ससुराल वालों के हस्तक्षेप पर काबू पाना

Sukhneet Nagi
Overcoming

जब मैं आठ वर्ष पीछे मुड़कर देखती हूँ, मैं सोचती हूँ कि मेरे लिए स्थितियां किस प्रकार बदली हैं। हम कई सारे उतार चढ़ाव से गुज़रे फिर भी अपने संबंध को बनाए रखने में सफल हुए।

28 अप्रेल 2008: मेरे विवाह का दिन।

मैं घबराई हुई थी, मैं प्रसन्न थी, और मेरे अर्थपूर्ण चेहरे पर इन मिश्रित भावों का प्रभाव अंकित था। हाँ, मैं एक नए जीवन की शुरूआत करने वाली थी। एक जीवन जो बहुत से अवरोधों के साथ प्रांरभ हुआ। एक ऐसी घटना जिसकी चर्चा लोगों के साथ करने में मैं कभी सहज महसूस नहीं करती हूँ।

मेरा विवाह मेरी मौसी की ननद के बेटे से हुआ है। मेरे ससुराल वालों ने विवाह के समारोह की भोजन व्यवस्थाओं के बारे में हंगामा मचाया था और मामले को खत्म करने की जगह उसे बढ़ा दिया था। उन्होंने मेरे साथ हमेशा एक बेटी जैसा व्यवहार किया है, लेकिन उन्होंने मेरे विवाह के दिन को नष्ट कर दिया।


मैं अपने पिता के चेहरे पर पीड़ा देख सकती थी लेकिन कभी नहीं समझ सकी कि भोजन इतना महत्त्वपूर्ण क्यों था। मेरे पिता एक संत जैसे व्यक्ति थे जो लोगों के बारे में कभी बुरा नहीं कहते थे और कभी परवाह नहीं करते थे कि उन्हें कैसा भोजन दिया जा रहा है। मैं इस बात से कभी नहीं उबर पाऊंगी कि विवाह वाले दिन उन्हें इस तरह के अपमान का सामना करना पड़ा। यह केवल शुरूआत थी, और मुझे कई अन्य परीक्षाओं से गुज़रना बाकी था।

हर भारतीय लड़की से शादी के बाद समायोजन और समझौते करने की उम्मीद की जाती है; मेरी बात भी भिन्न नहीं थी। लेकिन जिन घटनाओं ने मेरे विवाह का दिन नष्ट किया उनका मेरे व्यक्तिगत जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा।

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मैं हमेशा अपनी सास की शिकायतों का निशाना रहती थी और हमेशा व्यंगात्मक टिप्पणियां प्राप्त करती थी।

उन्होंने कहा कि मैं उनके बेटे के लिए उपयुक्त दुल्हन नहीं थी और उसके लिए बेहतर लड़की मिल सकती थी, जहां उन्हें बेहतर व्यवहार और सम्मान प्राप्त होता। उनके लिए, मैं ना तो किसी भी तरह से सुंदर थी और ना ही प्रतिभाशाली, हांलाकि मेरे पति ने हमेशा कहा कि उन्हें मुझसे बेहतर लड़की नहीं मिल सकती थी।

स्थितियां की शुरूआत बुरी हुई थीं और मेरे विवाह में तीसरे पक्ष के अनुचित हस्तक्षेप से वे बदतर होती जा रही थीं। मेरे पति का झुकाव हमेशा अपनी माता की ओर अधिक था क्योंकि वे अकेली अभिभावक थीं, और मेरे शिकायत करने पर भी वे उन्हें डांटने से बचते थे। मेरी ननद की भी हमारी हर व्यक्तिगत बात में ‘‘राय” होती थी और वह राई का पहाड़ बना देती थी। मेरे पति चुपचाप देखते रहते थे। इसने उनके और मेरे संबंध को प्रभावित किया। अगर कभी-कभी वे मेरे पक्ष में बोल भी देते थे, तो उनपर गैर जिम्मेदार बेटा और बुरा भाई होने का ठप्पा लगा दिया जाता था।

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विवाह में जो कुछ भी हुआ उसके लिए मेरे पति ने कभी भी मुझे दोषी नहीं ठहराया, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि वे उस सम्मान से वंचित रह गए जो परिवार के दामाद को परंपरागत रूप से प्राप्त होता है। मेरे भाई ने मेरी मौसी के परिवार से सभी संबंध तोड़ दिए थे। लेकिन जब भी मेरे पति और मेरी सास मेरे माता-पिता के घर जाते थे, वे मेरी सास के भाई के परिवार को अपने साथ ले जाते थे। उनकी उपस्थिति स्थितियों को अजीब बना देती थी क्योंकि संबंध अब पहले जैसे घनिष्ट नहीं रह गए थे। मेरी सास चाहती थीं कि उनका सम्मान हो और मेरा भाई उन्हें देखना तक नहीं चाहता था। इससे मेरे माता-पिता के घर में मेरे पति की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई और मैं इसके लिए दुःख महसूस करती हूँ।

हम दोनों एक दूसरे की मानसिक स्थिति समझते थे लेकिन असहाय थे। हम दोनों दुःख झेल रहे थे और आमतौर पर झगड़ पड़ते थे। हम ऐसे स्थान पर पहुँच गए थे जहां हमने महसूस किया कि वस्तुएं कार्य नहीं कर रही है और अलग हो जाना ही एकमात्र विकल्प है। यह केवल हमारे अजन्मे बच्चे की खातिर था कि हमने साथ में रहना जारी रखा। हाँ, मैं गर्भवती थी।

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धीरे-धीरे और लगातार, वस्तुएं व्यवस्थित होने लगीं और परिवार में मेरी स्थिति हर गुज़रते हुए दिन के साथ सुधरने लगी। मेरे बच्चे के जन्म ने मेरे घर का वातावरण बदल दिया। अचानक से, हम सबका एक साझा लक्ष्य थाः अंगद को मुस्कुराते हुए देखना, उसकी प्यारी हरकतों को देखना और उसे नई वस्तुएं सीखते हुए देखना। हमारी चर्चा का विषय उलाहनों और शिकायतों से बदल कर हमारी खुशियों के पिटारे पर आ गया। मेरी सास ने मुझे बाहरी व्यक्ति के स्थान पर परिवार के एक अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार करना शुरू कर दिया। मेरे पति, अंगद और मैं एक बड़ी इकाई के भीतर एक इकाई बन गए।

हम दोनों को यह समझने में 3-4 वर्ष लग गए कि हस्तक्षेप हमेशा एक संयुक्त परिवार प्रणाली का अंग रहेगा, और यह वह आपसी समझ है जो एक दम्पति अपने जीवन में परिवार के अन्य सदस्यों की तुलना में बनाए रखता है जो वैवाहिक समस्याओं और उनके संबंध में सभी अवरोधों से निपटने में उनकी सहायता करती है।

परिस्थितियां चाहे कितने भी कठिन हों, यदि एक दंपत्ति संकट के दौरान एक दूसरे के साथ खड़ा रहता है, वस्तुएं स्वतः ही सहज होना शुरू कर देती हैं।

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