कैसे उसकी परफेक्ट शादी उसके “मोटापे” के तानों के नीचे दबने लगी

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अपने वज़न को लेकर मैंकभी फिक्रमंद नहीं थी

मुझे आज भी याद है जब मेरी बेटी सत्रह साल की हुई थी, हमने एक शानदार पार्टी का आयोजन किया था. मैंने बहुत मेहनत से साड़ी यूँ पहनी की सारी चर्बी छुप जाए, फिर हल्का मेकअप किया और पार्टी के लिए मैं बिलकुल तैयार थी. “तुम्हारी माँ तो बम लग रही हैं,” बेटी के एक दोस्त ने धीरे से कहा. वैसे तो मुझे यकीन था की ये बात मेरी तारीफ़ में ही कही गई थी मगर कही ऐसा तो नहीं की बम से उसका मतलब सच में एक गोलमटोल खतरनाक बम ही हो. खैर, मैंने मन से ऐसे विचार फेंके और पार्टी में शामिल हो गई.

फोटो नहीं, प्लीज

सब कुछ बिलकुल मज़े से चल रहा था और फिर मुझे अचनाक अपने पति के साथ फोटो खींचने की बहुत लालसा हुई. बस एक नार्मल जोड़ों वाला पोज़ जिसमे एक दुसरे के कंधे पर हम दोनों के हाथ हो. उम्मीद थी की एक अच्छी सी फोटो खिचवाकर जल्दी ही फेसबुक पर अपलोड कर दूँगी. मेरे पति को मेरी फेसबुक पर अपलोड करने की आदत से बहुत चिढ़ है और मुझे फेसबुक से सच्चा वाला प्यार. तो जैसे ही हमने फोटो खींचने के लिए एक बढ़िया पोज़ बनाया,पति ने क्लिक के दबते ही कैमरे के लेंस को हाँथ से ढक दिया. बस फिर क्या था. मैं बुरी तरह से आहत हो गई और मैंने अपने पति से कहा, “अच्छा अब तुम मेरे साथ एक फोटो में नज़र भी नहीं आना चाहते.”

पति ने ऐसी कड़ी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं की थी और वो बिलकुल सकपका ही गए. बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला और बोले “बिलकुल! तुम इतनी सुन्दर लग रही हो. अगर कोई मेरी फोटो देख ले तो कहेगा,की लंगूर के मुँह में अंगूर.”

“सच में है या अब मैं मोटी हो गई हूँ और अब तुम्हे मेरे साथ फोटो खींचाने का मन नहीं करता,” मैंने तुनकते हुए कहा.
स्तब्ध से मेरे पति को समझ ही नहीं आया की ये मैंने क्या कह दिया और जवाब में वो बस ये ही कह पाए, “क्या सचमुच तुम ऐसा सोचती हो?”

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हमारे शुभचिंतक परिवारवाले

मैंने कुछ नहीं कहा. अक्सर कुछ न कहकर ही मैं अपना गुस्सा और नाराज़गी ज़ाहिर करती हूँ. मगर एक और बात थी जिसके कारण मैं चुप थी. वो मेरे विचार नहीं थे. वो तो मुझे हमारे करीबी लोगों ने बोल बोल कर मेरे मन में ये बातें भरी गई थी.

“ओह.. तुम्हारा वज़न कितना बढ़ गया है.” अगर ये बात आपके किसी शुभचिंतक यानी आपके रिश्तेदार ने कही हो और खासकर वो रिश्तेदार आपके ससुरालपक्ष का हो तो टिप्पणी कुछ ऐसी लगती है, “हे भगवन, तुम तो अपने पति से भी भारी हो गई हो,” या फिर ये “अरे लगता है आजकल अपने पूरे परिवार के बदले का तुम्ही खा रही हो.” सुना सुना लग रहा है?

मुझे पता है की मेरी सबसे प्यारी जीन्स अब मुझे फिट नहीं होती. मगर क्या फर्क पड़ता है. आजकल तो वैसे भी जीन्स फैशन में नहीं है और मेरी जीन्स काफी घिसी पीटी हो गई है. मुझे पता है की अगर मुझे अपनी कोई पुरानी साड़ी फिर से पहननी है तो पहले तो मुझे अपने ब्लाउज की सिलाई उधेड़ कर उसके काफी बड़ा करना होगा. चाहूँ भी तो अपने बढ़ते वज़न को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती क्योंकि मैंने घर में एक बहुत बड़ा शीशा लगवा रखा है.

