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शादीशुदा हूँ मगर सहारा और ख़ुशी मुझे सहकर्मी से मिलती है

उसकी एक खुशहाल शादी लगती थी मगर उसके पति के पास उसके लिए कोई समय ही नहीं था. और फिर उसके ऑफिस में एक सहकर्मी से उसे सब मिला जो वो चाहती थी.
woman with office colleague

सतही तौर पर हमारी अरेंज्ड शादी में प्यार था

मैं और निशांत सात साल से शादीशुदा हैं. हमारी शादी अरेंज्ड थी मगर पहली बार मिलने से शादी तक हम दोनों ने काफी वक़्त साथ बिताया था. उन दिनों हम लगभग रोज़ ही मिलते और घंटों गप करते थे, और यही साथ बिताया समय हम दोनों के रिश्ते को गहरा करता गया. मगर शादी के बाद धीरे धीरे हम दोनों की प्राथमिकताएं बदलती गई और हम दोनों ही अपने अपने करियर पर ज़्यादा ध्यान देने लगे. हम दोनों ही आर्थिक तौर पर खुद को और सशक्त करना चाहते थे. निशांत शायद दुनिया का सबसे ज़्यादा सहनशील और साथ देने वाला पति होगा जो अपनी पत्नी को उसकी इच्छाएं पूरी करने में उसकी भरपूर मदद करेगा. मगर फिर भी कुछ तो था जिसकी कमी मुझे अक्सर खलती थी. वो चीज़ें जिसकी एक पत्नी को अपने पति से उम्मीद होती है. मैं चाहती थी की वो मुझे देखे और मैं चाहती थी की हम दोनों प्यार करें. मगर उसके पास तो बात करने तक का वक़्त नहीं था…

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बारह घंटे काम करने के बाद उसकी थकान उतारने का उपाय था टीवी या इंटरनेट. मैं उसकी लिस्ट में कहीं नहीं आती थी. मुझे हमेशा से पता था की वो मुझे प्यार तो करता है, मगर उसके लिए प्यार का इज़हार ज़रूरी नहीं था.

मैं अक्सर तैयार हो कर उसके सामने जाती मगर वो कभी गौर ही नहीं करता है. जब भी मैं उससे पूछती हूँ की मैं कैसी लग रही हूँ, उसका जवाब हमेशा यही होता है, “तुम तो हमेशा ही सुन्दर लगती हो इसलिए मैंने कुछ कहा नहीं.” उसका ये जवाब अक्सर मेरे प्रति उसकी उदासीनता का बहाना जैसा लगता है.

हम साथी थे, मगर साथ नहीं थे

हम दोनों एक ही छत के नीचे दो सामानांतर ज़िंदगियाँ जी रहे थे. मैं हमारे पांच साल के बच्चे की परवरिश मैं अपना पूरा ध्यान लगाती है. निशांत का इस बीच एक अच्छा प्रमोशन हुआ और साथ ही उस शहर से तबादला भी. हमने तय किया की मैं तो बच्चे और परिवार के साथ यहीं रहूंगी और निशांत अकेले ही जायेगा. वो सप्ताहांत आता था और हम सब पूरा परिवार साथ समय बिताते थे, या फिर कभी घूमने या खाना खाने जाते थे. मगर ये सब हम सबके साथ करते थे, एक दम्पति की तरह अकेले नहीं.

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ज़िन्दगी आराम से चल रही थी, या ऐसा मैंने सोच लिया था. मुझे एहसास भी नहीं था की मेरे अंदर किस कदर अकेलापन घर कर रहा था.

मुझे एहसास भी नहीं था की मेरे अंदर किस कदर अकेलापन घर कर रहा था.

और फिर ज़िन्दगी में सिद्धांत आया.

उसने मुझे साथ और सुकून दिया

हम यूँ तो तीन साल से सहकर्मी थी मगर पिछले दो महीनों से ही हमने बातचीत शुरू की थी. बातें इधर उधर की होते होते भावनात्मक होती गई. हम एक दुसरे में सहारा ढूंढने लगे और दोनों ही एक दुसरे पर अटूट विश्वास करने लगे. वो मेरा बहुत ध्यान रखता था और मुझे उस अकेलेपन से निकलने की पूरी कोशिश करता था. वो मुझे बताता था की क्या चीज़ें मुझ पर अच्छी लग रही हैं और मैं अपने जीवन में क्या क्या कर सकती हूँ.

और फिर अचानक निशांत की तबियत ख़राब हो गई. डॉक्टर को लगा कि शायद उसे कैंसर हो सकता है. मैं बुरी तरह घबरा गई. इस मुश्किल समय पर सिद्धांत ही मेरे साथ खड़ा रहा. वो हर समय मेरे साथ ही रहता था और मुझे हौसला देता था की मैं सकारात्मक सोच रखूँ.

