तलाक मेरी मर्ज़ी नहीं, मजबूरी थी

Yasmin
The divorce was not by choice because he just left one day

(जैसा यास्मीन को बताया गया)

(पहचान छुपाने के लिए नाम बदले गए हैं)

वो एक “परफेक्ट” दम्पति थे

हमारी शादी आज से पंद्रह साल पहले हुई थी. हम दोनों की यूँ तो अरेंज्ड मैरिज थी मगर हमारे विचार, परिवार, परवरिश बहुत ही एक जैसी थी. तो जब हम दोनों विवाह के बंधन में बंधे तो सातवे आसमान पर थे. सब हमें “आदर्श” और “परफेक्ट” दम्पति कहते थे. मैं गृहणी बन घर का ध्यान रखती थी और मेरे पति नौकरी करते थे. उनकी एक बहुत ही अच्छी नौकरी थी और हम काफी संपन्न थे.

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शादी के दो साल बाद मैंने हमारे पहले बेटे को जन्म दिया. हमारा बेटा इतना प्यारा था की जो भी उसे देखता, बस मन्त्र मुघ्ध हो जाता था. दो साल बाद हमारा दूसरा बच्चा भी दुनिया में आ गया.

साल गुजरते रहे और पति जैसे जैसे नौकरियां बदलते, हम भी साथ साथ जगह बदलते रहे. हमारे ज़िन्दगी काफी आलिशान थी और बच्चे खुश और संतुष्ट. वो बिगड़े हुए तो नहीं थे मगर हाँ उनके अंदर सुरक्षा की भावना कूट कूट कर भरी थी.

हमारी शादी के बाद भी मेरे पति कई बार दूसरी स्त्रियों के पास संतुष्टि के लिए जाते थे. इस बात को लेकर हम दोनों के बीच काफी कहासुनी होती थी और फिर उसने मुझे वादा किया की वो ऐसा नहीं करेगा.

और फिर वो गायब हो गए

प्रेम, मेरे पति, ने बाहर देश में नौकरी ढूंढना शूरु किया और करीब करीब दस साल साथ गुज़ारने के बाद अचानक वो गायब हो गया. उसने काफी लोन लिए थे जो अब उसकी गैरमौज़ूदगी में मुझे चुकाने थे. हर तरफ से कर्ज़दार मुझे ढूंढ रहे थे. हमारे जॉइंट अकाउंट में उसने कुछ भी नहीं छोड़ा था. उसने हमें सिर्फ आर्थिक तौर पर ही नहीं, निज तौर पर भी बिलकुल निहथा छोड़ दिया था. मुझसे और हमारे बच्चों से उसने कोई संपर्क नहीं रखा. मैं और बच्चे कुछ समझ नहीं पा रहे थे, कन्फ्यूज्ड और सकते में थे. बच्चे तो आज भी कुछ नहीं समझ पाते हैं.

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मैंने कितने सालों से कोई नौकरी नहीं की थी. प्रेम से साथ शादी होते ही मैंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया था. हमदोनो ने मिल कर ये फैसला किया था की मैं घर की बागडोर सम्भालूंगी और वो बाहर की. अब मैंने पूरी कोशिश की कि  मेरे परिवारवालों को कुछ भी पता न चले, उसके परिवार को सब पता था मगर वो चूं भी नहीं कर रहे थे.

मैंने बार बार उसके नंबर पर फ़ोन किया, उसे मेल किये, मगर उसने किसी का भी कोई जवाब नहीं दिया. उसका जन्म दुसरे देश में हुआ था और उसके पास उसी देश का पासपोर्ट था, और इस बात का उसने भरपूर फायदा उठाया.

हमने बिखेरे टुकड़े उठाये और फिर से जीने की कोशिश करने लगे

मुझे सारे क़र्ज़ और लोन उतारने थे और उसमे मुझे अपने परिवार की मदद लेनी पड़ी, जिनके लिए मदद करना बहुत ही मुश्किल था. मैं फिर से नौकरी करने लगी और बच्चों को अकेले संभालने लगी. मन अब भी मानने को तैयार नहीं था की प्रेम ने इस तरह मुझे और बच्चों को अपनी ज़िन्दगी से दूर छिटक दिया है, मगर मुझे अब बच्चों के साथ आगे बढ़ना था. मैंने आखिरकार प्रेम से उसकी गैरमौजूदगी की बिनाह पर तलाक़ ले लिया और कम से कम उन कर्ज़ों को अदा करने की मुश्किल से तो निकल पाई. सबसे ज़्यादा दुःख तो इस बात का था की उसने कभी कुछ बिना सफाई दिए या बताये ये फैसला अकेले ही ले लिया.

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सुनने में आया है की उसने दोबारा शादी कर ली है. मैं अपने एक ही अनुभव से इतनी कटु और थक गई हूँ की मुझे नहीं लगता की मैं अब ऐसा करने का सोच भी सकती हूँ. मैंने जब प्रेम से शादी की थी, मैंने तो वो वचन पूरी ज़िन्दगी निभाने के लिए ही लिए थे. मुझे कानूनी तौर पर उससे तलाक़ सिर्फ इस लिए लेना पड़ा क्योंकि ऐसा नहीं करती तो आजतक उसके लिए गए बेहिसाब क़र्ज़ अदा कर रही होती.

कई दोस्तों से पता चला है की उसने अपनी नयी ज़िन्दगी कहीं और किसी और के साथ शुरू कर ली है. वो तीसरी बार पिता बन गया है. वैसे सच कहा जाए तो उसके तरीकों और जीवन शैली के कारण शायद उसके और भी बच्चे ज़रूर होंगे.

तलाक़ हमेशा आपकी मर्ज़ी नहीं होती, कभी कभी ये आप पर थोप दी जाती है.

मेरे पास कोई चारा नहीं था, तलाक़ मेरे लिए एक रास्ता नहीं एक मजबूरी थी. अगर नहीं करती तो न ज़िन्दगी जी पाती न ही अपने दो बच्चों को ज़िन्दगी दे पाती. कई लोग कहते हैं की मैं एक योद्धा से कम नहीं, मगर उन्हें नहीं पता की मैंने हार और अंत कितने पास से कितनी बार देखा है.

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