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शिव ने तो तांडव से हुई क्षति सुधार ली थी, मगर हम क्या करें?

भगवन शिव ने अपनी पत्नी सती की मृत्यु का आक्रोश सब पर तांडव का नृत्य कर के निकाला था. मगर जब उनका क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने सबकुछ वापस व्यवस्थित कर दिया. मगर हम मानव अपना दुःख क्या ऐसे निकाल सकते हैं?
shiva

शिव ने अपना क्रोध तांडव कर दिखाया था

वातावरण काफी उत्साही था. एक भव्य यज्ञ का आयोजन था और आयोजन करने वाले और कोई नहीं बल्कि ब्रह्मा के पुत्र और सती के पिता दक्ष थे. पूरा महल सुशोभित और ख़ुशी से भरपूर था मगर बस एक कमी थी– सती और शिव की.

दक्ष अपनी पुत्री सती से बहुत प्रेम करते थे मगर जब उसने नीलकंठ विभूति से लिपटे तपस्वी शिव से विवाह कर लिया था, तो क्रोधित दक्ष ने न सिर्फ शिव को बल्कि अपनी पुत्री को पुरे संसार के सामने अस्वीकार कर लिया था. आज यज्ञ में उन दोनों की उपस्तिथि दक्ष के शक्ति के इस प्रदर्शन का अपमान होता. हालाँकि सती अपने पिता के रवैये से बहुत आहत थी, मगर फिर भी उसने उस यज्ञ में उपस्तिथ होना सही समझा. उसे लगा की शायद पिता उसे देख कर पिघल जायेंगे और उनका सारा रोष बह जाएगा. उसे यकीन था की जब दक्ष सती को देखेंगे और समझेंगे की वो शिव के साथ कितनी खुश है तो वो भी उन्हें स्वीकार कर लेंगे. मगर दक्ष पिघले नहीं. वो अब भी शिव के प्रति कठोर थे और उन पर कटाक्ष कर रहे थे. शिव तो सबकुछ सह रहे थे मगर सती से अब सहन नहीं हो रहा था. ये बात की उसके पति को इस तरह के अपमान सहने पड़ रहे हैं, सती को क्रोधीत कर रहा था. और फिर उसने आत्म दाह कर लिया.

Shiv lost Sati
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शिव क्रोध से ज्वलंत हो गए और वो उन सब को ख़त्म करने लगे जो सती के आत्मदाह के लिए ज़िम्मेदार थे. मगर रक्त की इस बारिश से भी जब उनका क्रोध शांत नहीं हुआ तो वो नृत्य करने लगे. शिव के तांडव नृत्य से तीनो लोक हिलने लगे. जब तक शिव का क्रोध और पीड़ा शांत नहीं हुई, शिव ने अपना तांडव नहीं रोका. और फिर जब उनका ह्रदय शांत हुआ तो वो भी शांत हुए. उन्होंने उन सभी में प्राण वापस दे दिए जिनके प्राण उन्होंने क्रोध में हर लिए थे. शिव एक देव थे और उन्हें ये तांडव करना ज़रूरी था ताकि इस उथल पुथल में वो एक मार्ग निकाल सकें.

शोक के बाद हम सभी उन्माद में नृत्य नहीं कर सकते हैं

मगर हम आम इंसान ऐसी किसी दैविक शक्ति के स्वामी नहीं हैं. हम भी भावनाओं में बह कर कई बार अपना ही तांडव  करते हैं मगर उस तांडव से होने वाली क्षति को फिर पूरी ज़िन्दगी झेलते हैं, क्योंकि हमसे जो बिखरा और टूटा है, वो फिर से जुड़ नहीं सकता. इसके अलावा शिव का सती के लिए प्रेम भी हमारी सीमा से बहुत ऊपर है. हम सभी अपने प्रियजन के खो जाने का दुःख मनाते हैं मगर इस दुःख का प्रदर्शन कैसे करते हैं, ये बिलकुल अलग बात है.

Siv ji
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हम सभी अपने प्रियजन के खो जाने का दुःख मनाते हैं मगर इस दुःख का प्रदर्शन कैसे करते हैं, ये बिलकुल अलग बात है.

