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मेरी शादी लड़के से नहीं, उसकी नौकरी से हुई थी

परिवार ने उसकी शादी एक बहुत ही सफल अधिकारी से करवा दी. मगर उसके सपने तो कुछ और थे.
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अपनी शादी में वो इतना अकेला क्यों महसूस कर रही थी?

“साथ कुछ और ही होता है. साथ आपको जकड़ता नहीं, बांधता है. आप एक दुसरे के साथ रहते हो, एक दुसरे का ख्याल करते हो और बिना किसी कारण एक दुसरे के लिए चिंतित होते हो. आप बिना कहे ही एक दुसरे के मन की बातें समझ लेते हो और जब बातें करते भी हो जो बिना किसी झिझक के. साथ एक दुसरे की इज़्ज़त करना और एक दुसरे के साथ अपनी ज़िन्दगी का साझा करना होता है.”

मैं चुपचाप सुनती रही. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं उन लम्बी खामोशियों  कहूँ.

“मेरी शादी मगर डर के बारे में है. डर की अगर मैंने कुछ गलत किया तो मुझे उलहाने तो नहीं मिलेंगे एक अमीर पिता की नासमझ बेटी होने के उलाहने, या फिर ये डर की मैं सबकी उमीदों पर तो खरी उतरूंगी. ये डर की कहीं मुझे तिरस्कृत तो नहीं किया जायेगा या फिर ये की मुझे वो प्यार और सम्मान तो मिलेगा जिसकी मैं हक़दार हूँ. या फिर बस ये डर की मैं खुद की तरह तो नहीं रहने लगूंगी. ये मेरी मर्ज़ी नहीं थी की मैं एक अमीर परिवार में जन्मी थी और ये मेरी मर्ज़ी नहीं थी की मेरी शादी एक गरीब परिवार में हुई. मगर फिर भी मुझे इन गुनाहों की सजा मिल रही है जिसे मैंने किया ही नहीं है.”

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उन दोनों की शादी दोनों परिवारों के बड़े लोगों ने तय की थी. शिखा बोकारो के एक संपन्न व्यावसायिक परिवार की बेटी थी और मोहित एक प्रोबेशनर आईएएस. लड़के के बारे में नहीं जानती मगर इतना पता है की लड़की से कभी उसके जीवन साथी के विषय में राय नहीं मांगी गई थी. उससे तो ये भी नहीं पुछा गया था की उसे शादी करनी है या नहीं.

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उससे तो ये भी नहीं पुछा गया था की उसे शादी करनी है या नहीं.

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हम पढ़ कर कुछ बनना चाहते थे

मुझे आज भी याद है की उसने कितना विरोध किया था जब उसके परिवार ने उसकी शादी के बारे में उसे सूचित किया था. हम दोनों बहुत ही अच्छी सहेलियां थे और हम अक्सर अपने भविष्य के सपने साथ देखते थे. और हमारे उन सपनों में शादी की जगह तब तक नहीं थी, जब तक हम आत्मनिर्भर नहीं हो. हम दोनों छोटे शहर की लड़कियों के लिए ये बहुत बड़ा सपना था. हमारे शहर में लड़कियां कॉलेज सिर्फ तब तक जाती थीं, जब तक की हमारे घरवाले हमारे लिए लड़का नहीं देख लेते थे. स्कूल के बाद मैं और शिखा पटना के सबसे अच्छे कॉलेज पटना विमेंस कॉलेज पढ़ने चले गए. ये हमारे लिए हमारे सपनों की तरफ बढ़ता एक कदम था. मगर कई लड़कियों के लिए ये एडमिशन एक अच्छे रिश्ते का टिकट था. अच्छा रिश्ता अर्थात कोई आईएएस, आईपीएस, आईएफएस या आर्मी अफसर.

तो लड़कियां अक्सर लड़को से नहीं, उनकी नौकरीओं से विवाह करती थी. उसकी शादी किस नौकरी से होगी, इसका फैसला इस बात से होता था की उस लड़की के परिवार की खरीदने की क्षमता कितनी है और दूल्हे के सेहरे पे क्या दाम छपा है. सच कहूँ तो दूल्हे की नीलामी जैसा ही कुछ होता था. जिसकी बोली सबसे ज़्यादा होती थी, उसके घर की बेटी का विवाह उससे पक्का हो जाता था. लड़के के परिवार या रहनसहन को ज़्यादा तवज़्ज़ो नहीं दिया जाता था.

हमारे ग्रेजुएशन के आखिरी साल में शिखा के परिवार ने उसकी शादी तय कर दी. उसने बहुत गुहार की, मिन्नतें की ताकि उसे आगे पढ़ने दिया जाए मगर उन्होंने उसकी एक न सुनी. “ये शादी की बिलकुल सही उम्र है. अभी तुम सुन्दर हो मगर उम्र के साथ जब तुम्हारे साथ खूबसूरती नहीं रहेगी तो अपनी कास्ट का अच्छा लड़का मिलना नामुमकिन हो जायेगा.”

