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विश्वास करना मुश्किल है लेकिन शिव और सती का प्यार आज भी प्रासंगिक है

शिव और सती की कहानी विद्रोही प्यार और माता-पिता की बात को अस्वीकार करने का एक क्लासिक मामला है
shiva and sati

शिव पुराण, भागवत पुराण और कालिका पुराण जैसे विभिन्न पुराणों में शिव और सती की कहानी बताई जाती है। जहां हर पुराण थोड़ा अलग संस्करण प्रदान करता है, हम में से अधिकांश कहानी से परिचित हैं।

यह तुम ही हो

दक्ष प्रजापति ब्रह्मा के पुत्रों में से एक है जो पृथ्वी की जनसंख्या बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार है। उनकी 62 बेटियां हैं, जिनका विवाह इसी उद्देश्य के लिए विभिन्न देवताओं से करवा दिया जाता है। सती आदी पराशक्ती हैं -लौकिक स्त्री ऊर्जा का अवतार – जो दक्ष और उसकी पत्नी प्रसूती की पुत्री है। इसी वजह से उसे दक्षायनी भी कहा जाता है। बचपन से ही सती शिव को समर्पित है और किसी अन्य पुरूष से शादी करने के बारे में सोच भी नहीं सकती। जब वह सुंदर युवा स्त्री बन जाती है तब भी वह अपनी भक्ति में अटल रहती है। दक्ष उसे अच्छे से अच्छे राजकुमार और देवता से शादी करने का प्रस्ताव देता है लेकिन सती हठी है। यहां तक कि वह अपने पिता के महल का आराम त्याग देती है और तपस्वी शिव को प्रसन्न करने के लिए योगी में बदल जाती है। अंततः शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न होते हैं और उससे शादी करने के लिए सहमत हो जाते हैं।

जब उल्लासित सती अपने पिता के घर लौटती है, तो वह पाती है कि दक्ष अब भी उसके पति के चयन को लेकर नाखुश है।

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वह ऐसे धूम्रपान करने वाले और यहां वहां भटकने वाले योगी से शादी करने की सहमति नहीं दे सकते जो अक्सर श्मशान के मैदानों में घूमता है और निम्न दर्जे की संगती के साथ रहता है।

हालांकि, जब ब्रह्मा जी स्वयं हस्तक्षेप करते हैं तब दक्ष को मजबूरी में शादी के लिए सहमत होना पड़ता है और शादी बहुत ठाठ-बाट के साथ की जाती है।

जब अहं को चोट लगी

शिव और सती कैलाश जाते हैं और कई वर्षों तक पूर्ण वैवाहिक सुख का आनंद लेते हैं, एक दिन सती एक बड़ी बलि के बारे में सुनती है जिसका आयोजन उसके पिता करने वाले हैं। उसे बहुत दुख होता है कि उसके पति को आमंत्रित नहीं किया गया है, और वह शिव के विरोध के बावजूद अपने पिता से बात करने का फैसला करती है। दक्ष यज्ञ के स्थान पर जब सती शिव के उद्देश्यपूर्ण बहिष्कार का कारण जानने की मांग करती हैं, तो दक्ष उसे बहुत खरी खोटी सुनाता है और शिव और उसके असभ्य तरीकों का सार्वजनिक रूप से बहिष्कार करता है। सती के लिए यह अपमान सहन करना असंभव हो जाता है और अत्यधिक क्रोध और दुख में, वह खुद की बलि दे देती है।

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जब शिव इस बड़ी त्रासदी के बारे में सुनते हैं, तो वह वीरभद्र और उसके गणों के क्रोध को उनमुक्त कर देते हैं, जो यज्ञ को नष्ट और भंग कर देते हैं। फिर वे सती के झुलसे हुए मृत शरीर को उठाते हैं, और दुख के साथ तीनों दुनिया में घूमते रहते हैं। जब विष्णु देखते हैं कि दुनिया विनाश की कगार पर है, तो वह अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर देते हैं, ताकि शिव इस अवस्था से बाहर निकले। सती के शरीर के हिस्से पृथ्वी पर गिरते हैं और शक्तिपीठ बन जाते हैं; शिव शांत हो जाते हैं और दक्ष के साथ झगड़ा समाप्त कर लेते हैं। वह अपने ससुर के धड़ पर एक राम का सिर लगा लेते हैं और यज्ञ पूरी तरह संपन्न हो जाता है, और विश्व में शांति बहाल हो जाती है।

आज भी प्रासंगिक है

अधिकांश पौराणिक कहानियों की तरह, मुख्य जोड़े की यह कहानी अर्थ के साथ लेयर्ड है। अन्य चीज़ों में व्यक्ति कुछ पुरातन व्यक्तित्व और रिश्तों को देखता है, जो हमारे आसपास की दुनिया में आसानी से पाए जाते हैं।

ब्रह्मा के पुत्र के रूप में दक्ष प्रजापति कुलपति का प्रतिनिधित्व करता है जो रीति-रिवाज़ का तरफदार है – हिंदी फिल्मों के खडूस बाप की तरह। सती लाड़ प्यार में पली राजकुमारी है और पहले की यशराज फिल्मों की नायिका की तरह, वह सुंदर और अच्छी है। लेकिन समृद्ध लड़की को ना केवल गरीब लड़के से प्यार हो जाता है, बल्कि वह हर तरीके से पथभ्रष्ट भी है।

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कौन सा राजा/ पिता अपनी राजकुमारी/ बेटी को एक धूम्रपान करने वाले कंगाल से शादी करने की अनुमति देगा?

लेकिन प्यार तो प्यार होता है और विद्रोह उत्पन्न हो जाता है जिसमें घर छोड़ना और अस्वीकृति के बावजूद शादी करना शामिल है।

अनिच्छुक पिता मान ज़रूर जाता है पर बेमन से। वह यह दिखाने का पहला मौका गंवाता नहीं है कि बॉस कौन है, लेकिन परिणाम विनाशकारी हैं।

व्यक्तित्व के मामले में दक्ष, सती और शिव एक दूसरे से बहुत अलग हैं और जब साथ आते हैं तो परिणामस्वरूप टकराव होता है। दक्ष चीज़ों के आयोजन में गर्व का प्रतिनिधित्व करता है। सती रचनात्मक सिद्धांत है, जबकि शिव विघटन की शक्ति के साथ स्पेक्ट्रम के विपरीत छोर पर है। साथ में, ये यिन और यांग की तरह हैं, जिन्हें सृजन के पहियों की गति को स्थापित करने के लिए एक साथ आना होता है।

रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

अहंकार खत्म होना चाहिए

जब दक्ष सती को अपमानित करता है और शक्ति मृत हो जाती हैं, तब शिव की विनाशकारी शक्ति सही ढंग से प्रदर्शित होती है। इसके अलावा, दक्ष का सिर काटना अहंकार के विनाश का प्रतीक है। विपरीत प्रतीत होने वाले विचारों की सुलह केवल अहंकार को मिटा कर ही की जा सकती है। संयोग से, सती या शक्ति को माया के समान भी माना जाता है – प्रकृति की मायावी शक्ति। माया के भगवान (पिता) के रूप में दक्ष का अहंकार आसानी से जुड़ा हुआ है, जबकि विलग योगी शिव पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता है। एक पारंपरिक सामाजिक ढांचे के भीतर दो पूरी तरह से विपरीत व्यक्तित्वों के बीच प्यार होना संभव तो है लेकिन कठिन है। और अगर ऐसे रिश्ते को सफल होना है, तो व्यक्ति को या तो उसका अहंकार हटाना होगा या फिर यह रिश्ता आग में भस्म हो जाएगा।

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