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मुझे अपने विवाह में स्वीकृति, प्यार और सम्मान पाने में 7 साल लग गए

उसकी एक अरेंज मैरिज थी और उसे अपना काम छोड़ना पड़ा और घर पर बैठना पड़ा। वह कुंठित हो गई थी जब तक कि उसने फिर से काम करना शुरू नहीं कर दिया
Happy woman in office

मैं सबकी लाड़ली बच्ची थी जो छोटे शहर मैं पैदा हुई थी और वहीं पली बढ़ी थी। 2007 में मेरी पढ़ाई पूरी करने के बाद, मैं बैंगलोर चली गई और वहां काम करने लगी। कुछ वर्षों बाद, मेरे माता-पिता ने मेरे लिए उपयुक्त वर ढूंढ लिया। उन्होंने कोलकाता से अच्छे परिवार की पृष्टभूमि के साथ एक वैल सेटल्ड लड़का चुना। मैं उससे लगभग 15 मिनट तक मिली और इसने मेरा भाग्य सील कर दिया। सब कुछ तय कर लिया गया था।

अगर विवाह सफल रहे तो वे स्वर्ग में बनाए जाते हैं लेकिन अगर वे सफल नहीं हो पाए तो इसका उलटा होता है।

हनीमून का अंत

मेरी शादी दिसंबर 2010 में हुई और मेरा सुंदर जीवन समाप्त हो गया। प्रारंभिक हनीमून अवधि अच्छी थी। हम हनीमून मनाने गोवा गए थे। यह जल्दी ही खत्म हो गया और हम कोलकाता वापस आ गए। वास्तविक जीवन शुरू हुआ। मेरे ससुराल वाले, जिन्होंने शादी से पहले बहुत अच्छा होने का नाटक किया था, अचानक अशिष्ट हो गए।

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मेरी शादी के शुरूआती दिनों के दौरान, जब मुझे अपने साथी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती थी, तो वह मुझसे बहुत दूर होता था। मेरा पति, जिसे रात में कायदे से मेरे साथ होना चाहिए था, वह अपनी माँ के कमरे में टीवी देखता रहता था। वह मेरे सोने के बाद मेरे कमरे में आता था। उसे मुझसे बात करना पसंद नहीं था।

हमारे बीच कोई शारीरिक अंतरंगता नहीं थी, क्योंकि उसके अनुसार मुझमें से दुर्गंध आती थी।
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शादी के बाद हम रूममेट्स की तरह रहते थे, एकमात्र अंतर था कि हमारा मैरिटल स्टेटस बदल गया था। मैं अकेली और उदास महसूस करती थी। मैं बस सबको खुश करने के लिए अच्छी बहू के रूप में एक नौकरानी थी।

मेरे ससुराल वालों का स्वभाव डॉमिनेटिंग था और उनके बनाए गए नियम मेरे लिए थे उनके बेटे के लिए नहीं मेरा पति पूरी तरह मम्माज़ बॉय था। उसकी माँ अब भी उसे एक बच्चे की तरह लाड़ करती थी जिसे पचाना बहुत मुश्किल था। मेरे पति के साथ मेरी शादी बस नाममात्र की थी। वास्तव में तो मेरी शादी मेरे ससुराल वालों के साथ हुई थी। मुझे उनसे प्यार करना पड़ता था, उनकी देखभाल करनी पड़ती थी, उन्हें खुश करना पड़ता था और बदले में मुझे आरोप और कटाक्ष मिलते थे।

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यह निराशाजनक था

मैं अपने जीवन से तंग आ चुकी थी। मेरा पति मुझे देखता तक नहीं था। वह अपना पूरा दिन ऑफिस में या दोस्तों के साथ घर से बाहर बिताता था। एक नए शहर में, बगैर नौकरी के, मुझे उसके माता-पिता के साथ रहना पड़ता था और उनकी इच्छा के अनुसार जीवन बिताना पड़ता था। मैं अपनी घुटन भरी जिंदगी से निराश हो चुकी थी।

शादी के बाद मैंने अपना काम, अपनी पहचान, सब कुछ खो दिया। मैं केवल सबसे स्वीकृति, प्यार और सम्मान की अपेक्षा रखती थी। दुर्भाग्य से मुझे इनमें से कुछ नहीं मिला।

