Hindi

पिताजी को एक साथी मिल गया लेकिन हर किसी ने उनकी खुशियां मिटाने की ठान रखी थी

उन्होंने अपनी पत्नी को खोने के बाद पहली बार युवा विधवा में एक साथी पाया, लेकिन समाज ने उनकी खुशी को उदार नज़रों से नहीं देखा
old indian couple

वह पूरी तरह सफेद कपड़ों में दरवाजे पर खड़ी थी। युवा विधवा एक सफेद ब्लाउज के साथ उसकी सादी सफेद साड़ी में चुंबकीय दिख रही थी। उसने अपने लंबे बालों का एक जूड़ा बनाया और मेरे पिताजी को तेज नज़रों से देखा।

“आप कल सुबह से अपनी नौकरी पर आ सकती हैं। स्टोर रूम में आपका बिस्तर आसानी से लग सकता है”, पिताजी ने उसे कहा। उन्होंने उसे एक कुक और पूरे घर की देखभाल के लिए नौकरी पर रखने के लिए कुशल पाया। माँ की मृत्यु के बाद, पिताजी ही थे जो घर के सभी निर्णय लेते थे।

“वैसे, आपका नाम क्या है?“ पिताजी ने उससे पूछा।

ये भी पढ़े: भाई और मैं उसकी शादी के बाद दूर होते गए

“यशोदा नमुसुद्रा“, उसने तुरंत जवाब दिया।

मेरी बड़ी बहन ने उसे एक कप चाय के लिए अंदर आमंत्रित किया। हम सब उसके स्वच्छ और साफ रूप से प्रभावित थे। यशोदा दीदी सिर्फ बंगाली ही जानती थीं, लेकिन वह असमिया पूरी तरह समझती थीं। भाषा हम सभी के लिए कोई बाधा नहीं थी, क्योंकि हम सभी बंगाली समझते थे। बुकशेल्फ बंगाली साहित्य की पुस्तकों से भरा हुआ था। पिताजी बंगाली साहित्य के एक महान प्रशंसक थे। हमने अपने बचपन से ही शरत चट्टोपाध्याय, आशापूर्णा देवी, रबीन्द्र नाथ टैगोर आदि के नाम सुने थे और हम प्रायः असमिया गीतों के साथ-साथ बंगाली गीत भी सुनते थे। मेरी बड़ी बहन काफी उत्साहित थी कि उसे अब अपनी बंगाली का अभ्यास का अवसर मिलने वाला था।

वह हमारे लिए खुशी लाई

JOY

यशोदा अगले दिन आई और उसने नौकरी शुरु कर दी। उसके पास केवल तीन सफेद साड़ी, दो पेटीकोट और तीन सफेद ब्लाउज थे। उसे रसोई से जुड़े स्टोर रूम में बिस्तर दिया गया था। वह उसके कपड़ों को बड़े करीने से तह लगाने के बाद उसके बिस्तर के एक कोने में रखती थी। उसकी मौजूदगी ने हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में कई बदलाव किए थे। अब हम दोस्तों या रिश्तेदारों के लिए चाय पार्टियों की व्यवस्था कर सकते थे और कभी-कभी उन्हें दोपहर के भोजन या रात के खाने के लिए भी बुला सकते थे। उसके स्मार्ट हाथ सब कुछ बहुत जल्दी संभाल लेते थे। अचानक, हमारे दोपहर का भोजन और रात का खाना खुशी के क्षण बन गए।

ये भी पढ़े: जब हमने शादी के लिए आठ साल परिवार की हामी का इंतज़ार किया

हर दिन उसके पास पेश करने के लिए कुछ नया होता था। इस तरह की एक अद्भुत कुक थी वह! उसे एक स्वादिष्ट भोजन बनाने के लिए किसी असाधारण चीज की जरूरत नहीं थी। उसे रसोई के बगीचे से सब्जियाँ इकट्ठा करना पसंद था और कई बार अच्छा स्वाद बनाए रखने के लिए वह जंगली जड़ी-बूटियाँ एकत्र करती थी। उसका राइस केक हमारे द्वारा जीवन में खाये गए सभी केक से अधिक स्वादिष्ट था। पिताजी हमारी माँ की मौत के बाद पहली बार खुश थे।

पिताजी को अपनी खुशी मिल गई

सब कुछ ठीक चल रहा था। हम पापा को उनका पसंदीदा हिंदी गाना गाते हुए सुन सकते थे- ’जलते हैं जिसके लिए…’ हमने उन्हें इतने खुशनुमा मिजाज़ में लंबे समय से नहीं देखा था। इसने हमारे घर के माहौल को चमका दिया। इन सब के अलावा, वहाँ कोई था जो सबसे अधिक खुश था। यह और कोई नहीं बल्कि यशोदा दीदी खुद थी। वह लक्स साबुन से उसके लंबे बाल धोती थी और बाल सूखने के बाद सुगंधित तेल लगाती थी। फिर वह आधे घंटे के लिए हमारे आँगन में बैठ कर अपनी कमर तक लंबे बालों में कंघी करती थी। पिताजी ने उसे बालों का तेल उपहार स्वरूप दिया। यह यशोदा दीदी के लिए किसी बड़ी विलासिता से कम नहीं था जिसने बालों का सुगंधित तेल प्रयोग करने का सपना भी कभी नहीं देखा था। उसने खुद व्यक्त किया, पिताजी की उदारता की सराहना की।

