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मेरी पत्नी मुझे शराब पीने नहीं देती, मगर प्रेमिका साथ जाम टकराती है..

उसकी पत्नी को उसका शराब पीना बिलकुल ही नागवार है, मगर दूसरी तरफ उसकी प्रेमिका की सोच बिलकुल अलग है....
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(जैसा प्रिय चापेकर को बताया गया)

अक्सर मैंने यह देखा है की शादी के बाद पुरुष पीने पिलाने की अपनी आदतें अपने पुरुष मित्रों या ऑफिस सहकर्मियों के साथ ही रखते है. कम से कम मैं तो उन्ही पुरुषों में से एक हूँ. जब तक दो लोग शादी के बंधन में नहीं बंधते और बस प्रेमी प्रेमिका ही रहते है, तब बहुत सारी नयी आदतें अपनाते हैं और कई पुरानी आदतों को ख़ुशी ख़ुशी अलविदा भी कह देते हैं. मगर शादी कुछ अलग ही होती है. अचानक शादी के बाद दो बिलकुल अलग अलग व्यक्तित्व के लोग पिघल कर एक बन जाते है, या कम से कम बनने की कोशिश तो करते ही हैं. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.

जहां तक मैं जानता हूँ, ज़्यादातर विवाहित दम्पति शराब एक साथ पीना पसंद नहीं करते. लाइफ पार्टनर तो होते है, मगर ड्रिंकिंग पार्टनर बनने में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाते. मगर जर्नल ऑफ़ गैरन्टोलॉजी: सीक्योलॉजिकल साइंसेज, में छपी एक खोज की माने तो जो विवाहित दम्पति साथ पीते हैं, या साथ ही पीने से परहेज़ रखते हैं, वो अपने दांपत्य जीवन में कम दुखी रहते हैं. खैर, इस समय हम परहेज़ की बातें नहीं करते.

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हम दोनों में समानताएं कम थी

कुछ भी बताने से पहले यह बात रखना चाहूंगा कि मेरी कहानी में मसला ये नहीं कि कोई कितनी शराब पीता है, बात तो यह है कि कोई पीता ही क्यों है. मैं और मेरी पत्नी ने लगभग १० सालों तक एक दुसरे को डेट किया. वह एक बहुत ही आध्यात्मिक, शांत और मैच्योर व्यक्तित्व कि स्वामी है और मैं बिलकुल बिंदास, मस्तमौला इंसान जिसे हर कुछ दिनों में पहाड़ अपने पास बुलाने लगते थे. हमारे दोस्त हमेशा हमें देख कर “विपरीत आकर्षण” का तर्क देते थे, मैं कहीं खुद से पूछता था कि क्या कुछ एक जैसा होना हमारे रिश्ते के लिए बेहतर नहीं होता. खैर, हमने शादी कर ली. हम यूं तो बहुत अलग थे, मगर उसकी घरेलु विचारधारा से काफी प्रभावित भी था, और मन ही मन प्रसंशा करता था जिस तरह वो हमारे घर का ध्यान रखती थी. मैंने भी वक़्त रहते अपनी एकल यात्राएं और ओल्ड मोंक की बोतल को अलविदा कह ही दिया.[restrict]

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सच कहूँ तो मुझे अपने जीवन से बहुत प्यार है और उससे भी ज़्यादा प्यार है जीने से. और मुझे अपनी मदिरा से भी बहुत प्यार है. मेरे लिए एक भागते दौड़ते दिन के बाद वाइन का गिलास और एक अच्छी किताब बहुत सुकून देता है. मेरी पत्नी को मेरी इस आदत तो बेशक थी मगर वो इस विषय में मुझे कुछ कहती नहीं थी. चीज़ें थोड़ी बिगड़ने लगी जब हम माँ बाप बने. वो मुझे एक बात पर एक गैरज़िम्मेदार पिता होने का ताना देने लगी. जब भी दोस्त घर आते और पार्टी के दौरान मुझे कॉकटेल बनाने को कहते, वो मुझे यूं घूरती, मानो मैंने कोई संगीन जुर्म कर दिया हो.

कितने दिन उन आखों को झेलता. मैंने अंततः तय कर लिया कि अब पीने पिलाने का कार्यक्रम घर के बाहर, किसी आर्ट एक्सहिबिशन या क्लब, में ही करूंगा. बस इस बात का ध्यान रखता था मैं पीने में अपना हो कुछ भी बताने से पहले यह बात रखना चाहूंगा कि मेरी कहानी में मसला ये नहीं कि कोई कितनी शराब पीता है, बात तो यह है कि कोई पीता ही क्यों है.