प्रारंभिक दिनों के दौरान, मैं अपने माता-पिता को फोन करके रोया करती थी। वे मुझे कहते थे कि एडजेस्ट करने की कोशिश करूं। मैं भावनात्मक रूप से सूख चुकी थी।

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फिर मैंने अपनी खुशी का प्रभार लेने का और अपनी इच्छा अनुसार जीवन जीने का फैसला किया।

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मैंने खुद को व्यस्त रखने के लिए नौकरी ढूंढनी शुरू कर दी। 2015 में मुझे अपने घर के पास ही एक कंपनी में नौकरी मिल गई। आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि मुझे अपनी स्वतंत्रता की चाबी मिलने पर कितनी खुशी हुई। कम से कम मैं कुछ घंटे तो अपनी इच्छा अनुसार बिता सकती थी। मेरे ससुराल वालों और पति ने मेरी नौकरी का विरोध किया, यह कह कर कि वेतन बहुत कम था। वास्तव में वे रोज के घरेलू काम जैसे खाना पकाना, सफाई आदि को लेकर चिंतित थे। मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि मैं काम पर जाने से पहले और लौटने के बाद सारा काम खत्म कर दूंगी।

मैंने नौकरी शुरू कर दी, यह सुनिश्चित करते हुए कि मेरा घर का काम प्रभावित ना हो। आज घर में हर कोई खुश है और यहां तक कि मैं भी अपने काम से खुश और संतुष्ट हूँ। मैं घर के घुटनभरे वातावरण की बजाए बाहर की ताज़ा हवा प्राप्त कर सकती हूँ।

मैंने अपने जीवन का प्रभार ले लिया

जब मैंने काम करना शुरू किया तो उसका सबसे अच्छा भाग यह था कि मेरे रिश्ते में बहुत बड़ा सुधार आया। मैं बदलाव महसूस कर सकती थी। मैं अपने कौशल दिखाने के लिए ज़्यादा अपडेटेड और आत्मविश्वासी थी। मेरे पति को भी यह महसूस हुआ। उसने देखा कि मैं कितने अच्छे से नौकरी और घर का काम संभाल रही थी। नौकरी से वापस आकर हमने कई सारे विषयों पर बात करना शुरू कर दिया। हम साथ में डिनर करते हैं, टीवी देखते हैं और चीज़ों पर चर्चा करते हैं। इससे बातचीत का अंतर कम हो गया और हमारे बीच शारीरिक अंतरंगता बढ़ गई। उसके समानताओं को स्वीकार करना और असमानताओं का सम्मान करना सीख लिया। हाँ, मुझे शादी के 7 वर्षों बाद स्वीकृति, प्यार और सम्मान मिल गया।

मुझे अहसास हुआ कि जब किसी स्त्री को स्वीकृति नहीं मिलती तो उसके लिए जीवित रहना कितना मुश्किल हो जाता है। कभी भी आशा ना छोड़ें। स्वाभाविक रहें और किसी को आपके साथ दुर्व्यवहार ना करने दें। आप हर एक को खुश करने के लिए नहीं जन्में हैं। अपने लिए काम करें और स्वतंत्र बनें। यह ना सिर्फ पैसा कमाने और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बारे में है बल्कि अपनी पसंद के अनुसार जीने के बारे में भी है। यह आपको अपडेटेड रखता है और आप अपने फैसले बुद्धिमत्ता से ले सकते हैं।
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3 Comments

  1. I dont know k log kisi ki beti k sath aise kaise jarsakte hai.all stories are same.feeling bad for this

  2. Story padh kr Aisa lga jaise kisi n Meri story likh di ho Bilkul Aisa hi mere sath hua AAj job ki Wajah s apni respect feel krti hu

    1. Meri bhi yahi story hai same to same….or mere Abhi 7 saal pure nahi Hye hai..☺☺☺.ek beti hai 6year ki or beta 8month ka ….Mai Abhi bhi usi awastha me hu…job nahi kar sakti Kiki beta bahut chota hai …mere ye saat saal kab pure hoop…pata Nahi

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