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मुझे संदेह हुआ कि मेरे पति का अफेयर चल रहा है क्योंकि उन्होंने पनीर मांगा

वह चाहती थी कि उसके पति के दोस्त हों, लेकिन उन्होंने उस 'लड़की' के बारे में बात करना क्यों बंद कर दिया?
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(जैसा नीरज चावला को बताया गया)

सप्ताह में दूसरी बार, राहुल ने मुझसे कहा कि उसके अगले दिन के लंच बॉक्स में मैं पनीर रखूं। वह भूल गया कि मैं, राखी, सात वर्षों से उसकी पत्नी, दंग खड़ी थी, अविश्वास और अचरज की भावनाओं के साथ। अचरज इसलिए क्योंकि वह भूल गया था कि मैं जानती थी कि उसे पनीर से कितनी नफरत थी और अविश्वास इसलिए क्योंकि उसने सोचा कि मैं उसके अनुरोध के कारण का अनुमान नहीं लगा पाऊंगी।

मुझे कारण पता था

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मैं पिछले वर्ष उसके कार्यालय की पार्टी में उस लड़की से मिली थी। और ज़ाहिर है, उसे सोशल मीडिया पर देखती रही। ऑफिस में मेरे पति की ‘दोस्त’। नाओमी।

मुझे उस नाम से नफरत थी

नाओमी। साफ-साफ कहूं तो यह नाम एक सुंदर स्त्री, जानकार, सांसारिक, प्यारी और कुछ अन्य विशेषणों का चित्र प्रस्तुत करता था जो हर स्त्री आशा करती थी कि उसे कहा जाए।

मुझ में भी कुछ खूबियां थीं

घरेलू। मित्रवत।
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पत्नीसुलभ

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ऐसा नहीं था कि मैं भोली-भाली थी। मेरा मतलब है, जो भी स्त्री मेरे पति को अपने शिकंजे में कसना चाहेगी उसे पता चलेगा कि मैं तलवारबाज़ी में भी इतनी ही माहिर हूँ जितनी सूप की कड़छी के साथ। लेकिन यह अलग था। वह उसकी दोस्त थी। राहुल ने शिकंजे को ताकत के स्तंभ के रूप में देखा।

मैं एक असुरक्षित स्त्री नहीं हूँ, और मैं राहुल पर भरोसा करती थी, चाहती थी कि उसके दोस्त हों। लेकिन लगभग पिछले महीने से, मुझे संदेह होने लगा था, मुख्यतः उसके बदलते व्यवहार के कारण।

उसका अलगाव, नाओमी के प्रति उसका रूख और यह तथ्य की हमने बात करना बंद कर दिया था। लड़कों के बारे में पूर्वानुमान लगाना बहुत आसान है, खासतौर पर जब उनके पास एक नया खिलौना हो।

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धोखा एक प्रासंगिक शब्द है। एक होता है शारीरिक धोखा और एक होता है भावनात्मक धोखा। अगर उसने शारीरिक रूप से धोखा दिया, तो मैं स्पष्ट थी कि मैं उसे छोड़ दूंगी। वह अस्वीकार्य था और वहीं मैंने रेखा खींची थी। यह तय करने में समस्या थी कि भावनात्मक धोखे में कहां रेखा खींचना है। समस्या यह थी कि वह अनभिज्ञ था कि वह मुझे धोखा दे रहा है। समस्या यह थी कि मेरे मन में जो अभिस्वीकृति की भावना उत्पन्न हो गई थी, उसने मेरे दिल को जकड़ लिया, वह उसे दबोच रही थी और मुझे महसूस करवा रही थी कि मुझे धोखा दिया गया था। समस्या यह थी कि अब उसे सप्ताह में दो बार पनीर चाहिए था जबकि उसे वह बिल्कुल पसंद नहीं था।

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मैंने कई बार कल्पना की थी, कि मैं किस तरह नाओमी को फोन करूंगी और अपने साथ कॉफी पीने को कहूंगी और कई दिनों तक अपने मन में मैंने इस चर्चा की कल्पना करती रही।

“हम सिर्फ दोस्त हैं।”

“बस उसके साथ समय बिताना बंद कर दो।”

“मुझे लगता है कि तुम्हें इस पर मेरे बजाए अपने पति से बात करनी चाहिए। क्या तुम्हें उस पर भरोसा नहीं है?’’

सभी परिदृश्यों में, मुझे लगा कि खामियाजा मुझे ही भुगतना पड़ेगा। मेरा पति मेरे इशारों को संदेह से देखेगा और स्वयं को दूर कर लेगा। नाओमी को पता चल जाएगा कि क्या हो रहा है, ज़ाहिर है, स्त्रियों को हमेशा पता होता है, लेकिन मेरे पास साबित करने का कोई रास्ता नहीं था और इस स्त्री की एक छोटी सी व्यंगात्मक मुस्कान बहुत लंबे समय तक मेरे अहंकार को जलाएगी और उससे भी अधिक लंबे समय तक मुझे यातना देगी।

मैं इस स्थिति तक कैसे पहुंच गई थी? मैं जानती थी कि राहुल की नाओमी से दोस्ती थी और सब ठीक था। फिर क्या बदल गया? क्या था जो इस हद तक मुझे परेशान कर रहा था कि मुझे लगा कि मुझे धोखा दिया गया है? अंत में मैंने पता लगा लिया कि वह क्या था।

उसने नाओमी के बारे में मुझसे बात करना बंद कर दिया था। नाओमी ने क्या कहा या क्या नहीं कहा यह बताना उसने पिछले महीने से बंद कर दिया था।

एक संबंध में वह चरण जब कोई पुरूष उस स्त्री के बारे में बात करना बंद कर देता है जिसके साथ वह बाहर समय बिताता है और घर पर अपनी पत्नी को नहीं बता सकता, तब रेखा खींच चुकी होती है। लेकिन रेखा खींचने वाली मैं नहीं थी। वह राहुल था। रेखा अब हमारे बीच विस्तरित हो चुकी थी और उसका हमारे जीवन पर हावी होने का संकट था।

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“कढ़ी तैयार है मैडम। यह जल जाएगी,’’ मेरी नौकरानी ने जल्दी से गैस बंद करते हुए कहा।

मैंने पनीर को देखा जो अब उनके लंच बॉक्स के लिए तैयार था। मैंने स्वयं को और कढ़ी को विलगाव और भावनात्मक शून्य की दृष्टि से देखा और मुझे एक कड़ी मिल गई जिसने मुझमें आशंका और उम्मीद भर दी। और अचानक मैं विचार की स्पष्टता से भर गई थी जिसने मेरे ऊपर से बोझ हटा दिया था।

मैंने पनीर वाला पैन उठाया और डस्टबिन में फैंक दिया। और फिर मैंने कल की सूखी आलू कढ़ी निकाली और उनका लंच बॉक्स पैक कर दिया।
शाम को वे घर थोड़ा परेशान होकर लौटे।

“मैंने तुमसे आज पनीर रखने को कहा था, कहा था ना?’’

“तुमने कहा था।”

“फिर?’’

“फिर कुछ नहीं। पनीर बनाने का मेरा मन नहीं था,’’ मैंने उनके अचंभित चेहरे को देखते हुए कहा।

फिर मैंने मुस्कुरा कर पूछा,

“मुझे नाओमी के बारे में बताओ…..’’
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