वो मुझे मारता था और फिर माफ़ी मांगता था–मैं इस चक्र में फंस गई थी

Saurabh Paul
man abusing woman

(जैसा सौरभ पल को बताया गया)

मैं उस छवि से प्यार कर बैठी जो उसने मुझे दिखाई

ये सब शुरू हुआ था कॉलेज के एक साधारण से क्रश से जब दो लोग एक दुसरे को चुपके चुपके निहारते है और एक दूसरे के बारे में सोचते अपना पूरा दिन भी निकाल देते हैं. उन दिनों मेरी सबसे बड़ी चाहत यह थी की मुझे कोई प्यार करे और मैं भी किसी के प्रेम में खो जाऊं और फिर वो आया. उसके व्यवहार और उसकी नज़रों ने मुझे पूरी तरह मोह लिया.

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“तुम्हारे लम्बे बाल मुझे बहुत पसंद हैं,” वो मुझसे कहता था. “इन्हे कभी छोटे मत कटाना। ” उसकी बातें सुन कर मैं बस लाल हो जाती थी.

शायद ये बात की कॉलेज में इक्का दुक्का ही ऐसे मित्र थे जो अब भी सिंगल थे, मेरे ऊपर हावी थी. शायद इसलिए मैंने इस रिश्ते में बहुत जल्दबाज़ी की और अपने होने वाली साथी को ठीक से जांचे समझे बिना ही शादी कर ली. मैंने उसका सबसे अच्छा रूप देखा था, या यूँ कहूँ की उसने पूरी तैयारी से मुझे अपना सबसे अच्छा रूप ही दिखाया था. मगर ये रूप तो बस शादी के पहले ही था, उसका असली व्यक्तित्व तो शादी के बाद धीरे धीरे उभर कर आने लगा. मेरा परिवार हमारे इस रिश्ते से खुश नहीं था मगर हमने फिर भी शादी कर ली. मुझे ग्रेजुएट हुए कुछ ही दिन हुए थे और मैं करीब छह महीनों से नौकरी कर रही थी.

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उसने मुझे प्रताड़ित कर के बदल दिया

कुछ ही दिनों में मुझे समझ आने लगा की मैंने अपने लिए कैसी ज़िन्दगी चुन ली है. प्रताड़ना छोटी छोटी बातों से शुरू हुई-जैसे चावल ज़्यादा गल गए, या चाय कम पकाई गई, या कपड़ों की इस्त्री ठीक से नहीं हुई– शुरू शुरू में वो मुझ पर ऐसी बातों पर चिल्लाने लगा और फिर जल्दी ही बात शारीरिक चोट तक आ पहुंची. इन सारी घटनाओं के बीच उसने मुझे मेरी नौकरी छोड़ने के लिए भी मजबूर कर लिया था.

वह मुझे नौकरी छोड़ने के लिए मनाने में कामयाब रहा था

“अब मैं ये सब नहीं सहूंगी,” एक दिन मैंने तय किया और उसे ये कह दिया. उस दिन मुझे उसके व्यक्तित्व का एक और पहलु देखने का मौका मिला जिससे मैं अब तक अनजान थी.

मेरा फैसला सुन कर वो अचानक गिड़गिड़ाने लगा. अपने घुटनों पर बैठ कर रोते हुए उसने कहा, “तुम मुझसे छोड़ कर जाने का सोच भी कैसे सकती हो?” मैं खुश होने के बजाये बहुत ज़्यादा कंफ्यूज हो गई.
“ये कैसा इंसान है जिससे मैंने शादी कर ली?ये आखिर है कौन?” मैंने खुद से बार बार पुछा. अगले एक दो दिन में ही उसका हिंसक रूप फिर सामने आने लगा. वो अपना आपा खो कर मेरे बालों को खींच देता था, हाँ, वही बाल जो कभी उसे बहुत पसंद थे. मैं जब भी उसका विरोध करती और उसे छोड़ कर जाने की धमकी देती, वो फिर से गिड़गिड़ाने लगता और माफ़ी मांगता.

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मैं जब भी उसका विरोध करती और उसे छोड़ कर जाने की धमकी देती, वो फिर से गिड़गिड़ाने लगता और माफ़ी मांगता.

