मेरी पत्नी ने मुझे 40 साल बाद छोड़ दिया और मैं उसके लिए खुश हूँ

Archana Mohan
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जैसा अर्चना मोहन को बताया गया

मुझे अपने जीवन से प्यार है।

लेकिन मैं अपनी पत्नी को ज़्यादा प्यार करता हूँ और इसीलिए, जब पिछले साल हमारे पवित्र वैवाहिक बंधन ने 40 वर्ष पूरे किए, मेरी पत्नी और मैंने जुदा होने का फैसला किया।

मुझे गलत मत समझना।

हमारे संबंध में कोई कड़वाहट नहीं है। बल्कि वह मेरी सबसे बड़ी ताकत है।

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मैंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा देने के बाद अपने सपनों का घर बनाने और अपनी दो प्यारी बेटियों को पालने के लिए व्यवसाय का जो कठिन रस्ता चुना था, उसमें मेरी पत्नी मेरे सुख-दुख में मेरे साथ थी जब हम जीवन के उतार चढ़ाव से गुज़र रहे थे।

जब वह चाय की लड़खड़ाती ट्रे लेकर मेरे सामने आई, तब मेरी पत्नी मुश्किल से 17 साल की एक बेहद शर्मीली लड़की थी जो करस्पोंडेंस से एक कोर्स कर रही थी। मैं भी कोई बहुत बढ़िया नहीं था! दुबला-पतला और भोला-भाला, मैं एक 20 साल का बच्चा था जो एक मछली तक की देखभाल करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था, पत्नी तो दूर की बात है! लेकिन हमारे ग्रामीण समुदाय में ऐसा ही होता था इसलिए जब कुछ महीनों बाद हमारी शादी करा दी गई तो हम दोनों में से किसी को भी ऐतराज़ नहीं था।

मैं कोलकाता में नोकरी करने लगा था और अपनी पत्नी के साथ जीवन का नया अध्याय शुरू करने के लिए उत्साहित था। मुझे लगा था कि यह सब फिल्मों जैसा होगा। यह ऐसा ही था, लेकिन डरावनी फिल्मों जैसा! हम छोटी से छोटी बातों पर बच्चों की तरह लड़ते थे, एक दूसरे को कई दिनों तक अनदेखा करते थे, दरवाज़े पटकते थे, अपने माँ-बाप से एक दूसरे की बुराई करते थे और क्या नहीं!

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हमारी शादी के दो साल बाद, मेरी पत्नी गर्भवति हो गई। अचानक, हमारे बीच कुछ बदल गया। जब मैं उसके बढ़ते पेट को सहलाता था और बच्चे की लात महसूस करता था, मैं भावनाओं से अभिभूत हो जाता था। वह एक मासूम जीवन, भगवान का एक चमत्कार था जो पूरी तरह हम पर निर्भर था।

देखते ही देखते हमारे बच्चों जैसे झगड़े खत्म हो गए। एक बार फिर मैं उत्साह से भर गया था जब ड्यू डेट नज़दीक आई।

लेकिन भाग्य कुछ और ही चाहता था।

गर्भावस्था का आठवाँ महीना लगने से एक दिन पहले, मेरी पत्नी का मिसकैरेज हो गया। यह कहना भी कम होगा की हम दोनों पूरी तरह टूट गए थे। घर में सन्नाटे से भरे लंबे घंटे इतने ज़्यादा कष्टदायक थे कि मैं अपने भयंकर झगड़ों के लिए तरसने लगा था। मैं तो किसी तरह अपने व्यवसाय की वजह से इससे जल्द ही उबर गया लेकिन वह ऐसा नहीं कर पा रही थी।

