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उसकी मां ने कभी उसके पिता को नहीं छोड़ा लेकिन इसकी बजाय उन्होंने आत्महत्या कर ली

उन्होंने उसका आत्मविश्वास नष्ट कर दिया लेकिन फिर उसे लगा कि उसके पास कोई विकल्प नहीं है
crying young lady being comforted by another

(पहचान छुपाने के लिए नाम बदल दिए गए हैं)

मेरी मां रोशनी राज ने आत्महत्या कर ली थी, जब मैं 14 वर्ष की थी। वह दो दशकों से मेरे पिता के साथ विवाहित थीं, और लगभग उतने ही समय से चिंता, पैनिक अटैक और अवसाद में रहती थीं और उन्हें नर्वस ब्रेकडाउन का सामना भी करना पड़ा था। उनका जीवन परफेक्ट था – एक स्थिर विवाह, सफल पति जो मेरे लिए अत्यधिक स्नेह करने वाला पिता था – उनका एकमात्र बच्चा, एक सुंदर शहरी घर, इसलिए मानसिक बीमारी की ओर उनके प्रवाह ने हर किसी को परेशान कर दिया था।

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सालों बाद मेरे 18 वें जन्मदिन पर मैंने उनका लॉकर खोला जिसमें कुछ विरासत और उनकी डायरी थी। अंततः मुझे कुछ जवाब मिल गए।
मम्मी कुछ और थी जब वह दशकों पहले पहली बार कॉलेज के उत्सव में मेरे पिता से मिली थीं, जैसा कि उनके चचेरे भाई और दोस्तों ने मुझे बाद में बताया – जीवंत, आत्मविश्वासी, गतिशील और मिलनसार। वह दिल्ली के प्रीमियम कॉलेज का सर्वश्रेष्ठ छात्र था, अपने पूरे विस्तारित परिवार का गौरव और स्थानीय दिलों की धड़कन था। किसी ने भी उम्मीद नहीं की थी कि वह इतनी आसानी से एक छोटे से शहर की लड़की के प्रेम में पागल हो जाएगा।

उनकी दोस्ती पत्रों पर खिल गई थी, फिर फोन कॉल और आखिरकार, जब माँ अपने मास्टर्स के लिए दिल्ली युनिवर्सिटी गई, तो यह एक पूर्णकालिक रोमांस में बदल गया। जैसे ही पापा ने अपनी मास्टर्स की डिग्री प्राप्त की, वह पारिवारिक व्यवसाय में चले गए और अंततः दोनों परिवारों की नाराज़गी के बाद उन्होंने शादी कर ली।

पापा का पारंपरिक परिवार अपनी जाति/समुदाय की कोई लड़की चाहता था; मम्मी के माता-पिता उनके रीति रिवाज़ों और अनुष्ठानों के सख्ती से पालन से भयभीत थे और उन्हें यकीन था कि माँ उसमें फिट नहीं होगी। फिर भी युवा अंधे प्यार की जीत हुई और उन्होंने शादी कर ली।

मेरी दादी भी एक शिक्षित महिला थीं लेकिन पारंपरिक परिवार के लिए उन्होंने अपनी आकांक्षाओं को छोड़ दिया था और अक्सर पापा को कहा करती थी, खासकर जब वह चाहती थी कि उनकी इच्छाओं का पालन किया जाए या संघर्ष/संकट का सामना करने पर – “मैंने तुम्हारे और परिवार के लिए अपने जीवन का बलिदान किया है।“

बाद में जीवन में मुझे एहसास हुआ कि अवचेतन रूप से एक परिपूर्ण पत्नी/बहू के पिताजी के विचार को इस महत्वपूर्ण शब्द -सेक्रिफाइस के साथ आकार दिया गया था। इतने वर्षों में पापा को अपनी माँ से जो भावनात्मक दुर्व्यवहार प्राप्त हुआ था वह वे अवचेतन मन से माँ पर और कभी-कभी मुझपर पास करने लगे।

