है कि तुम्हारा पति मेरे साथ कर क्या रहा है?

मैं शादी की संस्था का बहुत सम्मान करती हूँ लेकिन उससे ज़्यादा सम्मान मैं प्यार का करती हूँ!

मैं समझती हूँ कि एक विवाहित पुरूष के साथ संबंध होना ‘नैतिक’ रूप से सही नहीं है, लेकिन क्या यह सही है कि तुम्हारे सहित पूरा समाज -सिर्फ मुझे ही दोषी ठहराए? तुम मुझपर अपने पति को फँसाने और गुमराह करने का आरोप लगाती हो। वह है कौन, दो साल का बच्चा?

अ. वह उम्र में मुझसे बड़ा है (कई साल)
ब. वह विवाहित है, परिपक्व है और पिछले कई वर्षों से तुम्हारे साथ है।

अगर इस सब के बावजूद, वह मेरी ओर आकर्षित हो गया और मैं रोक नहीं सकी, तो ऐसा क्यों है कि अत्यंत नैतिक समाज या तुम्हारे निर्णय में सिर्फ मुझे ही गलत ठहराया जाता है- क्या केवल मैं ही गलत हूँ? क्या एक संबंध में दो लोग नहीं होते हैं? और वैसे, यह जानकर तुम्हें हैरानी होगी कि जिसने यह शुरू किया वह तुम्हारा पति था। यह सच है कि मैं उसकी ओर आकर्षित हुई थी लेकिन मैं जितना रोक सकती थी मैंने रोका।

उसने मुझे किस्से सुनाए कि किस तरह उसने मजबूरन तुम्हारे साथ शादी की थी और तुम दोनों का संबंध बहुत अद्भुत नहीं था (जिसका तुम दावा करती हो!) उसने मुझसे भी झूठ कहा। मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था कि तुम्हारा प्रेम विवाह था। इस तथ्य से अब मुझे इतना फर्क नहीं पड़ता; तब ज़रूर पड़ता था जब मुझे यह पता चला था। खैर, मैं कहना यह चाहती हूँ कि मुझे सबके सामने इकलौता खलनायक ठहराना बंद करो। तुम्हारा प्रिय पति कोई पीड़ित नहीं है। वह भी मुझसे उतना ही प्यार करता है और इन जटिल परिस्थितियों के लिए उतना ही ज़िम्मेदार है।

यह स्वाभाविक है

मैं उससे प्यार करती हूँ और पागलों की तरह प्यार करती हूँ, इसलिए नहीं क्योंकि मैं महान हूँ। बल्कि इसलिए कि वह भी मुझे प्यार करता है! तो अगर तुम अपने और अपने विवाह के लिए कोई कदम नहीं उठा सकती, तो उससे बाहर निकल जाओ या कुछ भी करो। समझो की यह क्यों ठीक नहीं हो रहा और उसपर काम करो! मैं वैसे भी इस देश में संबंधों पर इतने हो-हल्ले का कारण समझ नहीं पाती। क्या यह एक बुनियादी चीज़ नहीं है- विवाह कभी-कभी सफल रहते हैं, कभी-कभी नहीं? हम इन चीज़ों को स्वाभाविक रूप से क्यों स्वीकार नहीं कर सकते और ये सब बातें फेलाना छोड़ क्यों नहीं देते?

इससे भी ज़्यादा दुख की बात यह है कि समाज हर स्थिति में स्त्रियों को दोष देने के तरीके ढूँढ लेता है। यह चर्चा कोई भी नहीं करना चाहता कि क्या हुआ और क्यों हुआ। उन्हें सिर्फ यही आता है – उस वेश्या के चरित्र की हत्या जिसने किसी बेचारी पत्नी का मासूम पतिदेव चुरा लिया! यह घिनौना है!

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एक समाज के तौर पर हमें लोगों को उनके हाल पर छोड़कर खुद की ज़िंदगी पर ध्यान देने की आवश्यकता है। वफादारी महान है लेकिन प्यार उससे भी ज़्यादा महान है और ज़िंदगी बहुत छोटी है। जब कोई प्रसिद्ध व्यक्ति किसी कम या अधिक उम्र के व्यक्ति से विवाह करने के लिए अपने दशकां पुराने विवाह को तोड़ देता है – तब हम उसे काफी आसानी से स्वीकार कर लेते हैं।

इन सितारा जोड़ों को उनके लाखों प्रशंसकों द्वारा ब्रेंजेलीना और सैफीना जैसे नाम दिए जाते हैं। तो फिर जब समान चीज़ें उन लोगों के साथ होती है जिन्हें हम थोड़ा बेहतर जानते हैं, यह इतना मुश्किल क्यों हो जाता है?

मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता!

तुम्हारी,
किसी की रखैल

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