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सात साल की शादी, दो बच्चे, हमें लगा था की हम सबसे खुशकिस्मत है और फिर…

जब एक बिलकुल स्थिर सी ज़िन्दगी अचानक हिचकोले खा कर बिलकुल उलट पलट जाए तो आप क्या करेंगे?
Indian happy couple

(जैसा इरावती नाग को बताया गया)

तीन मज़ेदार होता है

नहीं, नहीं, नहीं… आप अपना दिमाग इधर उधर मत भटकने दीजिये. अगर मेरी ज़िन्दगी इतनी ही रोमांचक होती तो मैं आज यहाँ बैठ कर ये सब लिख नहीं रही होती. वो जो तीसरा है जो मेरी और मेरे पति की ज़िन्दगी इतनी रोमांचक बना रहा है, वो न कोई पुरुष है न कोई स्त्री.

वो उसका है.

उसकी व्हीलचेयर. जी हाँ, ये काफी नाटकीय खुलासा है मगर अब मुझे नाटकों की आदत है.

मैं आपको समझाती हूँ.

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शादी के सात साल बाद वो एक बोरिंग से ढर्रे पर चलने वाली ज़िन्दगी के हम दोनों आदि होने लगे थे. तब मैंने हमारे रिश्ते में कुछ नया करने का सोचा. कुछ रोमांच चाहिए था ताकि वो बुझी हुई चिंगारी फिर से जल उठे. कहीं अचानक बाहर घूमने का प्लान,या फिर कोई किंकी उपहार. चलिए, कुछ और नहीं तो किसी बढ़िया नए रेस्टोरेंट में बच्चों के बिना एक अच्छा सा डिनर ही सही. कुछ भी जिससे सब कुछ थोड़ा चटक हो जाये।

खैर, लगता है मैंने कुछ ज़्यादा ही मान लिया. मैंने रोमांच चाहा था मगर लगता है कुछ ज़्यादा ही रोमांच आ गया जीवन में. इतना ज़्यादा की अब मुझसे ही नहीं संभल रहा था.

एक दिन जब मेरे पति किसी काम से बाहर गए थे, वो अचानक से बेहोश हो कर गिर गए. अगले दिन भी उनकी तबियत में कोई सुधार नहीं आया. समझ नहीं आ रहा था की आखिर ये क्यों हो रहा है.

उन्हें हस्पताल में भर्ती कराया गया और डॉक्टर ने जिस बीमारी का नाम बताया वो न तो मैंने कभी सुना था और न मुझसे उसका नाम लिया जा रहा था. बस एक ही बात का सुकून था की उनकी हालत इलाज़ से सुधर सकती थी और सब ठीक हो सकता था. इसका मतलब था की वो फिर से चल सकते थे मगर वो कब होगा, ये किसी को नहीं पता था.

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इस नए बदलाव के लिए तैयारी शुरू की

ये सब कुछ इतना जल्दी जल्दी हुआ की मेरे लिए बैठ कर सोचने का कोई समय ही नहीं था. मेरे पास दो बच्चे थे जिनकी मुझे देखभाल करनी थी, और अब शायद ये तीसरा बच्चा था.

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सबसे पहले तो भगवान् की चापलूसी शुरू हुई. आखिर बचपन से हमें यही तो सिखाया जाता है न की कोई मुसीबत आये तो “भाग मंदिर भाग” हमारा सबसे पहला इलाज़ होता है. मैंने भी यही किया. क्योंकि मैं हिन्दू हूँ तो सबसे पहले शुरुवात मंदिरों से शुरू हुई. फिर तो गिरजाघर, दरगाह, गुरुद्वारा और फिर आखिर हमने काला जादू जैसे तरीके भी आजमाए.

जिसने जो बोला, हमने वो किया.

जल्दी ही दिमाग एक स्टेज बन गया था जिसपर रोज़ नए ड्रामा चल रहे थे.

