पति पत्नी और प्रतिस्पर्धा

husband and wife

प्रतिस्पर्धा, क्या होती है ये प्रतिस्पर्धा ??

“ऐसी स्थिति जहां दो लोग किसी एक लक्ष्य( goal) को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं या अपने को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।”

आजकल एक नया शब्द शब्दकोश (dictionary) में आकर जुड़ा है Healthy Competition (स्वस्थ प्रतिस्पर्धा) अब प्रतिस्पर्धा और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में क्या अंतर है, वह ज्ञात होना अत्यंत आवश्यक है।

“आपको पता है, कोई व्यक्ति आप से बेहतर है और आप उस चीज का सम्मान करते हुए अपनी पुरजोर कोशिश करते हो अपनी जगह बनाने की या अपने आपको भी उसी व्यक्ति की तरह स्थापित करने की बिना उसकी छवि को किसी तरह का नुकसान पहुंचाए।” ये कहलाता है Healthy Competition.

आजकल के समाज में हर कोई अपनी जगह को लेकर असुरक्षित हैं और अपने आप को बेहतर साबित करने की जद्दोजहद से जूझ रहा है और यह सुरक्षा कब आपको नकारात्मकता की तरफ मोड़ देती है और कब आप अपने बगल वाले व्यक्ति से ही प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं, आपको ज्ञात भी नहीं होता है।

जैसे कि हमारे लेख का विषय है ‘पति पत्नी और प्रतिस्पर्धा’, तो कहा ये जाता है कि पति-पत्नी को हमेशा एक संगठन के रूप में कार्य करना चाहिए। अब यहां ध्यान देने योग्य बात यह हैै कि क्या संगठन के सदस्योंं मे प्रतिस्पर्धा नहींं होती है और यदि होती है तो क्या वह हमेंशा स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के अंतर्गत ही आती है।

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ऐसा नहीं है, सदस्यों में प्रतिस्पर्धा होती है और वह हमेशा स्वस्थ भी नहीं होती है। अब जब सभी लोग अपने आपको दूसरे से बेहतर समझेंगे और इसे साबित करने का भी प्रयत्न करेंगे तो प्रतिस्पर्धा होना एक सामान्य सी बात हो जाती है। और पति पत्नी भी इससे अछूते नहीं रह जाते हैं।

पति पत्नी आपस में या एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा क्यों करते हैं ?

उत्तर बहुत ही आसान सा सामान्य है, “जब वह दूसरे से अपने आप को बेहतर समझते हैं या बेहतर दिखने का प्रयास करते हैं या जब वह अपने आप को एक संगठन ना समझ कर व्यक्तिगत रूप से अधिक अहमियत देने लगते हैं तो प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न होती है।”

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पति पत्नी और प्रतिस्पर्धा

कभी भी कोई भी दो व्यक्ति मानसिक और शारीरिक क्षमताओं में एक समान नहीं हो सकते और यह एक सार्वभौमिक सत्य(universal truth) है। हर व्यक्ति में अपना या किसी और से श्रेष्ठ कुछ ना कुछ अवश्य होता है।और जो यह समझ जाते हैं, वह कभी भी किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं करते और अपने आप को हर अनावश्यक प्रतिस्पर्धा से दूर रखते हैं।

यदि पति-पत्नी यह समझ कर चले कि यह रिश्ता एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने के लिए नहीं बल्कि एक-दूसरे का साथ देते हुए, कुछ नए आयाम स्थापित करने का है तो वह आपसी प्रतिस्पर्धा को क्षण भर में समाप्त कर सकते हैं।किंतु इसके लिए उनको अपने साथ ईमानदार होने की अथक आवश्यकता होगी। कहने का अभिप्राय यह है कि यदि आप अपने साथी से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं या वह आपसे कर रहा है तो आपको यह सर्वप्रथम स्वीकार करना पड़ेगा। जब तक आप यह स्वीकार नहीं करेंगे कि कुछ गड़बड़ है, तब तक सुधार करना असंभव है।

आजकल लोग पहले की अपेक्षा अधिक समझदार हो गए हैं। अब वह अपने सभी रिश्तों को सिर्फ भावुक होकर ना बनाते हैं और ना ही निभाते हैं। जिसके चलते उनको भली-भांति पता होता है कि कौन व्यक्ति प्रतिस्पर्धा करने योग्य है और कौन नहीं। और यदि आपकी प्रतिस्पर्धा, घर के अंदर रहने वाले व्यक्ति के साथ होने लगी है तो इसका अभिप्राय यह है कि आप नकारात्मकता की तरफ रुख कर चुके है और वह आपके रिश्ते को धीरे-धीरे नष्ट ही करेगा।

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पति पत्नी कैसे अपने आप को इस प्रतिस्पर्धापूर्ण स्थिति से बचा सकते हैं ?? या आपसी प्रतिस्पर्धा को कैसे दूर कर सकते हैं ??

समस्या को अपनाने की आवश्यकता है :- सबसे पहले यह मानना पड़ेगा कि आप के रिश्ते में कुछ समस्या हैं।

हीन भावना पर कार्य :- प्रतिस्पर्धा का कारण आपके अंदर की हीन भावना ही होती है। जब कोई अपनी योग्यता को कम आंकता है या अपने आपको एक अनजानेेे से दायरे में बांध देता है और सोच लेता है कि यही उसकी हद है तो वह एक अजीब सी कुंठा से ग्रस्त हो जाताा है और अपनेे से आगेेे बढ़ने वाले हर व्यक्ति से प्रतिस्पर्धा करने लगता है। इस पर दोनोंं लोगों को काम करने की जरूरत हैैै। आपस में बात करे और जिस की भी हीन भावना है, उसको दूर करने प्रयत्न करें।

एक दूसरे को बढ़ावा दें :- पति पत्नी को कभी भी एक दूसरे क लिए अवरोधक नहीं बनना चाहिए बल्कि एक दूसरे को सफलता प्राप्त करने के लिए प्रेेेरित कर के उन पर खुश होना चाहिए।

रिश्ते में सम्मान बरकरार रखें :- अगर आपको लगता है कि रिश्ते में कुछ समस्या है तो इस समस्या को पूर्ण रूप से सम्मानपूर्वक सुलझाना चाहिए। कभी भी अपने साथी का मजाक उड़़ा कर उसकी हीन भावना को बढ़ावा नहीं देना चाहिए बल्कि विभिन्नताओं सम्मान करना चाहिए।
कुछ लड़ाइयां अपने आपसे लड़ी जाती हैं, कुछ समाज से, और कुछ लोगों से, इसी तरह कुछ समस्याएं अकेले सुलझाई जाती हैं और कुछ एक-दूसरे के साथ से।

कभी-कभी किसी ठोकर से सिर्फ आपको चोट पहुंचती है लेकिन जब आपको लगे कि आप अपने आपको या अपने साथी को अकारण ही चोट पहुंचा रहे है, तब वक्त होता है स्व-चिंतन का। और आपके रिश्ते में यदि आपका साथी इन सब समस्याओं से जूझ रहा है तो उसकी ढाल बन जाना ही सबसे बड़ी समझदारी होती है।

जब सफर लंबा हो तो आपसी मतभेद और किसी भी प्रतिस्पर्धा को रोड़ा ना बनाएं। इन सब को एक सुखद अनुभव और सफर की यादों के रूप में याद रख कर, इस लंबे सफर का आनंद लें।

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