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शादी के साथ आई ये रिवाज़ों की लिस्ट से मैं अवाक् हो गई

शादी के बाद अपने ससुराल के पुरुषों के सामने पर्दा करना उसके तार्किक दिमाग की समझ के परे था. और फिर जब सास ने पति से भी पर्दा करने को कहा, तो वो बिफर गई.
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शादी के बाद के सच

अरेंज्ड मैरिज ऊपर स्वर्ग में नहीं तय होती हैं और न ही ये दो दिलों और दो परिवारों के मिलन की कोई ख़ूबसूरत कहानी है. असल में देखा जाए तो अरेंज्ड शादी लड़के की नौकरी और लड़की के आर्थिक हालत का मेल है. और फिर बहुत धूम धाम और शानोशौकत के साथ दुल्हन रोमांटिक किताबों और फिल्मों के देख सुन बड़ी हुई, अपनी गलतफहमियां लिए इस नए बंधन में बांध जाती है. ये बात और है की उसे बिना किसी चेतावनी के तुरंत ही आपको असली ज़िन्दगी तश्तरी पर रख कर मिल जाती है.

और चाहे लड़की ने कितनी भी तैयारी की हो, कई ऐसी बातें हैं जो उसे शादी के बाद ही समझ आती हैं. शादी उन्हें खुद उनके व्यक्तित्व के इतने नए पहलु और उनकी दबी ख्वाइशें सामने लाता है, जिनकी उन्हें खुद भी कोई जानकारी नहीं होती.

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क्या पहनें और कैसे पहनें

शादी के बाद मुझे पता चला की मेरी नाभि दर्शन साड़ी पुरे ढके सलवार कमीज से कहीं ज़्यादा शालीन परिधान माना जाता है. मुझे इस तथ्य से कोई दिक्कत नहीं थी. साड़ी मुझे बहुत प्रिय हैं मगर थोड़ा अजीब था क्योंकि अब मुझे साड़ी इसलिए पहननी थी क्योंकि किसी को मुझ पर अपना एकाधिकार जताना था. खैर मैं तो बहुत खुश थी की वो सारी नयी नयी साड़ियां जो मैंने शादी के पहले खरीदी थी, वो सब पहनने का मौका आ गया. ये वो साड़ियां थीं जो मैंने अपनी बहन की अलमारी से नहीं ली थी बल्कि अपने लिए खरीदी थी और साथ में पसंद के ब्लाउज बनवाये थे. मगर तभी मेरे ऊपर एक विस्फोट किया गया. “तुम्हे घूंघट में रहना होगा और घर के बड़े पुरुषों के सामने नहीं आना होगा.”

“क्यों?”

“क्योंकि ऐसा कर के हम उनके प्रति अपना आदर दिखाते हैं. क्या तुम्हे तुम्हारी माँ ने कुछ नहीं सिखाया? ये तुम्हारा मायका नहीं है जहाँ तुम जैसे चाहो घूम सकती हो. अपने ससुराल में तुम्हे यहाँ के तौर तरीकों के हिसाब से रहना होगा और सलीका सीखना होगा.”

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किसी रिवाज़ पर प्रश्न मत करो

चलो, इतना समझ आ गया था की बेटे की पत्नी को साडी पहननी है, परदे में रहना है क्योंकि ससुराली बड़े बूढ़ों को आप ऐसे ही आदर दिखा सकते हैं.

मगर ये समझ नहीं आया की बेटी को इस तरह खुल्लम खुल्ला घूमने की आज़ादी क्यों थी? क्यों उसका पल्लू एक कंधे पर यूँ ही बेफिक्री से पड़ा रह सकता है इन आदरणीय पुरुष सदस्यों के सामने? क्या उन्हें इन पुरुषों का आदर करने की ज़रुरत नहीं थी?

और बेटी के पति को आज़ादी क्यों थी की वो आराम से सीना चौड़ा किये पूरे घर में शहंशाहो की तरह घूम सकता है?

दोनों के लिए ये रूल एक जैसे क्यों नहीं है? आखिर दोनों हो तो घर के बेटे और बेटी के जीवनसाथी है तो फिर दोनों में इतना फर्क क्यों?

इनमे से एक भी प्रश्न आप मेरे ससुराल में पूछ लो और बात सीधे मेरी परवरिश पर आ जाती है, “क्या तुम्हारे माँ बाप ने तुम्हे कुछ नहीं सिखाया?”.

तो इसलिए कोई सवाल नहीं. मैं चुपचाप परदे के पीछे ही ठीक थी.

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कुछ कड़वे पाठ जो पढ़ने पड़े

मेरी शादी के बाद ही मुझे पता चला की शादी करके एक शर्मीली परदे में चुप्पी बहु बनने का सपना मेरे बचपन का था. यह बात और है की शादी होने तक मुझे इस प्रथा से नफरत थी. अचानक शादी के बाद मुझे अछूतों का दर्द समझ आने लगा जब मुझे परिवार के बाकी लोगों के साथ एक दरी बैठने से मना किया जाने लगा. वाशरूम जाने के लिए मैं तब तक इंतज़ार करती जब तक की घर के हर पुरुष सदस्य घर से बाहर न चला जाये. धीरे धीरे मुझे अकेले खाने की आदत भी होने लगी. जब घर के बाकी सदस्य बाहर हंसी ठिठोली के बीच खाना खा रहे होते थे, मैं कमरे में अकेले आँसूं से भीगी चुपचाप खाना खा रही होती थी.

