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तुम्हीं मुझे सबसे ज़्यादा परिभाषित करती होः द्रौपदी के लिए कर्ण का प्रेम पत्र

वह उसे स्वयंवर में नहीं जीत सका, और जीवन भर बस दूर से ही खेल देखता रहा
Draupadi-vastraharan

यज्ञसेनी,

एक पत्र जो मैं तुम्हें कभी नहीं भेजूंगा। लेकिन फिर भी यह मानना पसंद करूंगा कि तुम्हें इसके बारे में पता है।

उस दिन जब एक सोशल नेटवर्किंग साइट ने मुझसे मेरा ‘रिलेशनशिप स्टेटस’ चुनने के लिए कहा तो मैं अचंभित रह गया। वह कौन सा संबंध है जो मुझे परिभाषित करता है, मेरी पहचान, और मुझे बनाता है? क्या वह पत्नी है, जो पत्नी की भूमिका निभाने के लिए पर्याप्त रूप से कर्तव्यनिष्ट है और इतनी संवेदी है कि मुझसे एक पति होने की मांग नहीं करती, या वह माता है जो मुझे प्यार करती है या वह जो मुझे छोड़ गई या तुम हो? वास्तव में, क्या यह तुम हो जो मुझे सबसे ज़्यादा परिभाषित करती हो? मुझे डर है यह तुम ही हो। और यकीन मानो, ‘इट्स कांप्लिकेटेड!’

हमारे बीच कुछ अलौकिक समानताएं हैं, है ना?

पहली यह कि हमारे परिवार एक ही है। पांडव और हम दोनों में से कोई भी वास्तव में कभी उनके नहीं थें लेकिन फिर, हम उसमें भी कितने अलग हैं। मैं हमेशा उनके साथ जीवन जीने के लिए तरसा हूँ, जहां हमेशा से मेरा दिल था, विश्व के सबसे योग्य भाइयों के साथ। वहां रहने, अपनी संवेदनशीलताओं को खत्म करने, पांच भाइयों की पत्नी की भूमिका निभाने, और एक भी शब्द कहे बगैर आत्मसमर्पण करने के लिए तुम्हारे दिल और आत्मा को कितना कुछ त्यागना पड़ा था।

वे मुझे एक सच्चा क्षत्रिय कहते हैं। सिर्फ इसलिए कि मैं एक कीड़े के काटने के दर्द को चुपचाप सहन कर सका था। वे नहीं जानते कि एक सच्चा क्षत्रिय क्या होता है। वे नहीं जानते कि अपने पिता को यह कहने से खुद को रोकने में कितना साहस लगता है कि मैं कोई ट्रॉफी नहीं हूँ जिसे आप एक तीरंदाज़ी प्रतियोगिता में जीत लें। आपनी सास को यह बताने से खुद को रोकना कि मैं कोई संपत्ति नहीं हूँ कि भाईयों की दुश्मनी से बचने के लिए आप उनमें मुझे बांट दें। और यह कि आपको पाने का अर्थ आपका मालिक होना नहीं है। और यह कि आपको दूर नहीं किया जा सकता, बस आपका साथ अर्जित किया जा सकता है। ताकि आप उपकृत हों। ताकि आप खाना बनाएं, तैयार हों और उनका मनोरंजन करें। और ताकि आप संभोग करें, जिनके साथ भी वे आपको संभोग करने को कहें। और उन्हें यह नहीं कहने में कि आपको उनकी अवज्ञा करने में कोई रूचि नहीं है। उन्हें यह नहीं बताने में कि वे गलत हैं और उन्हें यह नहीं कहने में कि आपने क्षमा किए जाने का आवेश त्याग दिया है।

ऐसा कहा जाता है कि भगवान सब जगह नहीं हो सकता इसलिए उन्होंने माँ बनाई। क्या इसीलिए उन्होंने मुझे राधा दी और कुन्ती के रोष से बचा लिया? काश वह स्त्री जानती की उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल मुझे जन्म देना नहीं थी बल्कि सौदा करने के लिए मेरे पास आना थी, तुम्हें भेजने की बजाए। उसने मुझे कहा कि वह तुम्हें मेरे पास ला सकती है, और यह कि मैं सबसे बड़ा भाई होने के नाते तुम पर दावा कर सकता हूँ।

वह कभी नहीं जान पाएगी कि मैं हमेशा से तुम्हारा ही था। और यह कि तुम उस तरह से उनके किसी बेटे की कभी नहीं हो पाई, जैसा उनका अनुमान था।

