पचास की उम्र में तलाक

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(पहचान छुपाने के लिए नाम बदले गए हैं)

मैंने उसे साफ़ शब्दों में बोला की मुझे भी खुद को और अपने हुनर को समझने का पूरा हक़ है. सुन कर उसे थोड़ा अजीब लगा. यह ख्याल भर की मेरे अंदर भी कोई हुनर हो सकता है, उसे काफी अजीब लग रहा था. लेकिन मैं अपनी बात पर टिकी रही.

मेरी बेटी के दोस्तों को मैं एक बहुत ही “कूल” माँ लगती थी, जिससे वो बातें कर सकते थे और उसकी राय सुन सकते थे. जब किसी बात के लिए वो अपनी माँ के पास नहीं जा पाते तो वो मेरे पास आते थे. मैं शायद अकेली माँ थी जिसकी अपनी दोस्तों की मंडली थी, जबकि बाकी माँएं अपने परिवार और बच्चों से आगे कुछ देखती ही नहीं थीं. और इन सब के बीच राज हमेशा कहीं पीछे ही रहता था ड्राइंग रूम के सोफे में धंसा हुआ.

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पचास की उम्र में तलाक

मेरे बच्चे अपनी अपनी दुनिया में मग्न थे. मीनाक्षी, मेरी बेटी, की एक खुशहाल शादीशुदा ज़िन्दगी थी. मेरे बेटे आकाश की भी शादी हो चुकी थी. दोनों के अपने बच्चे भी थे और सब “ठीक” चल रहा था.

तो फिर उम्र के इस पड़ाव में,(मैं पचास की हो गई थी) आखिर मैं तलाक़ की बातें क्यों कर रही थी.ऐसा नहीं था की राज ने मुझसे कोई गहरे राज़ छुपाये थे या उसके किसी से अफेयर रहा हो. राज देखने में तो बहुत ही शांत और अंतर्मुखी इंसान था मगर असल में वो कई बार बहुत ही आक्रामक हो जाता था और अपने स्वामित्व जताता था. सब्ज़ी लेने के अलावा और किसी भी काम से अगर मैं बाहर जाती तो उसकी प्रतिक्रिया इतनी आक्रामक होती थी, की कभी कभी मुझे लगता की क्यों मैं राज के साथ रह रही हूँ और ये सब बर्दाश्त कर रही हूँ. एक दिन तो राज ने मेरी कलाई इतनी ज़ोर से पकड़ी की मेरी चूड़ी टूट कर मेरी कलाई में जा घुसी और मैं घायल हो गई. ये एक बड़ा कारण है जिसकी वजह से मैंने इतने सालों से लोगों से मिलना जुलना काफी कम कर दिया था.

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जब मीनाक्षी और चिराग छोटे थे, तब मेरे पास ये सब बर्दाश्त करने का बड़ा कारण था. ऐसा नहीं था की वो मुझे मारता था मगर उसके ख्याल से उसका मेरे ऊपर एकाधिकार था. इसके अलावा एक चीज़ जो मुझे बहुत खटकती थी हमारे रिश्ते में, वो ये थी की हम दोनों की कोई समान पसंद नापसंद नहीं थी. हम दो बहुत ही अलग व्यक्तित्व के स्वामी थे.

उसे बैगन से प्यार है और मुझे उससे एलर्जी है. मुझे घूमना फिरना, नए नए लोगों से मिलना पसंद है, और उसे इससे सख्त नफरत है. जहाँ उसे हल्का संगीत पसंद है, मेरी पसंद आज कल के हिसाब से बदलती रहती है. बहुत सोचने पर भी मुझे एक भी कारण नहीं मिल रहा था राज के साथ और निबाह करने का. मैं क्यों खुद को और शायद उसे भी यूँ टार्चर करती रहूँ साथ रह कर. अगर मुझे कभी कोई और साथी न भी मिला अपनी पसंद शेयर करने के लिए, तो मैं अकेले ही खुश रहेंगी अपने हिसाब से जियूँगी बिना किसी की घूरती नज़रों या उलाहनों के.

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आपको किसी और से प्यार होना ज़रूरी नहीं है इस बात को समझने के लिए की आपको अपने साथी से प्यार नहीं.

जब मेरी शादी राज से हुई थी, मुझे उम्मीद थी की वक़्त के साथ साथ मैं उसे प्यार करने लगूंगी. मुझे लगा था की हम दोनों कुछ ऐसे विषय ढूंढ लेंगे जहाँ हम दोनों में समानता हो. मगर भूल गई थी की लड़कों को समझौता करना तो सिखाया ही नहीं जाता.

खैर, मेरा मन अब शांत है. मैंने अपने घर को अपनी पसंद नापसंद के हिसाब से सजाया है और मैं अब चित्रकारी करती हूँ. अपनी कुछ पेंटिंग तो मैंने बेची भी है. इन पेंटिंग से मेरा गुज़ारा नहीं चलता है. राज को मुझे निर्वाह निधि (एलीमोनी) देनी होती है. एक बात तो माननी होगी, इस काम में वो न कोई न नुकुर करता है न विरोध. मुझे गलत मत समझियेगा. राज बुरा इंसान नहीं है, बस हम दोनों एक दुसरे के लिए अच्छे नहीं थे. हम हर बात पर लड़ते थे. यह बात और है की हम बच्चों के सामने अपनी लड़ाइयां शांत कर लेते थे, हालाँकि उन्हें हमारे गहरे मनमुटाव का पूरा अंदाज़ा रहता था. उन्हें पता था की हम उनके सामने लड़ते न हो, मगर हम दोनों ही बस बेमन से समझौते कर रहे थे.

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मेरे बच्चों ने हमारे तलाक के फैसले को बहुत ही समझदारी से लिया. मीनाक्षी तो अक्सर कहती है की उसे तो आज तक समझ नहीं आया की मैंने ये कदम पहले क्यों नहीं उठाया. राज अभी चिराग के रहता है और काफी खुश भी लगता है. हैरत की बात तो ये है की वो वहां उनके घर के कामों में भी हाँथ बटा देता है और इससे हमारी बहु मनाली को भी अच्छा लगता है.

सच कहूँ तो कभी कभी मुझे डर भी लगता है. खासकर तक जब तबियत थोड़ी ख़राब हो जाती है. शुक्रगुज़ार हूँ की तबियत कम ही ख़राब होती है. मेरे नए दोस्त बन गए हैं, जो मेरे ही हमउम्र हैं. तो हम एकदूसरे का ध्यान और हाल चाल पूछते रहते हैं. बच्चे और नाती पोते सब मिलने आते रहते हैं. मगर मैं सबसे ज़्यादा खुश तो तब होती हूँ जब मैं पेंटिंग करती हूँ. मुझे वक़्त का कुछ पता ही नहीं चलता. इतनी ख़ुशी मुझे इससे पहले कभी नहीं महसूस हुई और इस ख़ुशी के लिए तो मैं सब कुछ कुर्बान करने को तैयार हूँ. अभी, और हमेशा.

(जैसा की तूलिका मुख़र्जी को बताया गया)

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