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वह प्यार में पागल हो गई थी और ना सुनने के लिए तैयार नहीं थी

वह सामान्य रूप से छेड़छाड़ करता था लेकिन वह उसके प्यार में पागल हो गई थी
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(पहचान सुरक्षित रखने के लिए नाम बदल दिए गए हैं)

मीनू सिंह ने 1995 में अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण की और गुड़गांव में एक कॉल सेंटर में नौकरी करने लगी। मुझे आज भी वह दिन याद है जब वह अपने चेहरे पर सुंदर मुस्कुराहट लिए घर आई थी, खुशी से चमकते हुए और आँखों में दूरदृष्टि लिए। वह कार्य पर उसके पर्यवेक्षक तापोष सेन के बारे में मुझे बताने के लिए उत्साहित थी।

“ऐसा लगता है वह मुझे बहुत प्यार करता है,’’ उसने मुझे बताया।

“तुम्हें यह कैसे पता?’’ मैंने उससे पूछा। ‘‘क्या उसने तुमसे कुछ कहा या तुम सिर्फ अनुमान लगा रही हो?’’

“हाँ, उसने मुझे बताया कि मैं सुंदर हूँ,’’ जब वह बोली उसकी आँखों में चमक थी।

मैं उसके लिए खुश थी लेकिन निश्चित नहीं थी की तापोष की टिप्पणी का जो अर्थ उसने निकाला था वह सही था या नहीं। वह हमेशा चार दिवारी के भीतर रही थी। वह कभी घर से बाहर नहीं निकली थी, उसने लड़कियों के स्कूल में पढ़ाई की थी, लड़कों के साथ कभी प्रत्यक्ष बातचीत नहीं की थी, जिसकी वजह से वह ‘छेड़छाड़’ (फ्लर्टिंग) से अनभिज्ञ थी।
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तापोष की टिप्पणी ने उसके दिल में एक लहर पैदा कर दी; वह उससे प्यार कर बैठी, जबकि तापोष का ऐसा कोई इरादा नहीं था। वह उससे शादी करने का सपना देख रही थी और ज़ाहिर है कि तापोष को उसकी मनोदशा के बारे में कोई अंदाज़ा नहीं था।

यह उसकी पहली नौकरी थी और वह पहली बार ऐसी जगह पर थी जहाँ पुरूष और स्त्रियाँ साथ में काम करते थे। उसे पता नहीं था कि इस तरह की जगहों पर लोगों का एक-दूसरे को ऐसी टिप्पणी करना सामान्य था, भले ही वह ऐसा मानते ना हों।

वह अपने सपनो का संसार बना रही थी जहां वह और तापोष हमेशा सुखी रहते थे।

कुछ हफ्तों बाद तापोष के साथ कुछ कप कॉफीयों के दौरान उसे पता चला कि तापोष विवाहित था और उसके दो बच्चे थे। वह सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। वह आखों में आँसू लिए घर आई और उसने मुझे और अन्य दोस्तों को अपनी दुर्दशा सुनाई।

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हमने उसे दिलासा देने की कोशिश की लेकिन वह कहती रही कि वह उससे शादी करना चाहती है और वह हार नहीं मानेगी। हमारी चिंता बढ़ गई क्योंकि वह दोहराती रही कि वह उसे शादी करने के लिए मना लेगी। हमने उसे कहा कि ऐसा होना असंभव है, क्योंकि ज़ाहिर है कि उसके प्रति तापोष का ऐसा कोई इरादा या ऐसी कोई भावना नहीं थी, ना ही उसे अंदाज़ा था कि वह कैसा महसूस कर रही है।

उसने अपने माता-पिता को बताया, यह कहते हुए कि तापोष को मनाने में उसकी मदद करें। उसके माता-पिता को झटका लगा था। वे विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि उन्होंने अभी-अभी क्या सुना था। उनकी बेटी अपने आपे में नहीं थी।

