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विधवा होने के बाद, उसके माता-पिता भी उसे सामान्य और सुखी देखना नहीं चाहते थे

पति की मौत के बाद समाज ने उसे विधवा का ठप्पा दिया. वो इन रीतियों से बचने के लिए अपने माँ बाप के घर वापस आ गयी. मगर स्तिथि सुधरने के बदले फिर से बिगड़ने लगीं.
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(पिंकी भुयान, जैसा दिपान्निता घोष बिस्वास को बताया गया)

क्या मैं अनौतिक स्त्री हूँ? क्या मैं अपने बेटे के साथ अन्यायपूर्ण रही हूँ? क्या खुश होने और एक ‘सामान्य’ जीवन जीने की इच्छा रखना गलत है? नियती ने मेरे जैसे किसी व्यक्ति के प्रति विशेष रूप से कठोर होना क्यों चुना, जो केवल एक सुरक्षित और आरामदायक जीवन जीना चाहती थी? जब भी मैं अतीत के बारे में सोचती हूँ, अनगिनत प्रश्न मेरे दिमाग को परेशान कर देते हैं, ऐसे प्रश्न जिनका मेरे पास कोई उत्तर नहीं है। मुझे समझ नहीं आता कि मेरे आसपास के लोग, यहां तक कि मेरे माता-पिता भी, मुझे मुस्कुराता हुआ और शांत क्यों नहीं देख सकते हैं। हालांकि कुछ वर्षों पहले ऐसा नहीं था।

हम खुशी से रहते थे – मेरे इंजीनियर पति और छोटा बेटा – लेकिन 19 सितंबर 2013 को मेरी किस्मत में कुछ और ही लिखा था। मुझे इस क्रूर वास्तविकता को स्वीकार करना था कि मेरे पति अब इस दुनिया में नहीं हैं, और वह भी रहस्यमयी परिस्थितियों में। मुझे पता नहीं था कि किस पर भरोसा करूं क्योंकि मुझे लगा कि कुछ ही घंटों में मेरी पूरी दुनिया पलट गई। मैं विधवा बन चुकी थी और उस ठप्पे के साथ वर्जित चीज़ों की पूरी एक सूची मुझ पर थोंप दी गई थी।
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जीन्स, टी-शर्ट, रंगीन कपड़े या आभूषण नहीं पहनना -मुझे उन सभी चीज़ों से दूर रहने के लिए कहा गया जिनमें मैं सहज थी। मैं खुद के लिए खड़े होने की मानसिक अवस्था में नहीं थी और जो भी मुझे कहा गया उसे मैंने चुपचाप स्वीकार कर लिया।

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मेरा दिल मुझे कहता था कि जब मैं अपने माता-पिता के घर चली जाऊंगी तो चीज़ें इतनी बुरी नहीं होंगी। लेकिन मुझे क्या पता था कि एक विधवा के साथ किया गया व्यवहार और उससे रखी जाने वाली अपेक्षाएं वहां भी भिन्न नहीं होंगी।

मैं सामान्यता के लिए तरस रही थी और ज़ोर से हंसना चाहती थी, हर किसी के साथ मस्ती करना चाहती थी, अपने सबसे अच्छे कपड़े पहन कर बाहर जाना चाहती थी, लेकिन मैं अदृश्य सामाजिक बंधनों द्वारा बाध्य कर दी गई थी। जितना ज़्यादा मैं ये सब भूलना चाहती थी, उतना ही मैं खुद को विधवा मानदंडों के जाल में खिंचता हुआ पाती थी।

इन सब के बीच में मेरी बहन का विवाहोत्सव एक स्वागत अंतराल के रूप में आया और मैं जहां भी जाती थी एक बोझिल मुस्कान मेरे पीछे चली आती थी। जल्द ही एक दिन वह मेरे घर मिलने चली आई और हमारी बातचीत ने मुझे भीतर से हिला दिया। उसने मुझे बताया कि उसके ससुराल वाले असहज थे क्योंकि मैं उनके हर शादी समारोहों का एक अभिन्न अंग थी -मुझे पता चला कि उनका एकमात्र प्रश्न यह था कि एक विधवा, विधवा जैसा बर्ताव क्यों नहीं कर रही? वह समाज की मुख्यधारा में शामिल होना क्यों चाहती है?’’

“क्यों नहीं?’’ मैं इन सभी तथाकथित शुभचिंतक और परिवार के सदस्यों से पूछना चाहती हूँ। मुझे कोई कारण नहीं दिखता जिसकी वजह से किसी विधवा को नियमित जीवन जीने या उत्सवों में भाग लेने से रोका जाए।

समाज ऐसी स्त्री का गला घोंटना क्यों चाहता है जो अपना पति खो चुकी है? मुझे ऐसी प्रतिबंधित विचारधारा वाले लोगों और सती की पुरानी परंपरा के बीच कोई अंतर नज़र नहीं आता।

जिंदगी अपने तरीके से जीने का निश्चय करने के बाद, मैंने वे कपड़े फिर से पहनने शुरू कर दिए जिनमें मैं सहज थी और वह खाना खाने लगी जो मुझे पसंद था। परिणामः मेरे माता-पिता ने मौखिक और शारीरिक रूप से मुझे अपमानित करना शुरू कर दिया और मुझे बता दिया कि उनके साथ रहने का मुझे कोई अधिकार नहीं है।

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भावनात्मक और शारीरिक रूप से मैं अकेले लड़ रही हूँ, एक छोटे से बच्चे के साथ जिसे सहयोग की आवश्यकता है। इस राह पर चलना बहुत कठिन रहा है और जब मुझे एक मेरी तरह सोचने वाला और उदार व्यक्ति मिल गया जो स्वेच्छा से मेरा और मेरे बेटे का साथ दे रहा था, तब मुझ पर अनैतिक स्त्री होने का ठप्पा लगा दिया गया। मैंने उससे शक्ति प्राप्त की और देखा कि वह मुझे उन गहरी खाईयों से बाहर निकाल रहा था जिसमें समाज ने मुझे डाला था। जैसी मैं हूँ और जिस तरह मैं अपना जीवन जीना चाहती हूँ, उसके लिए वह मेरा सम्मान करता है और इतना कारण पर्याप्त है कि मैं उसका साथ दूँ।

मैं यह नहीं समझ पाती कि जब ऐसी स्त्री की बात आती है जिसने अपना पति खो दिया है, तो पैमाना इतना पक्षपाती क्यों हो जाता है। यह लगभग ऐसा है जैसे उसने अपनी इच्छा से जीने के हर अधिकार को तुरंत छोड़ दिया हो। तभी जब एक स्त्री अपने भीतर के दानवों से लड़ रही है और अपने पति को खो देने की बात स्वीकार कर रही है, वह खुद को विमुख और अलग-थलग पाती है जिसे समाज सही समझता है। मैं अपना जीवन फिर से शुरू करना चाहती हूँ और मैं ऐसा क्यों ना करूं? मेरी आवश्यकताओं को गलत क्यों समझा जाता है? और ऐसा भेदभाव मेरे अपने लोगों से!

विधवाओं के साथ जुड़ा कलंक कभी-कभी पति को खोने से भी ज़्यादा होता है। जहां हम स्वयं को एक खुली सोच वाला समाज और देश मानकर खुद पर गर्व करते हैं, सच बहुत फीका है। मैं बहुत ज़्यादा नहीं मांग रही हूँ -मेरे लिए खुश रहो, मेरे साथ हंसो, मुझे मेरे जैसा रहने दो।
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