मैं इस चक्र में फंसती जा रही थी–प्रताड़ना, माफ़ी और फिर मारपीट. मेरे मानसिक स्वास्थ पर इसका असर होने लगा था. मैं हर वक़्त डरी रहती थी और कुछ भी करने से पहले डरती थी की कहीं मैं कुछ गलत न कर दूँ.

क्या ये एक मानसिक बीमारी थी?

हताश मैं एक मनोवैज्ञानिक मित्र से सलाह लेने पहुंची. उसने मुझसे कुछ ऐसे सवाल पूछे जो मैंने आजतक खुद से कभी नहीं पूछे थे.

“मेरी परवरिश कैसी थी?क्या मुझे सब को खुश करना सिखाया गया था?”

“क्या बचपन में मैंने घरेलु हिंसा देखि थी?”

“क्या कभी मैं किसी हीन भावना से ग्रसित थी?”

इन प्रश्नों के जवाब तो ना ही में थे मगर इन बातों ने मेरे मन में कई सवाल और खड़े कर दिए.

उसके साथ सोने एक और प्रताड़ना से कम नहीं था. मैं खुद के लिए नहीं अब बस उसकी संतुष्टि के लिए ही उसके साथ थी.

मुझे आज भी अच्छे से याद है की उस दिन मेरा जन्मदिन था. मैं शीशे में देख कर अपने बाल बना रही थी. अचानक मैंने अपना प्रतिबिम्ब उस आईने में देखा और खुद को देख कर मैं हिल गई और रोने लगी.

“मैंने खुद को किस परिस्थिति में ला कर खड़ा कर दिया है.”

ये मैं क्या बन गई हूँ?” मैंने खुद से पुछा.

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“वो हंसती, उन्मुक्त, मस्ती करती लड़की कहाँ चली गई थी?शादी के कुछ महीनों ने मुझे क्या सा क्या बना दिया था? क्या मुझे स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर बनना नहीं सिखाया गया था? तो फिर मैं ऐसे कैसे हो गई?”

जब मैं खुद ही अपनी इस छवि को पहचान नहीं पा रही थी, मुझे विश्वास था की मेरे परिवार और मित्र तो मुझे पहचान ही नहीं पाएंगे.

“बस बहुत हुआ!” मैंने अपने उस छवि को देखते हुए खुद से कहा. “मैं ये आईने वाली लड़की को नहीं जानती और न मैं ये बन सकती हूँ. मुझे कुछ भी कर अपने व्यक्तिवव को वापस लाना होगा.

आईने ने मुझे साफ़ तस्वीर दिखा दी

मैंने गुस्से में अपनी अलमारी खोली और कुछ कपडे निकाल पर जल्दी से मैं तैयार हुई. मेरे पास न समय था न ही इच्छा की मैं एक बार खुद को शीशे में देख लूँ. क्या देखती, मुझे पता था की मैं थकी हुई और खोई हुई ही लग रही थी. इतना होश तो था की ज़रुरत की चीज़ें और अपना पर्स लिया और घर से निकल गई. जाने से पहले उसे फ़ोन करना ज़रूरी नहीं लगा मगर बस दरवाज़े पर एक नोट लिख कर छोड़ दिया, “मैं जा रही हूँ. मुझे मिलने की कोई भी कोशिश मत करना”.

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मेरे पास जाने को कोई जगह नहीं थी. मैं अपने माता पिता के घर पहुंची और मुझे यूँ दरवाज़े पर खड़ा देख वो चकित रह गए. शादी के बाद से मैं उनसे कभी नहीं मिली थी. जब मैंने उन्हें अपनी आपबीती बताई, वो मेरे साथ खड़े हो गए और मुझे पुरे दिल से सहारा दिया. उस दिन मुझे ये एहसास हुआ की जो लोग आपको सच मेंप्यार करते है, वो आपको कितनी भी गलतियों और दूरियों के बाद भी अपनाने में एक सेकंड की भी देरी नहीं करते हैं. उन्होंने मुझे मेरी गलतियों के लिए एक पल में माफ़ कर दिया और मैं कई महीनों बाद इतना प्यार और दुलार पा कर भीग गई.

