पितृत्व ने किस प्रकार मेरे जीवन को बदल दिया

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संतान से पहले

कोई भी व्यक्ति जो आपको यह बताता है कि माता-पिता बनने के बाद उसके जीवन में अधिक परिवर्तन नहीं हुआ, वह या तो एक निष्क्रय अभिभावक है या फिर एक उदासीन साथी है। अभिभावकता एक ओएस अपग्रेड की तरह है। वह नई कार्यात्मकताओं का एक वर्ग लाता है। अधिकांश के बारे में आप कभी नहीं जानते थे कि आपका शरीर वह कर सकता है। लेकिन नए आकर्शक कार्यों के साथ ही, यह बहुत सारे मालवेयर, ब्लॉटवेयर और बग्स भी लाता है। और अगर बीटा परीक्षण ठीक तरह से नहीं किया गया है, (जिसका अर्थ है, आप डुबकी लगाने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे) तो इसके स्थिर होने से पहले पैच की एक श्रृंखला की आवश्यकता होगी। जीवन जारी रहता है, लेकिन उस तरह जिस तरह हमने पहले कभी अनुभव नहीं किया।

मेरी पत्नी और मैं उच्च विद्यालय (या शायद महाविद्यालय) से दोस्त हैं जो आठ वर्ष तक एक दूसरे को जानने के बाद साढे़ चार वर्ष पहले विवाह के बंधन में बंधे। हमने समानांतर संपर्क ढूँढते हुए और लेंडलाइन पर घंटो लंबी बातें करते हुए ‘जीवन’ आरंभ किया। चर्चा जीवन के लक्ष्यों को साझा करने, अपने-अपने गुणों की अतिश्योक्ति, चुप्पी की एक अच्छी मात्रा और बहुत सारी प्यारी-प्यारी बातों का संयोजन होती थी।

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हम केवल चाय पीने या भुट्टा खाने के लिए लंबी दूरी की यात्रा तय करके उस स्थान पर जाते थे ‘जहां कोई, आता जाता नहीं।’

हम एक फिल्म देखने बारिश और ओलों का सामना करते हुए पहुंच जाते थे, कोई भी फिल्म।

Krishanamurthy with his wife
Krishanamurthy with his wife

और फिर हम तीन हो गए

हम करीब आठ महीने पहले माता-पिता बने। हालांकि पितृत्व की मेरी पहल अभी भी प्रगती पर है, लेकिन मेरी पत्नी ने मातृत्व को तत्काल अपना लिया (कम से कम मेरा तो यही मानना है)। उसे किसी तरह पता चल जाता है कि बच्ची क्या चाहती है- कब उसे भूख लगी है, कब उसे नींद आ रही है, कब वह मस्ती के मूड में है या सिर्फ चिड़चिड़ी है। केवल उसे देखकर और एक ककर्श आवाज़ सुनकर जो किसी और को सुनाई नहीं देती, उसे यह भी पता चल जाता था कि बच्ची पौटी कर रही है। मुझे लगता है कि माताओं में सूक्ष्म दृष्टि स्वाभाविक रूप से आ जाती है।

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इन दिनों फोन पर हमारी चर्चा बहुत छोटी और एक ही एजेंडा के विषय में होती है। ‘‘क्या तुमने खाना खाया?’’, ‘‘तुम्हें कैसा लग रहा है?’’, ‘‘क्या बच्ची की नींद पूरी हुई?’’, ‘‘क्या तुम्हारी नींद पूरी हुई?’’, ‘‘क्या बच्ची ने पेट भर खाया?’’ और सबसे महत्त्वपूर्ण बात, ‘‘उसने पौटी किया?’’। मुझे हैरानी होती है कि किस तरह पौटी हमारी बातचीत और मन का एक अभिन्न अंग बन गई है; कि इस लेख में दो बार उसका उल्लेख किया गया है! बाहर भोजन की योजनाएं अग्रिम रूप से बना ली जाती थी और उसका पालन यंत्रवत कार्य की तरह किया जाता था।

Family
और फिर हम तीन हो गए

कार्यवाही की योजना

अगर हम बच्ची को अपने साथ ले जा रहे हैं, वह स्थान ना तो ज़्यादा गर्म होना चाहिए ना ज़्यादा ठंडा; अच्छी तरह से प्रकाशमय किंतु कम शोर वाला; एक सोफे जैसी बैठक या फिर एक ऊँची कुर्सी वाला; एक अच्छा बाथरूम (अगर जल्द ही नैपी बदलने की आवश्यकता हो)। और अगर हम उसे अपने साथ नहीं ले जा रहे हैं, तो वह स्थान हमारे घर से 15-20 मिनट की दूरी पर होना चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम जल्दी घर पहुंच जाएं। और फिल्मों की बात की जाए तो…जब जीवन ही इतना नाटकीय हो, तो थियेटर जाने की आवश्यकता किसे है, है ना? (सही है)

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अभिभावकता अपने साथ अजीब, काल्पनिक और (लगभग हमेशा ही) भाषणगत प्रश्न लाती है। ‘‘क्या हम माता-पिता के रूप में अच्छा कार्य कर रहे हैं?’’, ‘‘क्या वह हमारे साथ होने पर खुश है?’’, ‘‘हमें उसे दादा-दादी के साथ घर पर छोड़ कर रात्रिभोज के लिए बाहर नहीं आना चाहिए था। अगर वह नाराज़ हो जाएगी तो?’’ हर थोड़े दिनों में मेरी पत्नी मुझसे एक गंभीर प्रश्न पूछती है ‘‘अगर बच्ची और मैं साथ में रो रहे हों तो तुम पहले किसे चुप कराओगे?’’ इसके कारण में दुविधा में पड़ जाता हूं कि लापरवाह पिता या बेरहम पति बनने में से किसका चयन करूं। लेकिन मैं हमेशा अपनी पत्नी को चुनता हूँ।

क्योंकि मैं जानता हूं कि अगर मैं अपनी पत्नी का खयाल रखूंगा तो वह बाकी सब कुछ संभाल लेगी।

यह ध्यान में रखते हुए कि मैं अभी यह लेख टाइप कर रहा हूं, मुझे लगता है कि मैंने हल निकाल लिया है।

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