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पिता ने नयी पीढ़ी को मतलबी कहा मगर जब बात खुद पर आई

उन्हें लगता था की बूढ़े माँ बाप की सेवा करना इतना मुश्किल तो नहीं था मगर फिर भी उनका बेटा या पत्नी ये काम क्यों नहीं कर पा रहे थे?
father son duo

ये इतना मुश्किल भी नहीं होगा

सदाशिवम दम्पति हमारे मित्र तब बने जब सुधा सदाशिवम मुंबई के उसी स्कूल में अध्यापिका बनी जिसमे मैं थी. हम लगभग एक ही उम्र और समान से ही पारिवारिक पृष्टभूमि से थी. उनकी बेटी रिया शिकागो में रहती थी और बेटे रोहन की हाल फिलहाल में ही शादी हुई थी.

सदाशिवम दम्पति के बूढ़े माता पिता भी थे जो बैंगलोर में उनके बेटे रोहन के घर के बगल में ही रहते थे. ये सब एक बहुत खुशहाल व्यवस्था थी क्योंकी दादा दादी को ये लगता था की इस तरह वो पास रह कर अपने पोते काअच्छा ख्याल रख सकते हैं. जब मन होता उसके घर और फिर अपने घर चले जाते थे.

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मगर चीज़ें तब बदलने लगीं जब रोहन और ऋचा की शादी हुई. स्वाभाविक था की युवा दम्पति एक दुसरे के लिए समय निकालने की कोशिश में लगा रहता था. ऑफिस का काम, घर की देखभाल और दादा दादी का ध्यान रखते हुए उन्हें अपने लिए भी समय चाहिए था. मगर इस बीच वो बंद दरवाज़े दादा दादी को अपने लिए रोक का इशारा लगने लगे. इससे बौखला कर वो अजीबोगरीब समय पर रोहन के घर की घंटियां बजाने लगे. रोहन ने एक दिन उनसे आग्रह किया की इस तरह वक़्त बेवक़्त वो घंटी न बजाएं. मगर दादाजी कहाँ सुनने वाले थे. अब रोहन का आग्रह आक्रोश और चिड़चिड़ाहट में बदलने लगा. थक हार कर एक दिन रोहन ने अपने पिता को कहा की वो दादा दादी को अपने साथ रहने के लिए ले जाएँ.

उन्हें ले जाओ.

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सदाशिवम जी रोहन के इस कथन से आगबबूला हो गए और कहने लगे की किस तरह ये पीढ़ी इतनी स्वार्थी और मतलबी है जो अपने बुज़ुर्गों का ध्यान भी नहीं रख सकती.

पता नहीं पत्नी इतनी शिकायतें क्यों करती है?

अब दादा दादी सदाशिवम जी के साथ उनके घर आ गए. सुधा काम करती थी और उसे आधे से ज़्यादा दिन के लिए उन दोनों को घर पर अकेले छोड़ कर जाना ही होता था. इस समय दादा दादी खानसामे के काम पर नज़र रखते, माली के काम को बारीकी से देखते और घर की “पूरी निगरानी” रखते थे. हर दिन अब सुधा का अच्छा ख़ासा समय खानसामे और माली को ये मनाने में निकल जाता की वो नौकरी छोड़ कर न जाएं. हर दिन एक नया मसला होता था जिसे उसे सुलझाना होता था.

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हर दिन इन शिकायतों से थक हार कर वो अपने पति को जब ये बातें बताती तो वो बड़े आराम से कह देते,”अरे वो बुज़ुर्ग लोग हैं और उनके अपने तौर तरीके हैं. दुसरे लोगों को उनसे सीख लेनी चाहिए और सहनशीलता से उनसे पेश आना चाहिए.”

दुसरे लोगों को उनसे सीख लेनी चाहिए और सहनशीलता से उनसे पेश आना चाहिए.”

फिर एक दिन रिया ने फ़ोन कर के बताया की वो माँ बनने वाली है और उसने अपने माता पिता से पुछा की क्या वो उसकी मदद के लिए कुछ दिन उसके पास आ सकते हैं? सदाशिवम के पास न तो ज़्यादा छुट्टियां थी और न ही उन्हें अपने जाने से कोई मदद होती दिखी. तो सुधा ने तय किया की वो अपनी गर्मी की छुटियों के चार हफ्ते अपनी बेटी रिया के साथ गुज़रेगी. आगे के भी दो हफ़्तों की छुट्टी ले ली ताकि और मदद हो सके. और फिर शुरू हुई उसके जाने की तैयारी. सुधा अपनी बेटी के पास जाती और सदाशिवम जी अपने वृद्ध माँ बाप का ध्यान रखते जो उनके ख्याल से एक बहुत ही सरल काम था.

