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तलाक लेते समय मुझे अहसास हुआ कि मैं उसे वापस पाना चाहती थी

उसे यकीन था कि वह तलाक चाहती थी, जब तक बात अदालत में नहीं पहुँच गई
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जैसा चित्रा वशिष्ठ को बताया गया

हर आम दिन की तरह वह धम् से दरवाज़ा बंद करके काम के लिए चला गया, लेकिन आज मेरी कुछ दूसरी योजनाएं थीं। मैंने उसे बहुत झेल लिया था, या बल्कि हम दोनों एक दूसरे को बहुत झेल चुके थे। अगर हम एक और दिन साथ बिता लेते तो हम दोनों या दोनों में से कोई एक अपराधियों की सूची में ज़रूर पहुंच जाता।

किसी भी तरह की देर किए बिना मैंने उसकी माँ को फोन किया यह बताने के लिए कि मैं उसके बेटे से तंग आ चुकी हू और जा रही हूँ इसलिए वह पूणे आ जाए और उसकी देखभाल करे। एक घंटे के भीतर ही मैं अपने घर से निकटतम होटल में चली गई। फिर मैने मुंबई में अपने माता-पिता को मेरे निर्णय के बारे में बताया।

जैसे ही मैंने अगले दिन अपने ‘माइके’ में प्रवेश किया मैं समझ गई मुंबई में जीवन इतना आसान नहीं होगा। जब मेरी छोटी भतीजियों ने ‘मौसी मौसी’ कह कर मेरा स्वागत किया, तो मैंने राहत की सांस ली।
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मेरे माता-पिता, बहने और कज़िन बिना किसी आपत्ति के शांत थे, कोई सवाल नहीं पूछा गया। वे मेरे अपने लोग हैं और वे जानते थे कि मैं अपनी मर्जी की मालिक हूँ। लेकिन मेरी सास के फोन लगभग रोज़ आते रहे जबतक की उन्होंने यह मान ना लिया कि उनका बेटा अब अपनी पत्नी से अलग हो चुका है।

हमारे बीच किसी भी बातचीत के बिना दो महीने बीत गए। साझे मित्र हमें एक दूसरे की खबर देते रहे।

मेरा दर्जा, मनोदशा, हेयर स्टाईल, कपड़े पहनने का तरीका, सब बदल चुका था लेकिन जो नहीं बदला वह था कि अब मैं उसके साथ और नहीं रह सकती।

जब मैंने फेसबुक पर उसे अपने परिवार के साथ शिमला में छुट्टियों का आनंद लेते देखा, तो मैंने अवसर का फायदा उठाया और पूणे से अपना सारा सामान ले लिया। जैसे ही मैंने अपने पुराने घर का ताला खोला, मैं आश्चर्य से सुन्न हो गई। अतिथि कक्ष को अब उसने अपना शयनकक्ष बना लिया था, हमारे शयनकक्ष पर ताला लगा था और सामान जहां का तहां पड़ा था और धूल की परतें हमारे टूटे -फूटे संबंध की कहानी सुना रही थी।

अब तलाक अनिवार्य था। मैंने इसे दायर किया और स्पष्ट रूप से यह आपसी था। ईमेल के माध्यम से होने वाले वार्तालाप से बचा नहीं जा सकता था। पहली सुनवाई के लिए तिथि तय हो चुकी थी, और मैं आज़ादी का इंतज़ार कर रही थी।

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मैं समय पर अदालत पहुँच गई और पहले हस्ताक्षर करने के लिए मुझे बुलाया गया था लेकिन मुझे वह कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। मुझे पता चला कि वह समय से काफी पहले आ चुका था और बाहर इंतज़ार कर रहा था। मैंने राहत महसूस की; क्या यह आज़ादी पाने की खुशी थी या चार लंबे महीनों बाद उसे देखने की? यह दुविधा तब सुलझी जब मुझे अहसास हुआ कि मैं पहले ही तलाक की याचिका पर हस्ताक्षर कर चुकी हूँ, हाँ यह मेरा दिन था, उस व्यक्ति से छुटकारा पाने का मेरा पहला कदम जिससे मैं घृणा करती थी।

जैसे ही मैं पलटी, वह अपने पसंदीदा डेनिम और टीशर्ट पहने खड़ा था। मैंने कनखियों से उसे अपने अजीब हस्ताक्षर करते देखा। और उसी पल मैं फूट-फूट कर रो पड़ी। लेकिन क्यों? जिसका मुझे इंतज़ार था वही हो रहा था। मुझे अपनी आज़ादी मिल रही थी। जल्द ही, मैं इस तरह रोने लगी जैसे अपना पसंदीदा खिलौना खोने के बाद छोटा बच्चा रो पड़ता है।

उसने मुझे अपनी बांहों में भर लिया और जितना करीब आ सकता था उतना करीब आकर बुदबुदाया, ‘‘बेबी, तुम मेरी मोहब्बत हो और हमेशा रहोगी लेकिन अगर मेरी मौजूदगी तुम्हें परेशान करती है, तो मैं उसे तकदीर में लिखा मानकर तुम्हारे बिना जी लूंगा।”

मैं अपनी पीठ पर गर्म आंसू महसूस कर सकती थी। जल्द ही उसने मुझे छोड़ दिया और अपनी संक्रामक मुस्कान के साथ मुझे देखा और आश्वस्त किया कि वह कभी मुझे परेशान नहीं करेगा और ना ही मेरे रास्ते में आएगा। मैंने सुना मैं मर जांवा (मैं तुम्हारे लिए जान भी दे सकता हूँ)। लेकिन मैं जानती थी कि मैं हमेशा के लिए उसे अपने जीवन में वापस चाहती थी। मेरा ज़िद्दी दिमाग पिघल गया जबकि दिल तो पहले से ही उसका था। और सोने पे सुहागा उसका अपनी सामान्य मर्दाना आवाज़ में यह कहना था “तुम्हारी गैरमौजूदगी में मैं समझदार बन गया हूँ लेकिन बुद्धिमान नहीं, मुझे अब भी याद है कॉलेज में तुमने मुझे पहला ईमेल लिखना सिखाया था और हर बार जब मैंने ईमेल टाइप किया, मैंने अपने गुरू को यानी तुम्हें याद किया।” और हम दिल खोल कर हंसे।

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बाकी का दिन हमने मुंबई में अपने पसंदीदा रेस्त्रां में बिताया, हमारी सारी समस्याओं पर चर्चा करते और उनका समाधान ढूंढते हुए। अगले दिन मैं पूणे चली गई और एक और शाम उसके साथ बिताई।

मेरा युवा लोचिनवर 30 दिसंबर को अपनी कार में मुझे वापस ले जाने आया। मेरी दादी, माता-पिता और बहन को कुछ समझ नहीं आ रहा था। कंधे पर बैकपैक लिए मैंने अपने विस्मित परिवार को अलविदा कहा और कार में उसके पास बैठ गई।

उस बात को अब दो साल हो चुके हैं। पहले की ही तरह, हम प्यार करते हैं, मज़ाक करते हैं, मस्ती करते हैं, बहस करते हैं लेकिन सपने में भी अलग होने और तलाक लेने के बारे में नहीं सोच सकते।

मैं अपने आप को भाग्यशाली मानती हूँ कि उसके और उसके परिवार द्वारा खुले दिल से मुझे अपनाया गया। मैंने उसके साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया यह अब भी एक राज़ है; मुझे बस कुछ दिनों के लिए उससे दूर जाने की ज़रूरत थी। मैं इस हरकत के लिए अपने हार्मोनल असंतुलन को दोषी ठहराती हूँ।[/restrict]

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