जहां माँ को अपनी अपीयरेंस/कौशल के बारे में दुनिया से प्रशंसा मिलती थी, वहीं पापा और दादी हमेशा उन्हें नीचा दिखाते थे। मेरी मां के फैसलों की उनके द्वारा हँसी उड़ाई जाती थी या बस वे पूरी तरह से खारिज कर दिए जाते थे, भले ही यह नौकरी करने जैसी महत्त्वपूर्ण बात हो या फिर परदे के रंगों जैसी कोई साधारण सी बात।

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यदा-कदा अगर मम्मी पापा को यह बताने की हिम्मत कर लेती थी कि उन्हें चोट पहुंची है, तो वह कहते थे कि वे ओवररिएक्ट कर रही हैं, इतना ज़्यादा कि मम्मी अपनी संवेदना पर ही संदेह करने लगीं और इसने उनके आत्म मूल्य और आत्मविश्वास को पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया।

कोई दिखाई देने योग्य ज़ख्म नहीं थे लेकिन उनके करीबी लोग उनके व्यक्तित्व में आकस्मिक परिवर्तन को समझ सकते थे। अवसाद के पहले दौरे ने उन्के पोस्ट पार्टम में तकलीफ दी; मैं एक लड़की थी इसलिए पिताजी का परिवार बहुत खुश नहीं था और गैर-सहयोगात्मक था। मेरी और खुद की देखभाल करने के जिए मम्मी को लगभग छोड़ दिया गया था। पिताजी के मानकों के मुताबिक उन्होंने जो भी किया वह गलत या अनुचित था। वह माँ के खराब स्वास्थ्य और नाजुक मानसिक स्थिति का हवाला देते हुए घर और मातृत्व के बारे में सभी निर्णय लेने लगे। माँ अपने घर में एक पराई बन गईं।

हर बाहरी व्यक्ति ने एक प्रेमपूर्ण और देखभाल करने वाले पति/पिता को देखा जो सभी जिम्मेदारी ले रहा था, लेकिन माँ के लिए यह एक जेल की तरह था जहां पिता ने ही नियम बनाए थे और सबकुछ नियंत्रित किया था और मेरी मां उनका पालन करती थीं और अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो उसके लिए दंड था- चुप्पी, कोई अंतरंगता नहीं, और कोई बातचीत नहीं। कुछ समय से मम्मी ने विश्वास, सुरक्षित अंतरंगता और सुरक्षा की सभी भावनाओं को खो दिया। उसने लिखा, “मैं बहुत घबरा गई हूं लेकिन मैं उसे नहीं छोड़ सकती … शायद वह है तो मुझे कोई नुकसान नहीं होगा, शायद …”

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कुछ साल बाद, जैसे ही माँ ने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया, दुःख ने उनकी हालत को और बढ़ा दिया; पापा ने जोर देकर कहा कि उनका पागलपन और बीमारी मेरे और घर के लिए खतरनाक साबित हो रही थी, इसलिए जब मैं 10 वर्ष की थी तो मुझे बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया।

अब तक मम्मी मान चुकी थी कि हमारे जीवन में जो कुछ भी गलत हो रहा था वह उनकी गलती थी – पिताजी की बेवफाई, उनकी मानसिक बीमारी और मेरी बेघरता।

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अब मैं बेघर नहीं हूँ, खुशी से विवाहित हूं, दो खूबसूरत बच्चों की मां हूं और अब मैं पापा से बहुत दूर रहती हूं, जैसा कि मैं हमेशा चाहती थी। मैंने माँ को आत्महत्या की वजह से और पिताजी को जीवन के कारण खो दिया।

उनकी आत्महत्या के लगभग एक दशक बाद तक मैंने अपने खोए बचपन के ज़ख्मों को मिटाने के लिए कड़ी लड़ाई लड़ी। मम्मी को श्रद्धांजलि के रूप में मैं एक छद्म नाम आशा के प्रयोग से भावनात्मक दुर्व्यवहार और घरेलू हिंसा की स्थितियों में अन्य महिलाओं की सहायता के लिए एक ब्लॉग लिखती हूं।

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