Hindi

ससुराल वालों की आलोचना के साथ जीना

एक आदर्श बहू से अपेक्षा की जाती है कि जब उसके किए हर काम की आलोचना हो रही हो तब वह मुस्कुरा कर सब सहती जाए...
criticism

एक दिन, जब मैं एक बुक स्टोर की कॉफी शॉप में बैठी थी, मैंने दो बुज़ुर्ग महिलाओं को अपरिहार्य वस्तु यानि की उनकी बहुओं के बारे में चर्चा करते सुना। एक बहू और मानव स्वभाव का उत्सुक पर्यवेक्षक होने के नाते, मैंने बेशर्मी से छिपकर उनकी बातें सुनी।

“मेरी बहू को बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है,’’ लाल साड़ी वाली महिला ने कहा। ‘‘उसे पसंद नहीं की कोई उसकी आलोचना करे। अगर मैं उससे नाराज़ हो जाउं तो वह तुरंत जबाव देगी।”

“कौन होगा जो ऐसा नहीं करेगा,’’ मैंने सोचा।

हरे रंग के कपड़े पहनी महिला ने कहा ‘‘इस मामले में मेरी बहू बहुत प्यारी है। भले ही उसे मेरे द्वारा कही किसी बात से चोट पहुंचती है, तो वह चुप रहती है और बहस नहीं करती।”

ये भी पढ़े: एक छत के नीचे रह रहे अजनबियों की प्रेम कहानी उनकी शादी के तीन साल बाद शुरू हुई

मैंने आँखें रोल की।

इस बातचीत को सुनकर मुझे अपने परिवार की बुज़ुर्ग चाचियों की अप्रिय बातें याद आ गई जब वे मुझे बताती थीं कि किस तरह उनके ससुराल वाले उनकी खामियों के लिए उन्हें ताने सुनाते थे, लेकिन उन्हें मजबूरी में चुपचाप सुनना पड़ता था क्योंकि अच्छी बहू/ पत्नियाँ यही करती हैं।

भारतीय समाज में, कई (बहुत सारे!) मूर्त और अमूर्त गुण हैं जो एक बहू में होने चाहिए। एक अच्छे परिवार से होने और कामकाजी होने के अलावा, एक पत्नी या बहू को अच्छी तरह से खाना बनाना, कपड़े धोना, घर संभालना, बजट में रहना और बच्चों की अच्छी परवरिश करना आना चाहिए।

इसके अलावा एक अनकही उम्मीद है कि लड़की पति के परिवार के साथ अच्छी तरह घुल मिल जाएगी और इसका एक भाग यह भी है कि उसका स्वभाव इतना अच्छा होगा कि वह आलोचना को स्वीकार करेगी – वैध भी और अनावश्यक रूप से कठोर भी।

यह संत जैसा गुण बाकी सारे गुणों को पछाड़ देता है, भले ही कोई भी इस तथ्य को खुले तौर पर स्वीकार नहीं करेगा। एक ऐसी बहू जो अलोचकों को उनकी जगह दिखाएगी और अपने लिए खड़ी होगी, वह किसी की भी नज़रों में आदर्श नहीं होगी भले ही वह ऐश्वर्या राय की तरह दिखती हो, लाखों रूपये कमाए और किसी श्रेष्ठ शेफ की तरह खाना पकाए।

ये भी पढ़े: हम पूरी तरह से अलग हैं और हमारी 20 साल की शादी कुछ ऐसी दिखती है

यह समझने में मुझे बहुत समय लग गया कि रिश्तेदारों द्वारा दिए गए सूक्ष्म और कठोर ताने जिनका मकसद सिर्फ दर्द पहुंचाना है, विवाहित जीवन का हिस्सा नहीं हैं बल्कि भावनात्मक शोषण का एक रूप है। तब तक, मैं उन्हें स्वीकार कर लेती थी और वास्तव में उन्हें झेलने के लिए खुद पर गर्व महसूस करती थी, यह सोचकर की उन्होंने मुझे एक मज़बूत व्यक्ति बनाया है। जबकि ऐसा नहीं हुआ था। उनकी वजह से मैंने अपना आत्म-मूल्य और आत्म सम्मान खो दिया था। इसकी वजह से मेरा ध्यान अपने लक्ष्यों और आकांक्षाओं से हट गया था। इसकी वजह से मैं दूसरों की खुशी को अपनी खुशी से ज़्यादा महत्त्व देती थी, जो एक बहुत खतरनाक पैटर्न है, क्योंकि यह दुख की लगभग गारंटी देता है।