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उसकी निराशा को कम करने के लिए मैं उसे अपने घर के पास आध्यात्मिक केंद्र ले गया। शुरू में वह केवल मेरे मनाने के कारण वहाँ गई थी लेकिन जल्द ही उसे उसमें आनंद आने लगा। भजन, श्लोक सीखना, धार्मिक प्रवचनों में भाग लेना, भक्तों के लिए प्रसाद बनाना, जैसे ही मेरी पत्नी ने अपना नया पहलू जाना, वह वापस पहले जैसी बन गई। अगले साल, खुशी आखिरकार हमारे घर आयी जब हमें एक बेटी हुई और तीन साल बाद दूसरी।

मैं बहुत संतुष्ट था।

“गाँव में एक घर खरीद लेते हैं और अपने रिटायरमेंट का लुत्फ उठाते हैं,’’ एक सुबह मैंने अपनी पत्नी से कहा जब वह मेरे लिए चाय का कप लाई। मेरी फर्म जो एक बड़ी कंपनी द्वारा अधिग्रहित कर ली गई थी, अच्छी चल रही थी और मेरी दोनां बेटियाँ अपने-अपने कार्य क्षेत्र में अच्छी तरह सेटल्ड थीं। नहीं, मेरी पत्नी ने स्थिर और ठोस आवाज़ में कहा। मैं उसका मज़ाक उड़ाने लगा, यह सोचते हुए कि वह मज़ाक कर रही है, लेकिन उसने हाथ उठाकर मुझे चुप कर दिया।

क्या यह वही लड़की थी जो मेरी आँखों में भी नहीं देख पाती थी, जब हमारी शादी हुई थी?

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अगले दो घंटों के लिए, मेरी पत्नी ने कहा और मैंने सुना। वह मुझसे बेहद प्यार करती थी और उसने मेरे और हमारी बेटियों के साथ जीवन के हर पल का आनंद लिया था लेकिन अब वह स्वयं के लिए जीना चाहती थी। वह आध्यात्मिकता के माध्यम से अपने भीतर की आत्मा तक पहुँचने के लिए सन्यासी बनने का विचार कर रही थी। और अपने लक्ष्य को पाने के लिए उसे कुछ वर्षों तक खुद को प्रशिक्षित करने की ज़रूरत थी।

मेरी हैरानी समझ से परे थी और मुझे अपने आस-पास की दुनिया दूटती हुई दिखाई दे रही थी। मैंने हमेशा अपनी वृद्धावस्था की कल्पना करते समय उसे अपने साथ देखा था। मैं एक बच्चे की तरह रो पड़ा, मेरी सिसकियाँ रात भर काबू से बाहर थी। मैंने बहस की, निवेदन किया और यहाँ तक कि वापस विचार करने की भीख भी माँगी लेकिन वह अपना मन बना चुकी थी।

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कुछ हफ्तों बाद, हमारे दरवाज़े पर एक ऑटो रिक्शा आकर रूका। उसने हमारी बेटियों को गुडबाय किस दिया और रिक्शा में बैठ गई। उसने एक पल के लिए मुझे देखा और मुझे उस लड़की की झलक दिखाई दी जिसने कभी उम्र भर के लिए मेरी साथी बनने की हामी भरी थी, लेकिन वह झलक एक ही झटके में दूर हो गई। ‘अपना ध्यान रखना’ उसने गर्मजोशी से कहा और गाड़ी में बैठ गई।

मैं जड़वत् खड़ा रहा जब वो धीरे-धीरे मुझसे दूर चली गई। उसके चेहरे पर एक रोमांचक चमक थी। मैंने ऐसा कुछ पहले कभी नहीं देखा था। पहली बार मुझे महसूस हुआ कि यह सब उसके लिए कितना मायने रखता है। मेरा मन शांति और कृतज्ञता से भर गया था। उसे जीवन का उद्देश्य ढूँढने का हक था।

आखिरकार मुझे समझ आ ही गया था कि उसने गाँव के उस विला के लिए मना क्यों किया था जिसे मैं खरीदना चाहता था।
वह पहले ही घर जा चुकी थी।

मेरी पत्नी के सपने

यह एक परिकथा जैसा विवाह था जब तक …

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