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वह वांछित महसूस करती है

डाक्टर ने बताया कि वह ज़्यादा समय तक नहीं जी सकेगी लेकिन उसका पति उससे प्यार करता था...
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(जैसा रक्षा भराड़िया को बताया गया)

उसे बिमारी थी और डॉक्टरों ने कहा कि वह बहुत ज़्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह पाएगी

49 की उम्र में जब वह अपने विस्तारित परिवार के साथ अपने गृहनगर, राजस्थान के एक छोटे से गांव लक्ष्मणगढ़ में छुट्टियां मना रही थी, उसे बहुत बड़ा मस्तिष्क का दौरा पड़ा। डॉक्टरों को लगा कि यह माइग्रेन अटैक है और दो दिनों तक वह तीव्र दर्द में रही, जो केवल उच्च शक्ति वाले पेनकिलर्स के साथ सहनशील हो पा रहा था, जो हर पांच घंटों में दिए जा रहे थे। चूंकि उनके परिवार के दोनों तरफ ब्रेन हैमरेज का कोई इतिहास नहीं रहा है, तो वहां इकट्ठा हुए 40 लोगों में से एक ने भी नहीं सोचा कि यह ब्रेन हैमरेज जैसी कोई गंभीर चीज़ होगी। जब तीसरी सुबह भी वह उतने ही भयंकर सिरदर्द के साथ जागी, महेश ने उन दोनों का सामान पैक किया और जयपुर के निकल गया ताकि वे कोलकाता की फ्लाइट पकड़ सकें। यात्रा के दौरान उसकी स्थिति और खराब हो गई और कोलकाता एयरपोर्ट पर उसे एयरक्राफ्ट में से एक स्ट्रेचर पर बाहर ले जाना पड़ा।
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उसे सीधे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टर ने घोषित कर दिया कि वह बड़ा ब्रेन हैमरेज है। अगली सुबह उसने पैरालिटिक स्ट्रोक का सामना किया जिससे उसका पूरा बांया भाग गतिहीन हो गया। उसने अपने बोलने की शक्ति और अपने दाहिने भाग का उपयोग खो दिया; उसके मस्तिष्क का 30 प्रतिशत भाग ब्लेकआउट हो गया था। डाक्टरों ने उसके जीवित रहने की संभावना को 20 प्रतिशत से भी कम बताया था।

अगले दो महीने कोलकाता के वुडलैंड्स नर्सिंग होम में बिताए गए। वह चुपचाप बाधाओं से जूझती रही और उसने हर दौर जीत लिया। इन दो महीनो में महेश ने अपना ज़्यादातर समय आइसीयू के बाहर बिताया। उसे वापस घर लाया गया और इसी के साथ उपचार की श्रृंखला शुरू हुईः फिज़ीयोथेरेपी, स्पीच थेरेपी, परामर्श और कई अन्य। उनका बेडरूम एडजेस्टेबल बेड और सभी निगरानी उपकरणों के साथ एक आईसीयू सुविधा जैसा दिखने लगा।

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यह छोटे कदमों से शुरू हुआ

उसने चार महीने और सात दिनों के बाद अपना पहला कदम उठाया और उसका पहला शब्द ‘राम’ था जो वह प्यार से अपने पति को बुलाया करती थी। चीज़ें उज्ज्वल दिखने लगीं, थेरेपी के प्रयासों ने परिणाम दिखाना शुरू कर दिया। वह 6-7 शब्दों को एक साथ पिरोने लगी थी, जिसने बातचीत करने में उसकी सहायता की। एक बार तो उसने शब्दों को तोड़े बगैर एक पूरी लाइन भी गुनगुनाई। मानव मस्तिष्क चमत्कार है; जहां हम बायें मस्तिष्क से सुनते हैं, वहीं संगीत दायीं ओर संसाधित होता है और इसलिए वह बोलने की तुलना में बेहतर ढंग से गुनगुना सकती थी।

