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कैसे टिंडर के एक झूठ ने तोडा एक छोटे शहर के युवक का दिल

टिंडर पर आये एक राइट स्वाइप से उसे लगा था कि शायद उसके अकेलेपन को ख़त्म कर ने का मौका उसे अंततः मिल ही गया है. मगर उस बड़े शहर में क्या इतना आसान था सच्चा प्यार मिलना...
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(जैसा शहनाज़खान को बताया गया)

अपने पिता की मौत के बाद मैं अपने लिए बेहतर ज़िन्दगी बनाने और उस माहौल से निकलने के लिए दिल्ली आ गया.मेरी नौकरी मुझे हफ्ते के छह दिन तो काम में ही उलझाए रखतीथी, और बचा एक दिन मैं अपने एक रूम के कमरे में सोता बिता देता था. इसी ज़िन्दगी में घिरे मैंने कई महीने निकाल दिए. मुझे सतही तौर पर तो सब ठीक ही लग रहा था मगर अंदर ही अंदर यह जीवन शैली मुझे ख़त्मकर रही थी. नया साल आते आते मैं एक मशीन सा बन गया था, बस काम करता, घर आता तो सो जाता. न मुस्कुराता न खुश रहता. मैं डिप्रेशन का शिकार होने लगा था.

मैं स्वभाव से अंतर्मुखी तो नहीं हूँ मगर बहुत ज़्यादा दोस्तों के साथ भी नहीं रहना पसंद करता. भोपाल, जहाँ की मेरी पैदाइश है, वहां मेरे कुछ गहरे मित्र हैं जिनके साथ समय बिताना मुझे पसंद था. मगर यहाँ दिल्ली में इतने महीने रहने के बाद भी मेरी किसी से भी मित्रता नहीं हो रही थी. मन इतना उचाट हो गया था कि कभी कभी तो लगता था कि शायद यूं ही अकेले मेरी पूरी ज़िन्दगी बीत जाएगी. और फिर एक दिन, यूं ही बैठे बैठे मन में पता नहीं क्या आया और मैंने अपना टिंडर अकॉउंट बना लिया. आपसे सच कहूँ तो कुछ ख़ास उम्मीद नहीं की थी मैंने इस अकॉउंट से. बोर हो गया था ऑफिस-घर के चक्करमें रहते, अकेले फिल्मे देखते. अब मन था कि कोई हो जिससे बस मैं यूं ही इधर उधर की बातें कर सकूं. कुछ लड़कियों से बात भी हुई, मगर मेरे छोटे शहर का आकर्षण कुछ कम था उनको इम्प्रेस करने के लिए.

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