सुधा की सास भी इस नए मेहमान के आने की खबर से बहुत उत्साहित थी. आखिर उनके परपोते या परपोती के आने की खबर थी. मगर उनके ससुर को असली चिंता थी की वो सुधा की अनुपस्तिथि में घर कैसे संभालेंगे. जी हाँ, उन्होंने खुद ही ये ज़िमेदारी ले ली थी की अब घर की देख रेख उन्हें ही करनी होगी. इसका नतीजा हुआ की वो एक दिन गिर गए और उनकी एड़ी की हड्डी टूट गई. अब एक नहीं कई नयी मुश्किलें थी-प्लास्टर, फिजियोथेरेपी, और दवाइयों से द्वन्द.

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और फिर उन्हें समझ आया

सुधा प्लान के हिसाब से शिकागो के लिए रवाना हो गई और सदाशिवम जी को अब अकेले ही अपने माता पिता की देख भाल करनी थी. मगर वो इस बात से बिलकुल विचलित नहीं थे. वैसे भी उनके साथ उनकी माँ तो थी ही फिर क्या मुश्किल आती. उन्हें कुछ अंदेशा नहीं था.

एक ही हफ्ते के अंदर उन्हें खाने में काफी बदलाव दिखने लगे. खानसामा बहुत ही बेमन से खाना बना रहा था और सदाशिवम की माता अपने तरीके के तेल मसाले से भरपूर खाना बनाने लगी थीं. काम वाली बाई अब अपना काम ठीक से नहीं कर रही थी और कमरे अब पहले की तरह साफ़ नहीं दीखते थे. सदाशिवम जब अपनी माँ से इस बारे में बात करता तो उनकी शिकायतों का एक नया पुलिंदा ही खुल जाता.

unhappy man eating breakfast

एक दिन जब वो ऑफिस के लिए तैयार हो रहे थे, तब सुबह के सात बजे दरवाज़े की घंटी बजी. काम वाली बाई आई थी और उसने जो कहा उससे सदाशिवम के पैरों तले जमीन निकल गई. वो अपने पैसे लेने आई थी और वो काम छोड़ के जा रही थी. जब सदाशिवम ने थोड़ी और बात की तो उसके इस फैसले का कारण पता चला. वृद्ध दम्पति बार बार उसे काम के लिए नसीहतें देते थे और हर बात पर उसे टोकते रहते थे. घर के साफ़ कोनों में मकड़ी के जालों की शिकायत करते और चमकते फर्श पर मिटटी की. हर रोज़ उनके पास गलतिओं की एक लम्बी सी लिस्ट होती थी. वो इस रोज़ की किचकिच से परेशां हो कर काम छोड़ रही थी. वो वापस तभी आने का सोचेगी जब “मेमसाब” वापस आएँगी.

जल्दी ही माली और खानसामे ने भी ऐसी ही शिकायतें की और सदाशिवम जी को खाने के बदलते स्वाद का कारण समझ आने लगा.

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आप थोड़ा आराम क्यों नहीं करती, अम्मा?

उसे लगा की माँ को समझाना आसान होगा. “अम्मा अब आपके काम करने की उम्र नहीं है. ये सब लोग कई सालों से हमारे यहाँ काम कर रहे हैं और काम करने का तरीका जानते हैं. आप सिर्फ उनके आने पर दरवाज़ा खोल दिया करो और बाकी का काम संभाल लेंगे,” उसने बोला.

माँ ने तैश में जवाब दिया, “तुम क्या ये कहना चाह रहे हो की तुम्हारी बीवी की तरह मैं तुम्हारा घर और इन लोगों को नहीं संभाल पा रही हूँ?”

सदाशिवम चुप रह गए.

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अब उन्हें समझ आ गया की समय इंसान को बहुत बदल देता है. उम्र सिर्फ सालमात्र का बढ़ना ही नहीं है बल्कि उसके साथ साथ कई और बदलाव का भी नाम है. वृद्धावस्था सच में ही दूसरा बचपन होता है मगर एक बच्चे को बहला फुसला कर समझा सकते हो, मगर आपके माता पिता को यूँ समझाना मुश्किल है.

वृद्धावस्था सच में ही दूसरा बचपन होता है मगर एक बच्चे को बहला फुसला कर समझा सकते हो, मगर आपके माता पिता को यूँ समझाना मुश्किल है.

कई महीनों बाद आज सदाशिवम ने अपने बेटे से बात करने के लिए फ़ोन उठाया.

 

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