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मेरी कहानी के खलनायक सास नहीं ससुर हैं

शादी के पहले उसने कभी कोई घरेलु काम नहीं किया था मगर शादी के बाद उसके ससुर का बर्ताव उसके प्रति काफी तल्ख़ था.
Preeti and Amitabh

(जैसा टीम बोनोबोलोजी को बताया गया)

(पहचान छुपाने के लिए नाम बदले गए हैं)

मुझे घर के काम करने की आदत नहीं थी

मैं दिल्ली के एक संयुक्त परिवार में पली बढ़ी हुई हूँ. हम एक संपन्न परिवार हैं और हमारे परिवार में लड़कियों से अक्सर काम नहीं कराया जाता है. मुझे कभी खुद किचन में कुछ काम करने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती थी, जब भी काम होता किसी से मदद ले लेती. मेरी शादी मुंबई के एक नुक्लिअर परिवार में हुई और वही से मेरी ज़िन्दगी ने भयावह रूप ले लिया.

हमारे परिवारों ने हमारी शादी तय की और हम २०१५ में दम्पति बन गए. शादी के एक साल बाद तक तो हम अमेरिका में रहे. शुरू शुरू में एक विदेश में यूँ रहना मुझे बहुत अजीब और डरावना लग रहा था मगर धीरे धीरे मुझे वहां रहना अच्छा लगने लगा. शादी के पहले मुझे घर संभालना नहीं आता था, मगर वहां जाकर थोड़ी बहुत समझ आने लगी.

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हमें भारत वापस आने के लिए कहा गया

एक दिन अचानक मेरे ससुर ने अभिर को फ़ोन किया और वापस भारत आने को कहा. “मैं चाहता हूँ की तुम भारत वापस आ जाओ. डॉक्टरों ने बताया है की माँ को ब्रैस्ट कैंसर है और मैं चाहता हूँ की अब तुम मेरे साथ व्यवसाय में अपना ध्यान लगाओ. वैसे भी तुम्हारे बड़े भैया और भाभी ने अमेरिका से वापस आने से साफ़ मना कर दिया है. हमें तुम्हारी ज़रुरत है.”

ये सब सुन कर अभिर भावुक हो गए और अगले साल ही हम दोनों मुंबई वापस चले गए. मैं उसके इस फैसले में ज़्यादा खुश नहीं थी क्योंकि मुझे पता था की मेरे ससुराल में घर के कामो के लिए कोई नौकर तक नहीं है. यहाँ तक की ऑपरेशन के बाद भी मेरी सास ही घर का सारा काम करती आ रही थीं. मुझे समझ नहीं आ रहा था की एक सख्त, तल्ख, और मुश्किल ससुर के रहते मैं कैसे ये सब संभाल पाऊँगी. उनके लिए तो अपनी पति के लिए भी न कोई सहानुभूति थी न कोई प्रेम.

घर में मदद के लिए कोई नहीं था

मेरे ससुर का ये मानना है की सिर्फ अगर कोई अपंग है, तभी वो अपने खाना बनाने के लिए किसी कुक को रख सकता है. वरना कुक खाना उतना दिल से नहीं बना सकते जितना घर की बहु बेटियां बना सकती है.

वो मेरी सास को नसीहतें देते हैं की उन्हें घर की देखभाल करनी चाहिए. वो उन्हें खाना बनाने की विधि तक बताते हैं और दिन के तीनों पहर का खाना बनाने के लिए एक एक घंटा समय देते हैं.

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वो काम पर पहुंच कर सास को फ़ोन पर बताते हैं की उन्हें खाने में क्या चाहिए। उनको परोसा गया खाना बिलकुल गैस स्टोव से उतरा होना चाहिए, उन्हें दोबारा गरम किया या बासी खाना नहीं खिला सकते है. मेरी सास ने आजतक बाहर की दुनिया नहीं देखि है और उन्हें अंग्रेजी तक नहीं आती है. उन्होंने आज तक अपने पति को किसी बात के लिए ना नहीं कहा है मुझे अपनी सास को देखकर काफी दया भी आती है मगर बहुत आदर भी करती हूँ उनका की उन्होंने इतने सालों तक अपनी पूरी ज़िन्दगी मेरे ससुर के लिए व्यतीत कर दी है.

उन्होंने मुझ पर हाथ उठाया

हमारे भारत वापस आने से पहले ही मैंने दो महीने की छुट्टी प्लान कर ली थी. एक महिने अपने ससुराल में और एक महीने अपने घर दिल्ली में. उस एक महीने में ही मुझे ससुरालवालों के साथ रहने की सच्चाई पता चली. जब हम मुंबई पहुंचे तो मैं अमेरिका के सफर से अब भी जेटलैग थी. मगर मेरे ससुर ने मुझे कहा की मुझे पूजा करनी है क्योंकि मेरी सास कहीं बाहर गई हुई थीं. मैंने उनकी बात मान कर कोयला जलाने के लिए गैस जलाई. मुझे नहीं पता था सिलिंडर का नोब बंद है और गैस स्टोव नहीं जल पायेगा. मुझे तब तक इस तरह गैस स्टोव और सिलिंडर की आदत नहीं थी. मैं गैस जलने की कोशिश कर ही रही थी की मेरे ससुर दनदनाते हुए किचेन में आये और मुझपर चिल्लाते हुए कहा, “तुम इतनी छोटी सी बात भी नहीं जानती की सिलिंडर कैसे ऑन करते हैं?”

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इससे पहले की मैं उनसे माफ़ी मांगती, उन्होंने मुझे तुरंत ही दूसरा हुक्म दे दिया. “जाओ और उस कमरे में अलमारी से कपूर ले कर आओ.”