“मगर मैं अभी सिर्फ इक्कीस साल की हूँ. आगे पढ़ना चाहती हूँ. मुझे पोस्ट ग्रेजुएशन करना है, फिर मैं आईएएस के लिए पढ़ना चाहती हूँ. क्या पता, एक दिन मैं एक बहुत बड़ी अधिकारी बन जाऊं. फिर आप सब को गर्व होगा की आपकी बेटी एक आईएएस है न की आपका दामाद.”

शिखा के इस तर्क और सपने को सबने बचपना कह कर यूँ ही हंसी में उड़ा दिया.

नौकरी क्यों करनी जब शादी कर के आराम से रह सकती हो?

‘मगर उसकी पढ़ाई और उसके सपनों का क्या आंटी?” मैंने भी शिखा की तरफ से तर्क देने की कोशिश की.

“लोग ऐसी नौकरी पाने के लिए मेहनत करते हैं और तब जा कर उन्हें ये नौकरी और उससे जुडी ऐशोआराम की ज़िन्दगी उनके नसीब में आती है. शिखा को तो बिना किसी मेहनत के ये ज़िन्दगी मिल रही है. अगर शादी के बाद उसके ससुरालवाले चाहेंगे तो वो भी आगे पढ़ सकती है, वरना क्यों अभी से इतनी मेहनत करना,”  जब मुझे ये बातें समझाईगई, तो मैं समझ गई की शिखा के भविष्य का फैसला तय हो चूकाहै.

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शिखा की शादी बहुत धूमधाम से हुई. जब शिखा अपने ससुराल पहुंची तो उसके साथ आये उपहार रखने के लिए ससुराल में जगह नहीं थी. अपने पति के घर पहुंचने में उसे ४० किलोमीटर लम्बी गावों की सड़कों का सफर करना पड़ा.

“मेरे लिए एक आलिशान बंगले से एक कच्ची मिटटी के बने गाँव के घर का सफर बहुत जल्दी तय हो गया. पहले ही दिन से मुझसे ये उम्मीद की जाने लगी की मैं उनकी तरह जीना शुरू कर दूँगी और उस घर को अपना घर मान लूंगी,”शिखा ने मुस्कुराते हुए कहा.

मैंने भी सुना था की उसका ससुराल पक्ष सामान्य से किसान थे और यह बहुत ही बड़ी बात थी की ऐसी परिस्तिथि के बावजूद मोहित ने आईएएस क्वालीफाई किया. सचमुच ये सराहनीय था. “पता है, अगर वो मेरे पति के परिवारवाले नहीं होते तो शायद मेरी नज़र भी उनपर नहीं पड़ती. और यहाँ आज हालत ये है की वो मुझे बार बार ऐसे उलाहने देते हैं और जताते हैं जैसे उनके बेटे से शादी कर के उन्होंने मुझे कृतज्ञ कर दिया है,” उसने कहा. शिखा की आवाज़ में गुस्सा और तंस दोनों ही था.

मैंने शादी उससे की मगर मिली मुझे उसकी लम्बी दूर तक की फॅमिली

“मगर तुम्हारा अपने पति के साथ कैसा रिश्ता है?” मैंने शिखा से पुछा. शादी के सात साल बाद आप सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि भावनात्मक तौर पर भी अपने साथी के बहुत करीब आ जाते हो.

“शुरू में सब कुछ बहुत ही खूबसूरत था. जब उसकी ट्रेनिंग चल रही थी, वो वक़्त हमारे लिए हनीमून जैसा ही था. शादी बिलकुल जादू जैसी होती है. अगर आप किसी बिलकुल ही अजनबी से मिलते हो तो तुरंत ही बहुत ही अनमोल रिश्ता बन जाता है. तुम नहीं समझोगी क्योंकि तुम्हारा प्रेम विवाह हुआ था. ऐसा कहा जाता है की ये मन्त्रों की शक्ति के कारण होता है. शादी के पहले कुछ दिनों में शारीरिक आकर्षण के कारण दो लोग पास आते हैं और फिर उनकी आत्मा एक दुसरे से प्यार करने लगती हैं.

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खैर, जब उसकी ट्रेनिंग ख़त्म हुई और उसे पोस्टिंग मिली, उसका परिवार हमारे साथ ही रहने लगा. सिर्फ साथ रहते तो कोई बात नहीं थी, मगर अब हर बात में उनका हस्तक्षेप भी बढ़ने लगा. मैं उसके माता पिता को ऐसा करते देखती तो शायद समझ भी आता, मगर यहाँ तो भाई बहन से लेकर दूर दूर के रिश्तेदार भी हर बात में टांग अड़ाने लगे. हमारी शादी बहुत भीड़ भाड़ वाली हो गयी थी.”

उसकी आँखों में उदासी मुझे साफ़ दिख रही थी. अपनी बेटी के लिए सबसे कीमती गुड़िया लेना और बात है और उसके लिए सबसे अच्छा दूल्हा खरीदना और बात है. ऐसा करते हुए अक्सर समाज और परिवार भूल जाते हैं की शायद ऐसे लड़के उनकी बेटी का भविष्य सुरक्षित कर दें, उनका समाज में ओहदा बढ़ा दें मगर क्या उनकी बेटी उस बिलकुल अलग माहौल और परिवार में खुद को एडजस्ट कर पायेगी? क्यों नहीं समाज और परिवार समझते हैं की एक लड़की पर क्या बीतती होगी और उसे कितने त्याग और बलिदान देने पड़ते होंगे, उस बेमेल शादी को निभाने के लिए?