युद्ध में अपने पति को खोई एक सैनिक की पत्नी शायद अपने मन में शादी के वो कुछ साल बार बार दोहराये और फिर अपने लिए एक नयी ज़िन्दगी शुरू कर दे. शायद उसके इस सफर में उसके सैनिक पति की एक संतान भी उसके साथ हो. एक पति जिसने अपने पति खोई हो, शायद गोल्फ के खेल में खुद को व्यस्त रखने लगे या फिर हो सकता है की एक विधवा समाजसेवा में खुद को तल्लीन कर ले. कुछ लोगों आंसू बहा कर रोते हैं और कुछ नहीं.

कई ऐसे भी लोग है जो अपने साथी की जानलेवा बीमारी के बाद आई मृत्यु पर ये तसल्ली देते हैं की अब उनके साथी उस पीड़ा से तो आज़ाद हैं. कई लोग ऐसे भी है जो अकेले रह जाने पर क्रुद्ध हैं मगर कुछ और आगे बढ़ने को तैयार. कुछ लोग मृत्यु के सत्य को समझते हैं, उसे स्वीकार भी करते हैं मगर सबकी विचारधारा अलग अलग है.

मगर हमारा समाज उन लोगों को बहुत ही अलग चश्मे से देखता है जो अपने साथी के गुजरने के बाद भी उन्हें सामान्य दीखते हैं. जब उनकी आवाज़ नहीं कांपती या वो समाज के चश्मे के हिसाब से वो ज़्यादा आहत या दुखी नहीं लगते या फिर उनकी आँखें बात बात पर नहीं भरती तो उन्हें सवालिया नज़र से देखा जाता हैं. मैं एक ऐसी महिला को जानती हूँ जो अपने पति की मृत्यु के बाद पार्लर जाने से कतरा रही थी की क्या इतनी जल्दी पार्लर जाना उनके लिए “सही” है. इसके जवाब में मैं बस यही कहूँगी की अगर आपके मन में पार्लर जाने का विचार आ गया है तो ज़रूर जाइये.

अपराधबोध से बाहर निकलें

ऐसी परिस्तिथि में अक्सर लोगों को रह जाने का अपराधबोध हो जाता है. हम शुरू से ही ये सीखते आये हैं की शादी का बंधन दो लोगों के शारीरिक, भावनात्मक और अध्यात्मक मिलन को भी कहते हैं. मगर सभी दम्पति इतने खुशकिस्मत नहीं होते हैं. मेरा प्रश्न है की अगर आप रह गए हैं तो क्या इसके पीछे कोई कारण नहीं है?

प्यार, दुर्व्यवहार और धोखाधड़ी पर असली कहानियां

मेरे पति की मृत्यु के बाद मुझे कई सपने आते थे.. और उन सभी सपनों से एक ही बात ज़ाहिर होती थी की मेरे जीवन का एक मकसद है और वक़्त के साथ वो मकसद खुद ही दिखने लगता है.

अवसाद एक बहुत नेचुरल भावना है और इसे व्यक्त करने का हर किसी का अपना अलग तरीका होता है. हमारे पास रह जाते हैं हमारे व्यक्तिगत भावनाएं, विपदाएं और बाधाएं जिन्हे हम अपने हिसाब से संभालते हैं.

इसके अलावा हम दैवी नहीं हैं. साथ किये अपने गलत व्यवहार को समय के साथ बदल नहीं सकते है. उदाहरण के लिए अगर मैं अपनी पत्नी के हत्यारे की हत्या कर दूँ तो भी क्या? हम कैलाश पर्वत जा कर सन्यास नहीं ले सकते। हमें इसी दुनिया में रहना होगा तो ज़रूरी है की हम अपने किये कामों को ध्यानपूर्वक देखें. अवसाद व्यक्त करने के जो आपके मानवीय तरीके है उनपर ही भरोसा कीजिये.

अपने ही अंतर्मन के साथ एक बैलेंस बनाने की कोशिश कीजिये, वो ही तांडव है और वो ही कैलाश.

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