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अगली सुबह वह ऑफिस में तापोष से लड़ रही थी, यह कहते हुए कि वह उससे शादी कर ले। उसने उसे बताया कि उसके मन में उसके लिए कोई भावना नहीं है और उसने उसे जो भी शब्द कहें होंगे वे कोई मायने नहीं रखते क्योंकि वह अपने विवाह में सुखी था। वह चाहती थी कि वह अपनी पत्नी को तलाक देकर उससे शादी कर ले; वह सीधे सोचने की अपनी क्षमता खो रही थी।

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तापोष को उसी ऑफिस में काम करना मुश्किल लग रहा था, इसलिए उसने अपने परिवार के साथ रहने के लिए अपने गृहनगर में स्थानांतरण के लिए आवेदन दे दिया। मीनू ने अपनी नौकरी तो छोड़ दी लेकिन तापोष को नहीं छोड़ सकी।

उसने उसका संपर्क विवरण ढूँढ निकाला और उससे शादी करने के लिए उसे मनाने की कोशिश की। उसने अपने पुराने सहकर्मियों से बात की और तापोष को मनाने में उनकी मदद मांगी। उसके अनुरोध ने सबको हैरान कर दिया।

उसके माता-पिता ने उसे एक मनोचिकित्सक के पास ले जाने का फैसला किया। कई परामर्श सत्र बीत गए लेकिन मीनू ने ठीक नहीं होने की ठान रखी थी।

सप्ताह और महीने बीत गए लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने तापोष की पत्नी को फोन करके धमकाना शुरू कर दिया। उसके कुछ मित्रों ने और मैंने उसे सच्चाई दिखाने की कोशिश की लेकिन उसे तापोष से शादी करने के विचार की धुन लग गई थी और उसपर पागलपन सवार हो चुका था।

उसे सलाह देने वाले हर व्यक्ति को वह दुश्मन ठहरा देती थी और संबंध खत्म कर देती थी। उसके माता-पिता उसके सबसे बुरे शत्रु प्रतीत होते थे। वह अपने व्यवहार से स्वयं को पागलपन की ओर ले जा रही थी; उसके चिल्लाने और रोने, अपने आसपास के सभी लोगों को बद्दुआ और गाली देने से उसका घर उजड़ गया था। उसके माता-पिता की स्थिति दयनीय थी और उसके पड़ोसियों की भी जिन्हें उसके चिल्लाने को दिन भर सुनना पड़ता था।

मैंने भी उनके घर जाना बंद कर दिया। कई साल बीत चुके हैं लेकिन उसका पागलपन उसका दूसरा स्वभाव बन चुका है और उसका घर एक जीता जागता नरक बन चुका है। उसके माता-पिता ने उसकी मदद करने के लिए अपनी क्षमता के अनुसार सबकुछ करने की कोशिश की है लेकिन उसने साथ नहीं दिया।

कुछ वर्षों बाद मैंने उसके घर जाने और यह पूछने की कोशिश की कि क्या वह मेरे ऑफिस में नौकरी करना चाहेगी। उसने इसे अपना अपमान समझा और उल्टा मुझे ही अपशब्द कहने लगी।

क्या तुम्हें लगता है मैं फिर से ऐसी जगह काम करने जाऊंगी जहां लोग आपको नष्ट करते हैं? क्या तुम्हें पता है पुरूष कैसे होते हैं? पुरूष घटिया होते हैं! मेरे घर से निकल जाओ और कभी वापस मत आना,’’ वह चिल्लाई।

उसके माता-पिता ने क्षमाप्रार्थी के रूप में मुझे देखा। मुझे उनके लिए खेद महसूस हुआ, क्योंकि तापोष की सामान्य छेड़छाड़ का कहर वे लोग भुगत रहे हैं। वह तो एक सुखी जीवन जी रहा होगा, यह जानता तक नहीं होगा कि वे किस दुःख से गुज़र रहे हैं।
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