शादी के ३० साल बाद हम क्या बातें करते हैं?

by Jaisurya Das
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मेरे बहुत सारे युवा दोस्त मुझसे पूछते हैं कि तीस साल बाद आखिर हम दोनों में क्या होगा आपस में बातें करने को.

“क्या तुम दोनों अब भी सच में बातें करते हो?”

“अरे, आखिर क्या बातें करते होंगे तुम दोनों. बोर हो जाते होंगे दोनों तो.”

“बच्चे अब बड़े हो गए, ज़्यादातर तो बाहर ही रहते हैं वो अब. तुम दोनों के लिए समय काटना कितना मुश्किल होता होगा न?”

सच कहूँ तो उनके इस कोतुहल के लिए मैं उन्हें दोष नहीं देती हूँ. आखिर आजकल हर रिश्ते की सबसे बड़ी अड़चन “न बात करना” ही तो है ना. साथ तो होते हैं लोग मगर साथ कहाँ होते हैं. दोनों अपने अपने फ़ोन पर गप्पे करने में ही मशगूल होते है अक्सर. प्यार तो बस एमोजिस भेजकर ही दर्शा देते हैं अक्सर. दुनिया के हर कोने में ये एक सच्चाई सेल्फी की तरह नज़र आते है.
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मगर क्या सच में हम खुद के अलावा किसी और को दोष दे सकते हैं अपनी इस हालत के लिए.

हमें बैठ कर गपशप करने की ज़रुरत महसूस ही नहीं होती. जब मोबाइल पर कनेक्टेड है तो इस आडम्बर में क्या रखा है?

हमने फिर साथ रहना सीखा

हमारे लिए भी यह सब बहुत सहज नहीं था. मगर कहते है न की कई बार चीज़ें जब होती हैं, हमें उनके पीछे की अच्छाई नहीं दिख पाती. मगर बाद में जब फिर सब सोचो तो लगता है की जो हुआ, अच्छा ही हुआ. जब हम बुज़ुर्ग होने लगे और बच्चे बड़े तो उन्हें अब उड़ना था.

हमने अपने मन को और एक दुसरे को भी समझा लिया की अब हमें एक दुसरे के साथ ही मन लगाना है, घूमना फिरना है और ज़िन्दगी की गाडी हँसते हुए आगे बढ़ानी है.

इस सफर पर जब एक साथ अपने बच्चों को पंखों में हवा भर कर ऊंची उड़ान भरते देखा, हम गर्व और ख़ुशी से फूले नहीं समाये.

और इन सब के बीच एक और चीज़ हुई – हम दोनों एक दुसरे के साथ को फिर महसूस करने लगे. हम बातें करने लगे, सब कुछ साझा करने लगे और अपने उस वर्षों पुराने रिश्ते को नयी नज़रों से देखने लगे.

हर शाम हम एक साथ बैठ जाते और दुनियाभर की बातें करते, दिनभर के किस्से सुनते, अगले दिन के प्लान्स साझा करते और कुछ नहीं होता तो इस ज़िन्दगी की चुगली करने ही बैठ जाते. कभी साथ बैठे ड्रिंक्स लेते या फिर खूब खाते. कभी वर्ल्ड टूर की प्लानिंग करते या फिर खुद ही सैर पर निकल जाते.

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अब ये और बात है की हमारी सैर की सीमा घर से १० किलोमीटर के अंदर ही अंदर सिमित हो गई थी.

छोटी ख़ुशी ही बड़े असर करती है

ख़ुशी घूमने में ही मिले, ऐसा ज़रूरी नहीं है. असली ख़ुशी छोटी छोटी चीज़ों में ही मिलती है.

जब हम बात बेबात हँसते हैं, या अपने लैब कैस्पर को उछलते कूदते देखते हैं, या बिल्लियां चिल्ली और मिली हमारे आगे पीछे घूमती हैं, हम जानते हैं की यह है हमारी असली ख़ुशी. हर ऐसा लम्हा हमारे लिए किसी पूँजी से कम नहीं.

इन पलों को जीना किसी ध्यान में जाने से कम नहीं है.

आज तो हर शाम की यह मीटिंग हमारे अस्तितव का एक बहुत ही अहम् हिस्सा बन गया है. हमारे पास इतना कुछ होता है बताने को, साझा करने को की जब ये युवा हमसे पूछते है की “हम बातें क्या करते होंगे?”, तो मैं बस मुस्कुरा भर देती हूँ.
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