अचम्भा, अजीबोगरीब प्रतिक्रियाएं, सांत्वना सब कुछ सुनने में आया. एक आंटी को मैंने ये कहते हुए सुना, “हे भगवान, ये तो इतनी जवान है. अब इसकी सेक्स लाइफ का क्या होगा?” जैसे की ये सब मेरे लिए काफी नहीं था. एक दिन मेरी सास ने मुझसे कहा, “तुम इतना कुछ झेल रही हो इसलिए आजकल मैं भी तुम्हे चुपचाप बर्दाश्त कर रही हूँ.”

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अपने प्रियजन और दोस्तों का सहारा ही था जिसने मुझे शांत रहने में मदद की. मगर इन सबके बीच जो मेरा सबसे बड़ा सहारा था वो अब भी मेरे पति ही थे.

मेरे पति.

अपने आप को ऐसी हालत में भी किस तरह जीवन जीना है, इसकी प्रेरणा मुझे मेरे पति से मिली. वो अब भी अपने आप को व्यस्त रखते, हँसते, मज़ाक करते थे. मैंने उन्हें कभी भी उदास या चिड़चिड़ा नहीं देखा था. वो हम सब के लिए मिसाल थे.

अपनी जगह बनाना

किसी का केयर गिवर होना शारीरिक और भावनात्मक तौर पर एक नयी ज़िन्दगी ही होता है. हम यूँ तो माँ बन कर सब कुछ करते हैं मगर जब ये रोल हमें किसी और के लिए निभाना होता है तो सब कुछ बदल जाता है.

जब आप अपने जीवन साथी को इस तरह व्हीलचेयर में देखते हो तो कई सवाल मन में उठते हैं.

किस्मत? कर्मा? हम ही क्यों?

बहुत कुछ है जो मन में आता है मगर प्यार एक चॉइस है जो हम करते हैं और शादी एक मेहनत से भरा फैसला. किसी भी तरह की शारीरिक अपंगता, चाहे वो अस्थायी ही क्यों न हो, किसी रिश्ते को अपंग नहीं बना सकती. दो बिलकुल स्वस्थ लोग भी एक अस्वस्थ और अपंग रिश्ते में बंधे हो सकते हैं. तो दोनों में बेहतर क्या है? आखिर वो मूल क्या है जो हम बदल सकते हैं?

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कोई भी नहीं.

मैंने इन दिनों में कई तरह के भावों को महसूस किया है. पति के स्पर्श को, उसे पकड़ कर सोने की चाहत को (उन्हें अब अलग रूम में सोना पड़ता है) मैंने दबा कर जीना सीखा है. कई बार रंगीन कपड़ों में खुद को एक विधवा सा भी महसूस किया है जो हमेशा शादियों और समारोहों में अकेले ही जाती है. जैसे अलग सोना उनकी मजबूरी है, ठीक वैसे ही उनका मेरे साथ अधिकतर जगह नहीं जाना भी एक मजबूरी है. हमारे देश में व्हीलचेयर को चलाने की अधिकतर जगहों पर सुविधा नहीं है. कई बार बहुत अजीब लगता है.

बच्चों ने इस नए परिवेश को बहुत ही खूबसूरती से स्वीकार कर लिया है. मेरी प्यारी बेटी अब जब भी परिवार का कोई चित्र आंकती है, उसमे व्हीलचेयर बनाना नहीं भूलती. सबसे छोटे बच्चे ने तो पापा को कभी चलते हुए नहीं देखा है और अक्सर खुद ही पापा को चलना सिखाने की कोशिश करता है. घर में अभी सबसे नया खिलौना पापा की आटोमेटिक व्हीलचेयर है जिसे पूरे घर में घुमाया जाता है. उसे लेकर अक्सर लड़ाइयां भी हो रही होती हैं.

व्हीलचेयर ने कमरे के हाथी की जगह ले ली है.

मैं अक्सर सोचती हूँ की ये सब यूँ ही कितने दिन चलेगा मगर इन सारे प्रश्नों के बीच में एक चीज़ जो तय है वो ये की अगर चाह है तो राह भी बन ही जायेगी, फिर चाहे वो राह व्हीलचेयर पर ही क्यों न बनानी पड़े.

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