unhappiness
Image source

ये भी पढ़े: मैंने अपनी पत्नी के साथ घर छोड़ दिया क्योंकि मेरी माँ मेरे वैवाहिक जीवन को निर्देशित कर रही थी

महिलाएं इन सूक्ष्म तानों की इतनी आदी हो जाती हैं कि वे इन्हें पहचानती तक नहीं है और नहीं जानती हैं कि उनका आत्म सम्मान धीरे-धीरे घट रहा है। घर और परिवार पर ध्यान न देने के लिए आलोचना किए जाने पर एक कैरियर वुमन खुद पर संदेह करने लगेगी। घर पर आर्थिक रूप से योगदान नहीं देने के लिए एक गृहणी कमतर महसूस करेगी। एक महिला जो खाना पकाने में अच्छी है उसकी सराहना नहीं की जाएगी लेकिन घर गंदा करने के लिए उसकी आलोचना ज़रूर की जाएगी। पुरूषों के साथ शायद ही कभी इस नकारात्मकता के साथ पेश आया जाता है।

जिस दिन मैंने गौर किया कि मैं अपने ही बच्चों के साथ लगातार चिड़चिड़ कर रही थी, उसी दिन मुझे अहसास हुआ कि मुझे अपने जीवन में बदलाव करने की ज़रूरत है। मैं एक आलोचनात्मक व्यक्ति नहीं बनना चाहती थी, लेकिन आलोचनात्मक होना भारतीय रिश्तों का अभिन्न अंग माना जाता है और पत्नियाँ और बहुएं इसे सबसे ज़्यादा झेलती हैं।

रिश्ते गुदगुदाते हैं, रिश्ते रुलाते हैं. रिश्तों की तहों को खोलना है तो यहाँ क्लिक करें

ये भी पढ़े: ४० लाख का क़र्ज़, डूबता बिज़नेस और दो बड़ी बेटियां- जब ज़िन्दगी में वो सब खो रहे थे

परिवार लोगों को पूर्णता के सांचे में ढ़ालने के लिए नहीं होने चाहिए। यह प्यार और स्वीकृति के बारे में होने चाहिए। घर ऐसी जगह होना चाहिए जहां दुनिया के कठोर होने पर आने का मन करे, ऐसी जगह नहीं जहां से भागने को दिल करे!

मज़े की बात यह है कि मेरे बच्चों ने मुझे याद दिलाया कि नीचा दिखाने से कैसे निपटना है। जब भी उन्हें अनचाही आलोचना का सामना करना पड़ता है, तो वे मुस्कुराते हैं और जो भी काम वे कर रहे हैं, वे करना जारी रखते हैं। अगर वे किसी को नापसंद करते हैं, तो वे उस व्यक्ति को उल्टा जवाब दिए बिना अनदेखा करते हैं, और उनके चेहरे पर मुस्कान रखते हैं ताकि सामने वाले व्यक्ति को बुरा ना लगे। यह वास्तव में काम करता है। मैंने खुद इसे आज़माया है। जब लोगों को महसूस होता है कि इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है तो लोग आलोचना करके थक जाते हैं। मैं अब बहुत सुखी व्यक्ति हूँ। आज मैं जो कुछ भी करती हूँ, ऐसा इसलिए करती हूँ क्योंकि मैं सच में ऐसा चाहती हूँ ना कि इसलिए क्योंकि निरंतर आलोचना से यह मेरे दिमाग में बैठ गया है।

जब मैं एक डेट के लिए तैयार हुई और पति मुझे सब्ज़ी मंडी ले गए!

एक अरेंज मैरिज का कठोर सच

शादी के बाद संयुक्त परिवार में रहना मेरे लिए अच्छा रहा

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also enjoy:

Yes No