अब जब उन दिनों के बारे में सोचती हूँ तो कृतज्ञ हो जाती हूँ ये याद कर की किस तरह उसने मुझे सहारा दिया। मैंने अपनी ज़िन्दगी में उसके जितना समझदार और मज़बूत इंसान नहीं देखा है. मैं घंटों उससे बातें कर सकती थी. उसकी बातें सुनकर मैं सबसे उबाऊ विषयो में भी दिलचस्पी लेने लगती थी. हमारे व्हाट्सप्प की बातें लम्बी और बहुत निजी होती थी. जैसे जैसे हमारी दोस्ती गहरी होती गई, हमें लगा की अब हमें अपनी शारीरिक ज़रूरतों के लिए एक दुसरे पर निर्भर करने का वक़्त आ गया था. कितनी अजीब बात है न मैं उस इंसान के इतना करीब इसलिए आई थी क्योंकि उसने मेरे पति की बीमारी में मुझे सहारा दिया था.

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जब मेरे पति को सब पता चला

मगर हमारा अफेयर जल्दी ही ख़त्म हो गया क्योंकि निशांत ने हमारे मैसेज देख लिए.

वो आहात था. वो बिलकुल शांत हो गया. वो मुझसे उन मैसेज के बारे में कुछ नहीं कह रहा था. मुझसे ये सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था. तो मैंने हर कोशिश की की वो मुझसे बात करे और अपने मैं की बढास निकले. और एक दिन वो बहुत रोया. उस दिन उसने मुझे कहा, “तुम इन मैसेज को डिलीट क्यों नहीं किया? क्यों अपने फ़ोन में इन्हे सहेज कर रखा?”

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उस दिन हमने बैठ कर एक दुसरे से बातें की. उसने कहा की उसके पास तीन विकल्प थे. या तो वो खुद को तकलीफ पंहुचा सकता था या फिर मुझे तकलीफ दे सकता था. इसके अलावा वो सिद्धांत को फ़ोन कर के धमकियाँ देता और उसे मुझसे दूर रहने को कहता. मगर उसने तीनों में से किसी भी विकल्प को नहीं चुना. उसने तो सारी स्तिथि और मुझे बिलकुल सहनशीलता से संभालने का फैसला किया.

अगर ये धोखा मेरे साथ हुआ होता तो मुझे नहीं पता की मेरी प्रतिक्रिया क्या रहती.

अगर ये धोखा मेरे साथ हुआ होता तो मुझे नहीं पता की मेरी प्रतिक्रिया क्या रहती.

मगर मेरे पति ने मुझसे कहा की मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है. मैंने अपनी ख़ुशी और ज़रूरतों को पूरी करने के लिए शादी के बाहर जाकर उससे दोस्ती की, जबकि ये सब मेरे पति को मुझे देना था. उसने खुद को दोषि ठहराया की ये उसके कम समय देने के कारण ही हुआ है. मुझे पता है की अंदर से वो अब भी विचलित है. मेरा मन भी अशांत है. इन ज़ख्मों को भरने में समय लगेंगे.

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फिर से सब कुछ वैसे ही हो गया है — बोझिल और उबाऊ

मैं अपने पति की सहनशीलता और मेरे प्रति जुड़ाव की हमेशा कायल रहूंगी. मगर सिद्धांत से अलग हो कर मैं एक अशांत मन के साथ रह रही हूँ.

रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

वो चाहता है की मैं अपने परिवार की ख़ुशी के लिए उसे भूल जाऊं. मगर मेरे लिए ये बहुत मुश्किल है. मेरे पास उसकी यादें है जो हर समय मेरे साथ रहती हैं. मुझे उसकी ज़रुरत सिर्फ अपनी शारीरिक ज़रूरतों के लिए नहीं थी. वो अकेला ऐसा पुरुष था जो मेरे सारे सवालों के जवाब जानता था, मुझे जानता था. मैंने उसके कारण फिर से जीना सीखा था. वो ताउम्र मेरी यादों और प्रार्थनाओं में रहेगा.

यु तो निशांत ने मुझे भरपूर समय दिया है ताकि मैं इस दुःख से निकल पाऊँ मगर वो इस बारे में और कुछ बात नहीं करना चाहता है.
आज भी हम दोनों न एक दूसरों को समय देते हैं, न प्यार न एक दुसरे की लिए समय, हम एक दुसरे की शारीरिक ज़रूरतें भी पूरी नहीं कर पाते हैं. मैं फिर से जीवन के उसी मोड़ पर वापस आ गई हूँ जहाँ मेरी ज़िन्दगी बस दिखती भर खुश है. मगर मैंने खुद से वायदा किया है की कुछ भी हो जाए, मैं फिर से ऐसा कुछ नहीं करूंगी. मैं उस इंसान को फिर से कोई तकलीफ नहीं दे सकती हूँ. चाहे इसके लिए मुझे पूरी ज़िन्दगी अपने दिल पर एक बोझ रख कर ही क्यों न रखना पड़े.

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