मैंने शादी के बाद ही जाना की आपका रवैया नहीं बल्कि आप पहनावे से पता चलता है की आप किसको कितना आदर करते हो. सच में मेरे माता पिता ने मुझे कुछ भी तो नहीं सिखाया था. उन्होंने तो नादानों की तरह मुझे बस ये सिखाया की मैं किस तरह बड़ो का आदर अपने आचरण से करूँ.

शॉर्ट्स से स्कर्ट से साड़ी का मेरा सफर बहुत ही जल्दी तय हो गया. मुझे एक बात और पता चली. मुझे मालूम हुआ की परिवार के बड़े पुरुष बहुत ही खतरनाक होते हैं और मुझे खुद को सुरक्षित रखने के लिए उनसे छुप कर बंद दरवाज़ों के पीछे रहना होगा. जिस लड़की ने अपनी माँ तक को कभी परदे में नहीं देखा था, उसे अब खुद एक घूंघट के पीछे रहना पड़ रहा था.

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ये एक बेमानी और कठोर रिवाज़ है

जो लोग परदे के पीछे कभी नहीं रहे हैं, वो शायद इस परंपरा की क्रूरता को कभी नहीं समझेंगे. शायद जो प्रथा बाल विवाह और बाल विधवाहों को समाज के पुरुषो से बचाने के लिए शुरू किये गए थे, दुःख की बात है की उन्हें आज भी हम बहुत ही गर्व से निभा रहे हैं. बस अंतर अब इतना रह गया है की इस प्रथा को अब अपना एकदिखार और स्वामित्व दिखने के लिए चलाया जाता है. घर के पुरुषों को शालीन व्यव्हार तो नहीं सिखाया जाता मगर बहुओं को रीती रिवाज़ के नाम पर परदे पे पीछे रहने के लिए मजबूर किया जाता है.

मैं जिस घर से आयी हूँ, वहां कोई भेद नहीं होता. न लड़के लड़कियों में फर्क होता हिअ और न ही बहु और बेटी में. मैंने इस प्रथा का बहुत विरोध किया. “क्यों सिर्फ बहु को इस परदे में रहना होता है, मगर बेटियों को नहीं?”

“क्यों सिर्फ बहु को इस परदे में रहना होता है, मगर बेटियों को नहीं?”

इसके जवाब में मुझसे ये कहा गया, “उन्हें पर्दा की क्या ज़रुरत? वो बचपन में इस घर और अपने पिता की गोदी में निर्वस्त्र भी खेली हैं. तुम नहीं.”

कहने को तो मेरे पास अब भी बहुत बातें थी मगर मैं चुप रही क्योंकि मुझे माँ की बात याद आ गई. “तुम्हारी कही हर बात तुम्हारी परवरिश पर ऊँगली उठाने के लिए इस्तेमाल की जायेगी. तुम्हे अपने सास ससुर के साथ बस कुछ ही दिन तो रहना है, शान्ति से सब बर्दाश्त कर लो.”

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और फिर हमने अपना घर बसाया

जल्दी ही मैं अपने पति के साथ दुसरे शहर में शिफ्ट हो गई. वहां हमने अपने हिसाब से हमारा घर बनाया. वहां जाने के एक महीने बाद ही मेरी सास हमारे पास रहने आई. एक महीना बहुत लम्बा समय होता है एक नयी नवेली दुल्हन को अपने मकान को घर में बदलने में. हमने उस एक महीने में उस छोटे से घर में अपनी एक प्यारी सी दुनिया बना ली थी जो उस ससुराली दुनिया से बिलकुल अलग थी. रोज़ शाम को हम दोनों साथ बैठ कर चाय पीते और गप्पे करते. जी हाँ यह हमारे इस नए घर की प्रथा थी. और जाहिर है की रात का खाना भी हम दोनों एक साथ एक ही टेबल पर बैठ कर खाते.

तो उस दिन जब पति दफ्तर से घर आये, तो दरवाज़े पर ही मैंने उन्हें प्यार से बाहों में भर लिया। ये बात बिलकुल याद ही नहीं थी थी की आज हमारे घर में मेरी सासु माँ भी हैं.

वो माँ के साथ बालकनी में जा कर बैठ गया. मैं भी चाय ले कर आई और वही कुर्सी खींच कर बैठ गई. मेरी सास ने बहुत ही तल्खी से मुझे देखा और कहा, “अपनी चाय ले कर अंदर जाओ.”

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“क्यों?” मैंने उनसे पुछा क्योंकि मुझे बिलकुल समझ नहीं आ रहा था की वो मुझे चाय अकेले पीने को क्यों कह रही थीं. आखिर घर में तो बस हम तीन लोग ही थे और जो एक पुरुष था वो मेरा पति था. अब क्या मुझे अपने पति से भी पर्दा रखना होगा? मुझे ये बात इतनी अजीब लगी की मैंने लगभग चिल्लाते हुए ही उनसे कहा, “अब क्या मैं इससे भी पर्दा रखूँ? मगर इसने तो मुझे इतनी बार नग्न देखा है और आगे भी देखेगा!”

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मेरी सास बुरी तरह सकपका गई और मैं आज भी अपने पति पर आई वो शरारती मुस्कान नहीं भूल सकती हूँ.

हाँ, मगर आज भी जब ससुराल जाती हूँ, मुझे परदे में ही रहना होता है.

मेरी माँ ने मेरी पत्नी के साथ दुर्व्यवहार किया

जब मैंने अपने ससुराल वालों को खुश करने की कोशिश करना बंद कर दी तो मैं अधिक खुश रहने लगी

मैंने किस तरह अपनी सास का सामना किया और अपनी गरिमा बनाए रखी?

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