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मुझे अपने विवाहित प्रेमी के साथ लिव इन का कोई पछतावा नहीं

उसकी बेटी आज भी अपनी बिखरी ज़िन्दगी के लिए उसे और उसके चुनाव को ज़िम्मेदार मानती है. मगर उसे लगता है की ज़िन्दगी अगर अपनी मर्ज़ी से जीनी हो तो कुछ तो कीमत चुकानी ही होती है
man and woman hugging in the park

(जैसा पूजा प्रियंवदा को बताया गया)

मुझे कभी एक सामान्य परिवार नहीं मिला

मैंने शास्त्रीय नृत्य की ट्रेनिंग ली है. मेरी माँ तब गुज़र गई थी जब मैं मात्र बारह साल की थी और तब से ही नृत्य ही मेरे जीवन को पूरा करता है. मेरे पिता जो की थिएटर के अभिनेत्रा थे, शराबी थे और मेरी दादी ने मेरी और मेरे पिता की ज़्यादा बातचीत कभी नहीं होने दी. मगर जब दादी का देहांत हुआ तब मैं सत्रह वर्ष की ही थी और मैं कॉलेज की पढ़ाई के लिए दिल्ली पहुंच गई.

दो साल बाद एक डांस के प्रोग्राम में मेरी मुलाकात सुकेश से हुई. वो मुझसे उम्र में करीब दस साल बड़ा था और शादीशुदा था, मगर वो दिल्ली में अकेले ही रहता था. उसकी पत्नी गुजरात के एक गांव में उसके माता पिता के साथ रहती थी. हम दोनों ही एक दुसरे की तरफ आकर्षित होते चले गए.
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कुछ ही महीनों में मैंने अपना पेइंग गेस्ट का कमरा छोड़ कर सुकेश के साथ शिफ्ट कर लिया. सुकेश एक अपार्टमेंट में रहता था और जैसा आम तौर पर ऐसी जगहों पर होता है, किसी को परवाह नहीं थी की हमारी शादी हुई है या फिर नहीं. सबने मान लिया की हमारी शादी हुई ही होगी. उनके लिए तो मैं श्रीमती मिताली सुकेश ही थी. पहले दो सालों तक सब बहुत अच्छा चलता रहा. सुकेश के नए व्यवसास से उसकी कमाई अच्छी रही थी. वो हर महीने एक बार अपने “घर” जाता था और मैं भी अपनी नृत्यांगा की जीवन शैली से संतुष्ट थी.

मेरे पिता को अब मुझसे कोई ख़ास मतलब नहीं था और इसलिए बस अब ये ही मेरा इकलौता घर था. सुकेश मुझसे हमेशा कहता था की वो अपनी पत्नी को तलाक तो नहीं दे सकता था मगर वो हमेशा मुझे ही प्यार करता रहेगा और मेरे साथ रहेगा.

सुकेश मुझसे हमेशा कहता था की वो अपनी पत्नी को तलाक तो नहीं दे सकता था मगर वो हमेशा मुझे ही प्यार करता रहेगा और मेरे साथ रहेगा.

और फिर मैं अपने प्रेमी के बच्चे की माँ बनने वाली थी

हमारी जन्नत में पहला सबसे बड़ा झटका तब लगा जब २३ की उम्र में मैं गर्भवती हो गई. सुकेश यूँ तो बहुत खुश था मगर उस दिन उसने खुलासा किया की उसकी पत्नी और उसके दो बच्चे हैं. मैं टूट गई और मुझे समझ नहीं आया की मैं क्या फैसला लूँ.

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यूँ तो सुकेश ने मुझे वायदा किया की वो इस बच्चे को उतना की प्यार देगा जितना उन दो बच्चों को करता था और ये की वो शादी तो बस नाम भर की है. मगर अब मुझे उसकी इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था. मैंने गर्भपात के बारे में सोचा और अपनी डॉक्टर से बात भी कर ली. मगर मेरे अंदर कुछ था जो मुझे ये कदम नहीं उठाने दे रहा था. मैं सुकेश को बहुत प्यार करती थी और उसके बच्चे की माँ मेरे सबसे सबसे ख़ूबसूरत हादसा था. इसलिए मैंने ये फैसला किया की मैं माँ बनूंगी.

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सुकृति का जन्म हुआ और अब हमारा परिवार एक सुखी और आदर्श परिवार लगने लगा था. मगर अब तक उसके परिवार को मेरे बारे में पता चल गया था तो उनकी कोशिशें शुरू हो गई थी ताकि हम दोनों अलग हो गए. सबसे पहले तो उन्होंने ये कहना शुरू कर दिया की मैं चरित्रहीन हूँ और मैंने जानबूझ कर एक शादीशुदा पुरुष को फंसाया और फिर गर्भवती भी हो गई. उसका भाई मुझे अजीबोगरीब समय पर फ़ोन कर के धमकी देता था की मैं सुकेश से अलग हो जाऊं वर्ण मुझे बुरे अंजाम भुगतने होंगे. एक दिन सुकेश की पत्नी अपने दो बच्चों और सुकेश की माँ के साथ मेरे फ्लैट में आ गई और बहुत हंगामा किया. उसने सबको ये कहा की कैसे मैं उसके पति के साथ अवैध तरीके से रह रही हूँ. उसने कहा की मैं अपनी नाजायज़ बेटी को उसका नाम देने की कोशिश कर रही हूँ.