हमें कभी भी उसकी खुशी से कोई समस्या नहीं थी। लेकिन एक दिन, पड़ोस की एक औरत ने मेरी बड़ी बहन से पूछा, “क्या तुम्हारे पापा उसकी साड़ी प्रेस करते हैं?“ मैंने ही कुछ दिन पहले उस औरत को यह बताया था। मेरी बड़ी बहन ने प्रियम दी को बताने का फैसला किया, जो हमारी सबसे बड़ी, शादीशुदा बहन थी। वह एक उदास चेहरे के साथ घर आयी और मुझसे सब बताने के लिए कहा। मैंने बताया कि कैसे पिताजी उसकी सफेद साड़ी प्रेस करते हैं, वह उसकी कितनी परवाह करते हैं कि उसके लिए सुगंधित तेल लाते हैं और अब वह कितने खुश हैं। प्रियम दी ने रात में दरवाज़ा खुला रखने के लिए हमें डाँटा, जो रसोई से पिताजी के कमरे को जोड़ता था।

उस दिन, यशोदा दीदी ने खुशी से प्रियम दी के लिए कुछ खास बंगाली व्यंजन पकाए। उसने उत्साह के साथ प्रियम दी को परोसा, लेकिन दी ने उससे बात करना भी पसंद नहीं किया।

ये भी पढ़े: वो मुझे मारता था और फिर माफ़ी मांगता था–मैं इस चक्र में फंस गई थी
मेरी बहन ने धमाका कर दिया

जब वह जा रही थी, प्रियम दी ने पापा के सामने घोषणा की, “यशोदा दीदी को निकाल देना चाहिए।“

उस दिन से सब कुछ बदल गया। पिताजी ने गाना बंद कर दिया। यशोदा दीदी अब पहले की तरह पिताजी के साथ टीवी नहीं देखा करती थी। उसने अद्भुत व्यंजन पकाना जारी रखा, लेकिन उसकी मुस्कान कहीं खो गई थी। अब हम उसे अपने लंबे बालों की देखभाल करते हुए भी नहीं देखते थे। वह चुपचाप अपना काम करती थी और बाकी का समय स्टोर रूम में बिताती थी।

रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

हम सोच भी नहीं सकते थे कि पापा के दिमाग में क्या चल रहा था। लेकिन यकीनन वह अपमानित महसूस कर रहे थे। अंत में, उन्होंने उसे निकालने का फैसला किया।

जाने के समय, उसने काँपती आवाज में पिताजी से पूछा, “ओगो, आपनी की आमाके सात्यी तारीयेसेन (प्रिय, क्या तुम सच में मुझे निकाल रहे हो?)?“ पिताजी चुप रहे। उसने अपने हाथों से उनके पैरों को छुआ और बाहर चली गई। किसी ने उसके चेहरे को देखने की हिम्मत नहीं की। लेकिन हम सबको पता था कि थोड़ा-सा भी शोर किए बिना कहीं कुछ टूट गया था।

ये भी पढ़े: मेरे बॉयफ्रेंड ने मुझसे ब्रेकअप कर लिया जब मैंने उससे कहा कि मेरा शोषण किया गया है

लेखक का नोटः भारतीय समाज में विधवा होना बड़ा अभिशाप है। कोई भी इसका दर्द महसूस नहीं कर सकता। इस औरत को एक बूढ़े आदमी से कुछ प्यार और देखभाल मिली। वह उसे भाग्य के रूप में स्वीकार करती थी और खुद को धन्य महसूस करती थी। उसी समय, मेरे पिताजी ने अपनी खुशी को फिर से पाया। लेकिन हर कोई उनकी खुशी को नष्ट करने के लिए दृढ़ संकल्पित था। इस रिलेशनशिप को समझने के लिए मैं इतनी परिपक्व नहीं था। लेकिन मेरी शादीशुदा बहन ने मेरे पिताजी की एक साथी की जरूरत को क्यों नहीं समझा?

शायद अब समाज थोड़ा बदल गया है, और साथ ही विधवाओं की किस्मत भी। फिर भी, यह समय विधवाओं के खिलाफ भेदभाव की कहानियों को बताने का है।

उसकी मां ने कभी उसके पिता को नहीं छोड़ा लेकिन इसकी बजाय उन्होंने आत्महत्या कर ली

अभी जब मैं माँ को खोने के गम से उबर रही हूँ, तुम क्या मेरा इंतज़ार करोगे?

जब उसने एक वैश्या से शादी का फैसला लिया

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also enjoy:

Yes No