मैं उनके लिए कोई महत्त्व नहीं रखती

“हमारे समाज की ये प्रथा है की जब भी कोई सफल होता है तो उसका पूरा खानदान और गांव के सभी लोग भाग कर उसके पास आ जाते हैं, सबको ये बताने के लिए की उसकी उस सफलता में उनका भी कुछ योगदान है. मोहित अपने परिवार से ही नहीं बल्कि अपने पूरे गांव से पहला आईएएस अफसर है. मुझे पता है की उसके परिवार को बहुत सारे बलिदान देने पड़े अंकित के इस सफर में. मैं परिवार के प्रति उसकी ज़िम्मेदारियाँ समझती हूँ और जानती हूँ की उसके समाज की तरफ भी उसके कुछ कर्त्तव्य हैं. मगर मेरा क्या? क्या मैं उसके जीवन का हिस्सा नहीं हूँ? क्या मैं सिर्फ उसके बच्चों को जन्म देने के लिए ही उसके जीवन में आई हूँ,” अब वो बहुत क्रोध में थी.

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सिर्फ औरत ही क्यों एडजस्ट करे?

“मैंने उसके परिवार के हिसाब से अपने आपको पूरा बदल लिया है. मगर सारे दिन की थकान के बाद जब रात को हम दोनों अकेले होते हैं, वो मुझे मेरी कमियों की एक लम्बी सी लिस्ट थमा देता है. ये वो लिस्ट होती है जो उसके परिवार ने उससे कही होती है. जो इंसान रात को मेरे पास आता है, वो मेरा पति नहीं, शिकायतों से भरा किसी का बीटा, भाई, अंकल होता है. उसे मेरे प्रति अपने परिवार का रुखा व्यवहार तो नहीं दीखता मगर उनके प्रति मेरी आसक्ति ज़रूर दिख जाती है.”

ये सिर्फ एक स्त्री की ज़िम्मेदारी नहीं की वो अपने पति के घर और परिवार को अपनाये. ये दोनों तरफ से बराबर होना चाहिए. लड़कियों से तो ये उम्मीद की जाती है की वो परिवार के रीति रिवाज़, रहें सहन को अपना ले मगर कुछ चीज़ें और रीतियाँ उसके अनुसार भी तो बदलनी चाहिए. इस पूरी व्यवस्था में पुरुष का एक बहुत ही महत्वपूर्ण किरदार होता है. आखिर वो बैंड बाज़ा बारात लेकर खुद गया था उस लड़की से विवाह करने और अब  लड़की को अपने ससुराल में कितना मान सम्मान मिलेगा, ये पति के रवैये पर ही निर्भर करता है.

उस लड़की से विवाह करने और अब  लड़की को अपने ससुराल में कितना मान सम्मान मिलेगा, ये पति के रवैये पर ही निर्भर करता है.

अगर वो खुद अपनी पत्नी की इज़्ज़त करता है, तो उसका परिवार भी ऐसा ही करेगा. और अगर वो अपनी पत्नी के साथ बदसलूकी करता है तो परिवार से कुछ भी अपेक्षा रखना बेकार है.

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पुरुषो का आत्मसम्मान होता है मगर औरतों का अहम्

“याद है तुम हमेशा कहा करती थी की हमारे समाज में जो पुरुषों का आत्मसम्मान कही जाती है, वही विशेषता स्त्रियों में अहम् और घमंड कह कर बताई जाती है,” उसने कहा. अच्छा लगा सुनकर की उसने मेरी इतनी पहले कही गई बात आज तक याद रखी है.

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“अपने परिवार के बहकावे में आकर वो मेरा घमंड नहीं बल्कि मेरा आत्म सम्मान रौंद रहा है. मेरी माँ कहती हैं की मुझे और मेहनत करनी होगी अपनी शादी को सफल बनाए के लिए. धीरे धीरे वो उनका बीटा और भाई कम और मेरा पति ज़्यादा हो जायेगा. मगर शायद जब तक वो समय आये, मैं इस रिश्ते से अपनी उमीदें खो चुकी होंगी. जो बचेगा वो बस एक ढांचा होगा जिसे देख परिवार और समाज ज़रूर खुश हो सकते हैं,” मैं अभी भी अपनी प्यारी बचपन की सहेली में वो मस्त मौला खुशमिज़ाज़ लड़की ढूंढ़ने की कोशिश कर रही थी.

“हम दोनों धीरे धीरे एक दुसरे से बहुत अलग होते जा रहे हैं. अब बस हम एक घर शेयर करते हैं और हाँ, कभी कभी एक बिस्तर भी.”

मैं चुपचाप उसे देखती रही. मेरे पास उसे कहने को कुछ नहीं था.

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