कुछ ऐसे मेरी पत्नी ने अपनी ननद का दिल जीता

Ramendra Kumar
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मेरी पत्नी माधवी और मैंने भाग कर शादी की। मैंने हमारे कष्टों के बारे में बोनबोलॉजी में लिखा है। दोनों भागों में हमें यातना मुख्य रूप में मेरे ससुराल पक्ष द्वारा ही दी गई। माधवी को खुश करने के लिए, मैं एक लेख उसकी ‘नियमविरोधी’ मेरी बहन दीदी जी, जो मुझसे 9 वर्ष बड़ी हैं, को एक लेख समर्पित करूंगा।

माधवी और मैं राउरकेला में थे इसलिए यह तय किया गया कि हम नागपुर में शादी करेंगे जहां मेरे जीजाजी, जैसा उन्हें बुलाया जाना पसंद था, वकीलों के वकील थे। (मुझे अब भी नहीं पता कि इसका मतलब क्या है!)

शादी की दिनांक 26 मार्च तय की गई थी। मेरे पिता जिन्होंने हमारे संबंध को आर्शिवाद दिया था, उन्होंने मेरी बहन को बड़ा संकेत` दे दिया था। उन्होंने मुझे कहा कि मैं तैयारियों में हाथ बंटाने के लिए नागपुर कुछ दिनों पहले चला जाऊं।

तुम ऐसा कर कैसे सकते हो!

जब मैंने नागपुर में दीदी जी के फ्लैट में प्रवेश किया, वह टीवी धारावाहिक महाभारत का चीरहरण वाला एपिसोड देख रही थीं। जैसे ही एपिसोड खत्म हुआ, उन्होंने मेरी ओर देखा और मेरी आकांक्षाओं के चीरहरण में लिप्त हो गई।

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“तुम क्या समझते हो कि अपनी शादी का फैसला तुम अकेले ले सकते हो? हमारे समाज में विवाह एक पारिवारिक निर्णय है। क्या तुमने कभी सोचा कि मेरे बच्चों का क्या होगा?’’

“आप कहना क्या चाहती हो?”

“क्या तुम जाति के बाहर शादी करने का नतीजा नहीं जानते? कोई भी मेरी बेटियों से शादी नहीं करेगा।”

“आप पागल हो गई हो क्या? गरिमा दस साल की भी नहीं है और गीतू मुश्किल से सात वर्ष की है – और आप उनकी शादी के प्रभावित होने की बात अभी से कर रही हो! सच में दीदी, मैंने इससे ज़्यादा हास्यास्पद बात कभी नहीं सुनी।”

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“तुम्हारे लिए परंपराएं, भावनाएं और संस्कृति, कुछ भी मायने नहीं रखती। एकमात्र चीज़ जो तुम्हारे लिए मायने रखती है वह है तुम्हारा प्यार या यूँ कहूँ कि तुम्हारी वासना। हमारे समुदाय में लड़की के पिता को लड़के के पिता से संपर्क करना होता है और उनकी मंजूरी और आशिर्वाद प्राप्त करना होता है।”

“प्लीज़ थोड़ा सोच समझ कर बोलो दीदी! उसके पिता को बिल्कुल अंदाज़ा नहीं है कि हम शादी कर रहे हैं। अगर उन्हें पता चला तो आशीर्वाद देने की बजाय वह मुझे मौत का अभिशाप दे देंगे।”

बहस दिन और रात तक जारी रही जब तक मेरे पिता युद्ध क्षेत्र में नहीं पहुंच गए और उन्होंने अस्थायी युद्धविराम को प्रभावित नहीं कर दिया।

मैं राउरकेला वापस चला गया और मैं और माधवी शादी के दिन नागपुर पहुंच गए।

हमें दीदी जी के फ्लैट में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी।

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मैं पड़ोसियों से क्या कहूँगी?

“मेरे बच्चे आज माधवी को आंटी कहेंगे और कल मामी। मैं अपने पड़ोसियों को इस बदलाव के बारे में कैसे समझाऊंगी?”

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मैं चुप रहा। उनका तर्क मेरी समझ से परे था।

पूरे विवाह समारोह और यहां तक कि रिसेप्शन के दौरान भी मेरी दीदी जी ने मुझसे बात नहीं की।

हालांकि उन्होंने एक काम किया जो मेरे दिल और दिमाग में हमेशा अमिट रूप से अंकित रहेगा। वे माधवी से होटल में मिलीं और उन्होंने देखा कि माधवी ने कोई गहने नहीं पहने थे। वे तुरंत घर गई और अपना स्वयं का आभूषणों का सेट लाकर माधवी को पहनने के लिए दिया।

इन वर्षों में मैंने पाया है कि दीदी और जीजू मेरी तुलना में माधवी से बात करने में कहीं अधिक सहज हैं। व्यंग्य के लिए मेरी विशेष रूचि किसी तरह उन्हें असहज बनाती है। उनके मुताबिक, जीवन एक बहुत गंभीर कार्य है और गंभीरता द्वारा ही इसे सबसे अच्छी तरह संचालित किया जा सकता है। हास्य एक बहिष्कृत वस्तु है और दिवाली, होली और वेतन मिलने वाले दिन जैसे अवसरों पर ही किया जाना चाहिए!

रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

अब हम सबसे अच्छे दोस्त हैं

दीदी जी अपने सभी छोटे-बड़े रहस्य माधवी को बताती हैं- जिसमें अपने ससुराल वालों, दोस्तों, पड़ोसियों, उनकी बेटी के ससुराल वालों के बारे में उनकी राय शामिल हो सकती हैं।

माधवी हर सूक्ष्म विवरण को ध्यानपूर्वक सुनती है और सभी सही अभिव्यक्तियां प्रकट करती है। मैंने हमेशा से इस तरह की पूर्ण एकाग्रता के साथ मिलावट रहित, शुद्ध और मौलिक युग्म में बदलने की उसकी क्षमता की सराहना की है।

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और फिर कुछ महीनों पहले, उस दिन पहली बार मुझे संदेह होने लगा।

दीदी जी और हम दोनों हैदराबाद के लुंबिनी गार्डन गए थे, वहां, जब हम बुद्ध की अद्भुत प्रतिमा की ओर चल रहे थे, दीदी जी पूरे जोश में बुराई कर रही थी।

विषय यह था कि उनकी बड़ी ननद ने किस तरह उनकी छोटी ननद के बेटे के इकलौते साले के बारे में शिकायत और निंदा की थी। ऐसा लगा जैसे माधवी सोच में पड़ी थी और दीदी जी ने उसका हाथ पकड़कर ज़ोर से झटक दिया।

“मेरी बात सुनो। मैं तुमसे बात कर रही हूँ।”

माधवी ने उनकी तरफ देखा और उसके सुंदर चेहरे में थोड़ा भी बदलाव किए बिना उत्तर दिया,”मैं सुन रही हूँ दीदी। मैं बस यही सोच रही थी कि भगवान बुद्ध के चेहरे पर बिल्कुल वैसे ही भाव हैं जो जीजू के चेहरे पर हमेशा होते हैं -शांत, स्थिर और ज्ञानपूर्ण!”

दीदी जी मुस्कुराई और खुशी से सिर हिलाया और मैं बस बुदबुदाया “बहुत खूब!”

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