यह एक प्राकृत्रिक बदलाव है

ऐसा नहीं है की मैं खुद वापस खूबसूरत और स्लिम नहीं होना चाहती। मैं जब भी सोचती थी की मुझे और आकर्षित होने की कोशिश करनी चाहिए, शीशे में खड़ी वो मेरी हमशक्ल मुझे हमेशा भरोसा दिलाती थी की मैं अब भी आकर्षक हूँ, बस कुछ उम्र हो गई है मगर हूँ मैं अब भी खूबसूरत. मैं अब पहले से ज़्यादा समझदार लगती हूँ, शायद इतने सालों के नित नए अनुभाव मेरे चेहरे को ज्ञान की चमक से और आकर्षक बनाते हैं. जिसे लोग मोटापा कहते हैं, उसे मैं एक खुशहाल जीवन का प्रतिबिम्ब मानती हूँ. माना की वज़न थोड़ा सा बढ़ गया है मगर अब मैं चालीस की हूँ, तो २० वर्षीया लड़की का शरीर कैसे होगा मेरा.

जब भी लोग मुझे मेरे बढ़ते वज़न या झुर्रियों की हलकी फुलकी झलक पर भाषण देते हैं, मैं अक्सर उन्हें अनसुना कर देती थी. कई बार बड़े बुज़ुर्ग कहते हैं, “मर्द तो मर्द ही रहेगा. ये हमारे ऊपर है की हम कैसे उन्हें अपने वश में रखें.”

ऐसी नसीहतों का अक्सर मुझ पर असर नहीं होता था मगर हूँ तो मैं भी इंसान ही. बहुत कोशिशों के बाद भी ये टिप्पणियां मन में घर कर ली लेती हैं. मैंने भी कहीं ये मानना शुरू कर दिया की वज़न घटना स्वस्थ रहने से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है. ये बातें इतनी मज़बूत है की मैं भी मानने लगी की कुछ किलो वज़न बढ़ जाने से अब मैं खूबसूरत नहीं रह गई. इसका असर जल्दी ही मेरी निजी ज़िन्दगी पर भी पड़ने लगा. मैं अपनी सेक्स लाइफ में कोई आनंद नहीं लेती थी क्योंकि मेरे दिमाग में मेरे वज़न को लेकर हीन भावना आने लगी थी. तभी तो जब पति ने मज़ाक में फोटो ख़राब की तो मैंने तुरंत उन्हें “मेरे साथ फोटो खींचने में शर्मिंदा” होने का उलाहना दिया.

प्यार में खूबसूरती

उस शाम जब हम दोनों अकेले थे, मेरे पति ने मुझे अपनी बाहों में भर के पुछा, “अच्छा मैं तो कितना मोटा हो गया हूँ और मेरे सर पर गंज भी दिखने लगी है. तो क्या अब तुम्हे मुझसे कम प्यार हो गया है और क्या अब तुम्हे मेरे साथ फोटो नहीं खिचवाना चाहती?”

“कैसी बातें कर रहे हो तुम?ऐसा सोच भी कैसे सकते हो तुम?”

“ठीक वैसे ही जैसे तुम सोच सकती हो?” उसने मुझे कहा. “अगर हमारा प्यार सिर्फ शारीरिक खूबसूरती पर निर्भर होता तो क्या तुम मुझे इतना प्यार कर पाती? हम दोनों भावनात्मक डोर से बंधे है और हमें एक दुसरे से प्यार है, एक दुसरे के शरीर से नहीं. जब मैं तुम्हे देखता हूँ तो मुझमे अपनी जीवनसंगिनी दिखती है, मेरे बच्चों की एक अद्भुत माँ और एक ऐसी सशक्त स्त्री जिसके बिना मेरी ज़िन्दगी बिलकुल फीकी होती.”

उसने मुझे प्यार से बाहों में भर लिया और कहा, “जब तुमने देखता हूँ तो मुझे दीखता है की हमने कितनी ख़ुशी ख़ुशी कितने साल बिता दिए, न की ये की हम दोनों का वज़न कितना बढ़ गया”

उस दिन समझ आया की हमारा प्यार और रोमांस कही नहीं गया था बस कुछ किलो मानसिक जालों के बोझ तले दब गया था.

हमने दस साल, तीन शहर और एक टूटे रिश्ते के बाद एक दुसरे को पाया

एकतरफा प्यार में क्या है जो हमें खींचता है

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