मैं चाहता हूँ कि तुम यह जानो कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ। स्वयं का रूप होने के लिए। उन्हें माफ करने के लिए, क्योंकि वे नहीं जानते कि उन्होंने तुम्हारे साथ क्या किया है। विश्व को हस्तिनापुर के दिग्गजों की प्रशंसा में मंत्र जपने देने के लिए, क्योंकि तुम उन्हें कभी नहीं बताओगी कि वे दो कौड़ी के भी लायक नहीं हैं। अर्जुन से प्यार करने के लिए, जो मेरा सबसे कट्टर दुश्मन है। और इसलिए मैं तुमसे और भी ज़्यादा प्यार करता हूँ।

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लेकिन यज्ञसेनी मैं तुमसे नफरत भी करता हूँ। इन्हीं सब कारणों से। समझौता करने के लिए। इतनी आसानी से हार मानने के लिए। सबसे ज़्यादा कायर व्यक्ति को अपना कौमार्य सबसे पहले सौंपने के लिए। अपना यौवन और अपनी सुंदरता को इंद्रप्रस्थ की रसोई की अग्नि में समर्पित करने के लिए। इस्तेमाल किए जाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देने के लिए। यह जानने की चेष्ठा नहीं करने के लिए कि तुम कितनी योग्य हो। और अंत में, बगैर किसी खेद के, व्यर्थ कार्यों में अपने बेटों का बलिदान देने के लिए। तुम इतनी उदासीन कैसे हो सकती हो, यज्ञसेनी? क्या तुम्हें कुछ भी महसूस नहीं होता?

और मुझे तुम पर दया आती है। इतनी बुरी तरह बिताए हुए तुम्हारे जीवन के लिए।

हालांकि यह तुम्हारी कृपा है कि तुमने क्षमा कर दिया, लेकिन यह अपमानजनक है कि तुम्हें समकक्ष व्यक्ति नहीं मिला।

तुमने पांच से विवाह किया लेकिन एक भी ऐसा पति नहीं पा सकी, जिसकी हो सको, जिसपर तुम भरोसा और प्यार कर सको। मुझे तुम पर दया आती है कि तुम कभी अर्जुन से प्यार करने से खुद को रोक नहीं सकी। यह जानते हुए भी कि वह तुमसे प्यार नहीं करता और ना ही तुम्हारे प्यार के योग्य है। और मुझे तुम पर दया आती है कि तुम कभी भीम से प्यार नहीं कर पाई, मेरा एकमात्र भाई जिसपर मुझे आज भी गर्व है। यह शर्म की बात है कि ऐसा एक भी पुरूष नहीं है, तुम्हें छूने के लिए जिसने दुशासन के प्राण ले लिए हों, या फिर उससे भी पहले अक्षम्य युधिष्ठिर के। मुझे तुम पर दया आती है कि तुम कभी भी सब कुछ छोड़ कर मेरे पास नहीं आ सकी। अकेली और निडर। क्योंकि तुम मुझे गहराई से जानती थी। जानती थी कि तुम मेरे पास आ सकती थी। कभी भी।

तुम्हें वह सब कुछ मिला जो कभी मुझे भी मिल सकता था। और वह भी जो मुझे कभी नहीं मिल सकता।

और स्वीकार करने के इस क्रम में, मैं तुम्हें यह भी बता दूँ कि मैंने क्यों हमेशा तुमसे ईर्ष्या की है। क्योंकि तुमने अपना जीवन वहां बिताया जहां मैं नहीं बिता सका। क्योंकि ज़रूरत पड़ने पर तुम भीष्म के पैर छूकर उनका आर्शिवाद ले सकती थी और क्योंकि तुम्हारे पास हमेशा रोने के लिए एक कंधा, और सबसे भरोसेमंद दोस्त कृष्ण था।

यह हास्यास्पद है कि हमने एक दूसरे को जीवन में सिर्फ दो बार देखा है। एक बार जब तुमने स्वयंवर में मेरा अपमान किया था, जो पर्याप्त था कि मैं मरने की चाह रखूं। और दूसरी बार जब मैंने तुम्हारे अपमान का उत्तर दिया। बगैर हिले तुम्हें निर्वस्त्र होते हुए देखकर। जब तुम मदद मांगने के लिए मेरी ओर देख रही थी। वह नज़र जो सिर्फ मैं समझ सका था। मुझे खुशी है कि तुमने मुझे विवाह करने योग्य नहीं समझा। मेरे हर दोष और गुणों के प्रतिबिंब को अन्य शरीर, अन्य आत्मा में देखने के लिए मैं तुम्हारे साथ जीवन नहीं बिता सकता था। ‘तुम मुझसे भी ज़्यादा मेरा रूप हो!’ चूंकि मैं स्वयं से प्यार नहीं, करता तो मुझे तुमसे प्यार करने दो। और दूरी बनी रहने दो। दूर रहो, मेरी देवी।

मैं कभी नहीं हो सकता,

तुम्हारा अपना,
कर्ण

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