क्योंकि मेरे दादाजी को कपूर से अलेर्जी थी इसलिए हमारे घर पर कभी कपूर का इस्तेमाल नहीं होता था और ज़ाहिर सी बात है की मुझे कपूर के बारे में नहीं पता था. मैंने हड़बड़ाहट में रुई की गोलियां ला कर उन्हें थमाइ और तब उन्होंने मुझ पर हाँथ उठाया. “तुम कपूर जैसी चीज़ नहीं जानती?”

मैं बहुत डर गई और चुपचाप कमरे से जाने लगी. तब उन्होंने मेरा सीधा हाँथ ज़ोर से पकड़ा और खींच कर कहा, “तुम कहाँ जा रही हो.” मैंने ज़बरदस्ती अपना हाथ छुड़ाया और अपने कमरे में चली गई. वहां दरवाज़ा बंद कर मैं बहुत ज़ोर से रोती रही.

“वो ऐसे ही हैं”

मैंने अपने माता पिता को फ़ोन किया मगर उनका फ़ोन नहीं लगा. फिर मैंने अपनी सास को फ़ोन किया मगर उन्होंने भी फ़ोन नहीं उठाया. मैंने अभिर को फ़ोन नहीं किया क्योंकि उस समय वो अमेरिका में सो रहा होगा. जब मेरी सास घर वापस आई और उन्होंने मेरे रोने का कारण पुछा, तो मैंने उन्हें कहा, “डैड ने आज मुझ पर पहली बार हाथ उठाया क्योंकि मुझसे सिलिंडर ओन नहीं हो रहा था और मैं नहीं जानती की कपूर कैसा दीखता है.” इस बार मेरी सास ने कहा की मेरे ससुर ऐसा कर ही नहीं सकते. “क्या आप वहां थी जो आप ऐसी बात कह रही हैं? और अगर ऐसा कुछ दोबारा हुआ तो मैं अलग रहने चली जाऊँगी. चाहे आपका बेटा मेरे साथ आये या न आये, मैं नहीं जानती. मैं पापा के इस बर्ताव से तंग आ चुकी हूँ,” मैंने अपनी सास को कहा. वो मेरी बात सुन कर बिलकुल चुप हो गई क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था की मैं ऐसा भी कुछ कह सकती हूँ. मगर उस दिन के बाद उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा.

मेरे पति अपने पिता से बहुत डरते है. जब मैंने उन्हें उस दिन की घटना बताई तो उन्होंने जवाब में कहा, “वो तुम पर हाथ नहीं उठाना चाहते होंगे. गुस्से में उनसे वो हो गया.” ये सुन कर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ. “तो क्या तुम अपने पिता से इस बारे में कोई बात भी नहीं करोगे की उन्होंने इतनी छोटी सी बात पर ऐसे बर्ताव क्यों किया?”

“देखो मैं अपने पिता को जानता हूँ”

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ये सुनकर मैंने अपना आपा खो दिया और कहा, “देखो, मुझे नहीं लगता है की मैं इस तरह से निभा पाऊँगी. मैं इस तरह उनके साथ नहीं रह सकती और न ही उनकी उमीदों पर खरी उतर सकती हूँ. उम्मीद है की तूम भी मुझसे ऐसा कुछ भी चाहोगे.” वो सब कुछ सिर्फ चुपचाप सुनता रहा.

मैंने पूरी कोशिश करि की मैं अपनी सास की हर मुमकिन मदद करूँ, मगर वो कभी भी संतुष्ट नहीं थे. ये सब तब भी हो रहा था जबकि वो जानते थे की मैं इन कामों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वो चाहते थे की या तो मैं खुद खाना बनाऊं या फिर अपनी सास से कहूं खाना बनाने के लिए. मुझे अपनी सास से ऐसा कुछ कहने में बहुत ही शर्म आती थी.

रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

हम अलग हो गए हैं मगर क्या ये काफी है

मैं जब से मुंबई वापस आई, मैं काफी डिप्रेशन में रहने लगी. ख़ास कर अपने ससुर के साथ वो घटना तो बार बार मुझे एक बुरे सपने की तरह याद आती है.

मगर मैंने फिर से इस रिश्ते को एक और मौका दिया है. मैं और मेरे पति अब एक अलग घर में रहते हैं क्योंकि मेरे पति भी अपने पिता के स्वाभाव को जानते हैं और दोनों में अक्सर काम के सिलसिले में भी झगडे होते रहते हैं. मुझे पता है की अभी इस बात के लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं था मगर वो फिर भी इस कदम के लिए तैयार हो गया. मैंने उसे कह दिया, “मैं तुम्हारे साथ हर चीज़ के लिए तैयार हूँ. अब ये फैसला तुम्हे करना है की तुम्हे मेरे साथ रहना है या नहीं। मैं तुम्हारे ऊपर किसी भी तरह का ज़ोर नहीं डालना चाहती हूँ. मैं तुम्हे अपने साथ आने के लिए ज़बरदस्ती भी नहीं कहूँगी क्योंकि भविष्य में मैं नहीं चाहती की मुझ पर ये इलज़ाम लगे की मेरे कारण तुम अपने परिवार से अलग हुए. मैं अपने नए घर में जो कुछ भी कर सकती हूँ, ज़रूर करूंगी. मगर हाँ, मुझे अपने घर में कम से कम दो काम करने वाले चाहिए क्योंकि मैं मानसिक और भावनात्मक तौर पर बिलकुल थक चुकी हूँ.”

जब अभिर ने मेरे साथ रहने का फैसला किया,  मैं उसके इस फैसले से बहुत खुश थी. मुझे मालूम है की ये फैसला उसके लिए बिलकुल भी आसान नहीं था. मगर मैं खुश हूँ की उसने ये फैसला लिया.

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