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पति पत्नी का ये बेमिसाल मेल

क्यों ज़रूरी है की अपने जीवन साथी की हर छोटी, बड़ी लड़ाई में आप उनके साथ खड़े हो हमेशा?
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छोटी दिवाली की शाम थी, और चमकीली लाइट्स लाने के लिए ये बहुत अच्छा दिन नहीं था. मगर लाना ज़रूरी था इसलिए मैं और मेरे पति निकल पड़े भीड़भाड़ भरी सड़को पर अपनी कार लिए. हमारी आँखें चारो तरफ दुकानों को घूर घूर के देख रही थी ताकि कहीं हमसे लाइट्स की दूकान मिस न हो जाये.

मैंने एक रंगबिरंगी बत्तियों वालीदुकान देखी, और मैंने अपने पति को गाड़ी रोकने के लिए कहा. हमारी बहस छिड़ गयी. पति महोदय गाडी दुकान के सामने रोकने को तैयार नहीं थे और मुझे दुकान के ठीक सामने ही उतरना था. आखिर कोई तुक थी की हम गाड़ी कहीं दूर जा कर पार्क करें, फिर दूर से चल कर आएं, सामान ख़रीदे और फिर इतना भारी बोझ ले कर फिर गाडी तक जाएं. तो मैंने कहा की गाडी वही दुकान के सामने खड़ी कर दो. मगर वह नहीं माने और ट्रक के पीछे धीरे धीरे एक बायां टर्न ले लिया मगर हमारे आधे रास्ते में ही लाइट बदल गई. तभी ट्रैफिक पुलिस वाले ने हाथ हिला कर बड़े उत्साह से हम दो झगड़ते पति पत्नी को बीच रास्ते रोक दिया. रोकता भी क्यों नहीं, हमने उसे दिवाली के पहले कमाई करने के कुछ तरीके जो तश्तरी में परोस कर दे दिए थे. पति महोदय ने बड़े ही बेमन से गाडी रोकी.

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मैं अपने पति को बचाने बीच में कूद पड़ी

“आपने सिग्नल तोडा,” उस पुलिसवाले ने कुछ अकड़ के साथ कहा. ऐसा लगा की बिल्ली के हाथ एक स्वादिष्ट चूहा आ गया हो. मेरे पति कुछ कहते, इसके पहले ही मैं बीच में कूद पड़ी, “हमने सिग्नल नहीं तोडा. लाइट हरी थी मगर उस बस ने इतना टाइम लगा दिया मोड़ने में, कि तबतक बत्ती लाल हो गई. इसमें हमारी क्या गलती?”

जैसा की हमारे देश के हर गली, गांव, शहर, घर में होता है, यह पोलिसवाले भी अपने ट्रेडमार्क तरीके से पति को देखते हुए बोला की वो गाड़ी साइड में लगा कर उसकी बाइक तक चलें, वही बातें होंगी. पति ने गाडी पार्क की और चल दिए उसके पीछे. मैं भी झट से उतर गई और उन दोनों के पीछे चलने लगी.मैं इस पूरे मामले को किसी भी कीमत पर मिस नहीं करना चाहती थी. मैं बहस करने को पूरी तैयार थी और मन ही मन उसकी प्रैक्टिस भी कर रही थी.

मन ही मन खिन्न भी हो रही थी की अगर उन्होंने मेरी बात मान कर उस दूकान के सामने ही गाडी रोक ली होती, तो हम इस झंझट में पड़ते ही नहीं. तभी मैंने पुलिस वाले को ३०० रुपए फाइन के मांगते सुना. “आप चलो पुलिस स्टेशन. हम आपकी कम्प्लेन करेंगे की आप हमे सरासर गलत फंसा रहे हो,” मैंने तैश में कहा.

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मेरे गुस्से की तब सीमा नहीं रही जब उस पोलिसवाले ने मुझसे कहा, “मैडम, आप जा कर प्लीज कार में बैठिये. हम मर्द लोग इस मामले को सुलझा लेंगे. असली गुस्सा तो तब आया जब पति महोदय ने भी मेरी तरफ देखा और मुझे कार में जाने का इशारा किया.

यहाँ मैं उसकी मदद कर रही थी और उसे इस बात की कोई कदर ही नहीं थी.

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मैं बड़े बेमन से कार की तरफ जाने लगी मगर जाते जाते उस पोलिसवाले को यह शाप ज़रूर दे दिया की ऐसा पैसा उसके किसी काम नहीं आएगा.

मैं और पति इस तरह के लड़ाई झगड़ों में एक बहुत ही कारगर टीम की तरह काम करते हैं. जहाँ मौका मिलता है, मैं तुरंत ही अपनी आस्तीन ऊपर कर, ऐसी मौखिक लड़ाई में शामिल हो जाती हूँ, जो बिलकुल आसानी से नहीं हारी जा सकती. मगर हाँ, यह भी बताना चाहूंगी की इस हाथी के दिखाने के दाँत और हैं और घास फूस खाने के और.

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आपकी गाड़ी गलत जगह पार्क है

जब भी मेरे पार्किंग गेट के ठीक पीछे कोई अपनी कार पार्क कर देता है, मैं आपे से बाहर हो जाती हूँ. उस समय मेरा गुस्सा किसी मिसाइल से कम नहीं होता है. ठीक इसके विपरीत मेरे पतिदेव हैं. वो बहुत ही शांत और सुलझे हुए इंसान हैं. वो उस ड्राइवर की इस हरकत के पीछे की वजह सोचने की कोशिश करते और मैं यह सोचती की कैसे उस बेवकूफ ड्राइवर की कार के पहिये की हवा निकाल दूँ.

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जब मेरी मन की भड़ास निकल जाती है और बोल बोल के थक जाती हूँ, तब पतिदेव पता नहीं कैसे सुपरहीरो की तरह आकर अपना मोर्चा संभाल लेते हैं. यह अक्सर तब होता है जब वो ड्राइवर भी धीरे धीरे मेरे द्वारा दिए जा रहे मानसिक और मौखिक उत्पीड़न से काफी ज़्यादा थक चुका होता है और मेरे ऊपर खतरा मंडराने लगता है. ऐसे में पतिदेव का आना ज़रुरत नहीं बहुत बड़ी ज़रूरत हो जाती है.

मुझे सँभालने दो

हम देश के जिस कोने में रहते हैं वहां पुरुषों का प्रभुत्व बहुत ज़्यादा है. यहाँ जहाँ कुछ पुरुष मानते हैं की स्त्रियों को सिर्फ दिखना चाहिए, सुनना नहीं, वो बिना किसी लड़ाई में पड़े चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं. दूसरी तरफ कई ऐसे भी पुरुष हैं जो औरतों के आगे अपने आप को किसी शेर से कम नहीं समझते और दहाड़ने का एक मौका नहीं छोड़ते. दोनों ही सूरतों में हम दोनों की टीम बहुत आराम से काम करती है क्योंकि हमारे पास दोनों नरम और गरम उपचार हैं. जब गर्मजोशी चाहिए तो मैं मैदान में कूद पड़ती हूँ और जब मामला ज़्यादा गर्म हो जाए तो पतिदेव अपने शीतल व्यवहार से सब कुछ संभाल लेते हैं. इसी को तो कहते हैं न शादी का बंधन.

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