वो अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अधिक समय बिताने लगा

वो हमारे सबसे मुश्किल साल थे जब हम समाज के दबाव और अपनी बेटी के भविष्य के बीच में फंसे महसूस कर रहे थे. सुकृति तब करीब पांच साल की थी जब सुकेश के बड़े बेटे का एक बहुत ही गंभीर ऑक्सिडेंट हो गया. वो जल्दी से घर गया. उसका बेटा बच तो गया मगर वो बहुत दिनों तक हॉस्पिटल में दाखिल रहा. सुकेश अपनी पत्नी और दुसरे बेटे के साथ दिल्ली में ही एक दुसरे घर में रहने लगा.

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अब उसका समय इन दोनों घरों के बीच में ही बाँट जाता था. वो अक्सर अपने मन को बहलाने के लिए कहता था की “कोई बात नहीं, कई संस्कृतियों में एक से ज़्यादा शादियाँ होती है न. मैं तुम्हे और सुकृति को कम प्यार नहीं करता हूँ और उधर दोनों बेटे भी बड़े हो रहे है, तो उन्हें भी अब पिता की ज़रुरत है.”

उन दिनों सुकेश का व्यवसाय और मेरा नृत्य का करियर दोनों ही अच्छा चल रहा था. अब मैं कई शो करने देश विदेश की यात्राएं करती थी. इन सब के बीच हमने फैसला किया की अच्छा होगा अगर हम सुकृति को बोर्डिंग स्कूल में डाल दें और हमने उसे मसूरी भेज दिया. अगले कुछ साल बहुत ही मुश्किल थे क्योंकि सुकेश अब इन दो परिवारों में फंस गया था. अक्सर वो सुकृति का कोई ज़रूरी दिन मिस कर देता था, कभी जन्मदिन, कभी कोई स्कूल का प्रोग्राम. मगर मैं फिर भी कहीं नहीं जाना चाहती थी क्योंकि सुकृति और सुकेश ही मेरी ज़िन्दगी थे. ये वो घर था जो हमने साथ मिल कर बनाया था.

सुकृति मुझे इस ज़िन्दगी के लिए दोषी ठहराने लगी

अपनी किशोरावस्था में जब सुकृति को हमारे रिश्ते की सच्चाई पता चली तो उसने मुझे हमारी इस उथल पुथल से भरी ज़िंदगी के लिए ज़िम्मेदार ठहराया. मैं उसकी बाते सुनकर अक्सर अपने किये गए फैसलों के बारे में सोचती थी और मुझे लगता था की मैंने जो भी रास्ते चुने, वो बस प्यार के रास्ते थे. मैंने अपनी ज़िन्दगी में कभी कोई प्रस्ताव नहीं माने क्योंकि मुझे सुकेश और सुकृति की चिंता थी.

सुकृति बड़ी हो गई और फिर कुछ सालों में आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चली गई. सुदेश के बेटे बड़े हो गए और उनकी शादी हो गई. सुकेश अब अपने परिवार के साथ ही रहता था और मैं अपने घर में अकेली. वो मुझसे मिलने सप्ताहांत आता था मगर ये कुछ देर का साथ मुझे कभी भी समझ नहीं आया.

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सुकेश को एक दिल का दौरा पड़ा और वो चल बसा. सुकृति ने एक अमेरिकी मित्र से शादी कर ली और अब वो वही अमेरिका में ही रहती है. मुझे आज भी समझने की कोशीश कर रही हूँ की मेरा रिश्ता क्या था-प्यार, अफेयर, या लाइव इन.

अब जब पीछे देखती हूँ, तो लगता है की मैंने मन से एक फैसला लिया था. सुकेश मुझे प्यार करता था, मेरी परवाह करता था और सुकृति को भी वो प्यार देता था. हम किसी भी आम दम्पति जैसे ही थे बस हमारी कानूनी शादी नहीं हुई थी. हाँ, मैंने अपने इस फैसले के लिए एक बहुत ही भारी कीमत भी अदा की और आज उम्र के इस पड़ाव में मैं बिलकुल अकेली हूँ. आज मैं समाज में “दूसरी औरत” की पहचान से जानी जाती हूँ मगर ऐसा तो होना ही था न? अपने मन का करने जाओगे तो कुछ तो कीमत चुकानी ही होगी न.
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