और फिर मुझे वो मिली

ऐसे ही एक हास्य कार्यक्रम में मेरी मुलाक़ात तृषा से हुई. तृषा बाहरी साजसज्जा से शोभित तो ज़रूर थी मगर असल में एक बहुत ही व्यावहारिक, सरल लड़की थी. नियति की साजिश देखिये, वो पेशे से वाइन विशेषज्ञ थी, अर्थात जो मेरी ज़िन्दगी की सबसे अजीज़ आदत थी, वो उसकी जीविका थी. तृषा ने मुझे अपने साथ ऐसे ही एक विनयार्ड चलने का आमंत्रण दिया. हाँथ कंगन को आरसी क्या. मैंने झट हाँ कर दी.

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यहाँ मैं कुछ बातें अपने पाठकों को बताना चाहूंगा. शायद यह सब पढ़ कर आप सोच रहे होंगे की मैं अव्वल दर्जे का शराबी हूँ, जिसे शराब से आगे कुछ नहीं सूझता हूँ. सच तो यह है की मुझे अपने पेय से प्यार है. हमारे समाज में बहुमत की मानसिकता ये है कि शराब एक बहुत ही पौरुष का काम है. इसलिए तो चाहे समाज का कोई भी वर्ग हो, शराब ने कई गृहस्तियाँ उजाड़ी है. पुरुष पीते है और उनकी पत्नियां काजू और पकोड़ियां परोसने तक ही सिमित रहती हैं. मेरी एक महिला मित्र सिर्फ हिंसा के डर से शराब को हाँथ नहीं लगाती. शराब देखते ही उसे अपने बचपन की दर्दभरी यादें हिला जाती हैं जब उसके पिता शराब के नशे में धुत उसकी माँ का उत्पीड़न करते थे और वह, एक नन्ही सी सहमी बच्ची, दरवाज़े के ओट से सब सुनती और देखती थी. मैं कई ऐसी भी महिलाओं को जानता हूँ जो किटी पार्टी में सिर्फ इसलिए शामिल होती है ताकि वो भी मदिरापान का आनंद ले सकें.

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हमारी रूचियां मिलती हैं

अगले कुछ सालों में मैं और तृषा एक दुसरे को प्यार करने लगे. सच मानिये तो हमारे इस बढ़ते प्यार का कारण हमारे सामाजिक और निजी ज़िन्दगी में मिलने वाली समानताएं थी. हाँ ये बात कि हम दोनों ही शराब से ख़ासा स्नेह रखते थे, हमारे संबंधों को और मज़बूत करता था. मुझे ये स्वीकार करने में कोई ग्लानि नहीं कि उसके साथ बिताये प्यार में सरोबार वो दिन और रात मेरे जीवन के शायद सबसे स्मरणीय पल हैं. मैंने अपनी शादी के सात सालों में हर कोशिश की अपनी पत्नी को खुश रखने की मगर वो मुझसे कभी संतुष्ट नहीं हुई, उसकी चिड़चिड़ाहट सिर्फ बढ़ती गई और उसने कभी कोई कोशिश नहीं की हमारे बिखरते रिश्ते को सवारने की. इतने सालों बाद अंततः मैं भी उदासीग हो गया था. काम के बहाने अब में अधिकांश दोपहर भी तृषा के साथ ही बिताता. जहाँ दोपहर की गर्मी में हम बैठे फिल्में देखते, शाम को बुद्धिजीवी विवाद करते और रात होते ही रज़ाई में एक दुसरे की नज़दीकियों की गरमाई में सुकून से सो जाते.

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कभी कभी जब सही गलत के जाल में फंसने लगता हूँ, मैं इस आत्मग्लानि की सोच को दूर झटक देता हूँ. शायद मैं और मेरी पत्नी एक साथ होने के लिए बने ही नहीं है. हम ब्लॉक्स के वो टुकड़े है जो जबरन एक दुसरे में फिट हो तो जाते है, मगर मौका देखते ही फिर छिटक जाते हैं. कभी कभी बुरा लगता है मगर मैं फिर खुद को समझाता हूँ कि हमें एक ही ज़िन्दगी मिली है और अगर वो भी हम अपने पसंद के लोगों के साथ और पसंद के काम करते नहीं बिताएं तो फिर सब बेमानी है.
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