मेरे परिवार ने मेरा भरपूर साथ दिया

“तलाक की अर्ज़ी डालो. मैं आज ही वकील से बात करता हूँ,” मेरे पिता ने उस शाम मुझे कहा. पूरी ज़िन्दगी वो मेरा सबसे मज़बूत सहारा रहे थे और उन्होंने मुझे हमेशा सही और आत्मनिर्भर होना ही सिखाया था. मेरी माँ हालाँकि अब भी निश्चित नहीं कर पा रही थी की क्या करें और बात बात पर रोने लगती थी. हर बार अपनी बेटी की बदकिस्मती के बारे में सोच कर उनके आँसूं निकल जाते थे.
“तुमने उस समय हमारी बात सुनी होती तो आज ये सब न हो रहा होता,” माँ ने आंसूं पोछते हुए धीरे से कहा.

“अब उसे और कमज़ोर मत बनाओ,” मेरे पिता ने रुखाई से कहा. “वैसे भी मैं देख रहा हूँ की ये अब मेरी बहादुर बेटी नहीं है.” उनकी इस बात से मेरे अंदर एक नयीस्फूर्ति और हिम्मत आ गई. खैर मैंने माँ से बार बार माफ़ी मांगी और कहा की मुझे जल्दबाज़ी में कोई फैसला नहीं करना चाहिए था और शादी जैसा बड़ा फैसला तो बिलकुल भी नहीं.

उस रात मैंने हिम्मत जुटा कर अपने पति को फ़ोन किया और कहा, “तुम अब तक तो समझ ही गए होंगे की मैंने तुम्हे हमेशा के लिए छोड़ दिया है. जल्दी ही तुम्हे तलाक के कागजात भी मिल जायेंगे.”
“ये सब क्या है नेहा?मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा है. क्या मैं इतना बुरा हूँ की तुम यूँ बिना बताया मुझे ऐसे छोड़ कर चली गई?” उसने फिर से गिड़गिड़ाना शूरु कर दिया. जैसे ही मुझे एहसास हुआ की वो फिर से अपने गिड़गिड़ाने वाले रूप में आने वाला है, मैंने जल्दी से फोन काट दिया.

उसने मुझ पर झूठे इलज़ाम लगाने शुरू किये

कुछ दिनों बाद जब मेरे वकील ने तलाक के बारे में बात करने के लिए मेरे पति को फ़ोन किया, उसने मुझे भी उसके बाद फ़ोन करा.

“मुझे पता है की तुमने ये कदम क्यों उठाया है. तुम मेरे और मेरे परिवार के जायदाद में हिस्सा चाहती हो. मैं तुम्हे बहुत अच्छे से जानता हूँ. तुम जैसे घटिया और लालची लोग इससे ज़्यादा कुछ सोच भी नहीं सकते,”वो मुझ पर चिल्लाने लगा. मुझे पता था की ये उसका तरीका था मुझे हीं और बुरा दिखने का ताकि वो मुझ पर अपना स्वामित्व और अधिकार दिखा सके. बहुत ही शान्ति से मैंने उसे जवाब दिया,”मैं तलाक के बदले तुमसे कुछ नहीं चाहती हूँ. हाँ मैं तुम्हे कुछ देना ज़रूर चाहती हूँ. मेरे पार्सल का इंतज़ार करना,” यह कहकर मैंने फ़ोन रख दिया.

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जब उसने पार्सल खोला होगा तो उसे उसमे मेरे लम्बे बालों का गुच्छा मिलेगा. हाँ, मैंने वो बाल काट लिए और उन्हें उपहार की तरह उसे भेज दिया. मैंने ऐसा इसलिए किया ताकि उसे ये बात साफ़ समझ आ जाये की मैं उससे अब कोई नाता नहीं रखना चाहती.

अपने बालों के साथ मैंने उसे एक छोटा सा नोट भी भेजा था, जिसमे लिखा था, “इन्हे काट रही हूँ ताकि ये मुझे कभी तुम्हारी याद न दिला सकें.”

उसने कहा कि वह और किसी के साथ भी संबंध रखना चाहता है

उसने मुझसे कहा था कि उसने अपनी एक्स के साथ ब्रेकअप कर लिया था

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