लेकिन दुर्भाग्य से, स्ट्रोक के छः महीने बाद किए गए अगले एमआरआई में, उसके मस्तिष्क में एक और एन्येरिज़म मिला जिसे सर्जिकली हटाने की ज़रूरत थी। पंसदीदा विकल्प मुंबई था। उसे परिवार और विस्तरित परिवार, जिन्होंने फ्लाइट की तीन पूरी पंक्तियां भर दी थीं, उनके साथ मुंबई ले जाया गया। बिमला सबकी लाड़ली थी।

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उसकी सर्जरी हुई

सर्जरी में करीब छह घंटे लगे। सर्जन ने उसे बताया, ‘‘ऑपरेशन भी एक प्रकार की चोट है, हालांकि यह नियंत्रित है। हालांकि हमने इनका एन्येरिज़म हटा दिया है, लेकिन बहुत ज़्यादा क्षति हुई है।” फिर उसने जोड़ा, ‘‘मिस्टर किल्ला, मेरा अनुभव है कि ऐसे रोगी बहुत ज़्यादा समय तक जीवित नहीं रह पाते, शायद ज़्यादा ये ज़्यादा दो से तीन साल तक। आप देखिए, अपनी स्पीच और अंगों के उपयोग में इन्होंने जो भी प्रगति की थी वह जा चुकी है। इस मायने में यह वापस शून्य पर पहुंच चुकी हैं।”

“अपनी बोलने की शक्ति फिर से खोने के बाद, वह बहुत ज़्यादा फ्रस्टेट हो जाती थी और हर छोटी चीज़ के लिए दूसरों की समझ पर निर्भर थी। शुरू में ऐसे रोगियों के परिवार के सदस्य अत्यधिक देखभाल करते हैं, लेकिन समय के साथ उनकी रूचि भी खत्म हो जाती है और मरीज हायर्ड हेल्प के भरोसे रह जाते हैं। तब वे ‘अवांछित’ महसूस करने लगते हैं और जीवन से विथड्रॉ करने लगते हैं।”

महेश ने उत्तर दिया, ‘‘मेरी पत्नी के साथ इसमें से कुछ भी नहीं होगा।” मुझे अब भी डॉक्टर की वह मुस्कान याद है जिसका अर्थ था, ‘‘मैं आपके प्यार की सराहना करता हूँ मिस्टर किल्ला लेकिन जीवन ऐसा ही है।”

यह 21 वर्ष पहले की बात है

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वह बच गई क्योंकि उसे प्यार मिला

बिमला हमारे साथ ही है; खुश, वांछित और संतुष्ट और हाँ वह बहुत ज़्यादा शब्दों में बातचीत नहीं कर पाती लेकिन वह और हम मैनेज कर लेते हैं। बेशक डॉक्टर अपने अधिकांश अनुमानों में सही था। वह तीन से ज़्यादा शब्द साथ में नहीं बोल पाती, उसका दायां हाथ पेरेलाइज़ होने के कारण वह निश्चित रूप से लिख कर अपने आप को व्यक्त नहीं कर सकती, उसे अपने बुनियादी काम करने के लिए 24 घंटों के लिए किसी की मदद की ज़रूरत होती है, और दिन में 20 से ज़्यादा गोलियां खानी होती है, जिसके कारण वह अक्सर चिड़चिड़ाहट और नींद महसूस करती है। लेकिन महेश ने उसे जीवन से विथड्रॉ नहीं करने दिया।

वे अपनी मॉर्निंग वॉक के लिए साथ में ड्राइव कर के पार्क में जाते हैं, हालांकि वह नर्स के साथ 750 मीटर प्रतिघंटे की गति से चलती है और वह उतने ही समय में लगभग छह किलोमीटर चल लेता है। वे हर शाम क्लब जाते हैं और आठ बजे डिनर के लिए घर लौट आते हैं, जिसके बाद वे सोने से पहले अपने पसंदीदा टीवी शो देखते हैं। बिमला की बिमारी के 21 वर्षों में, उसका पति सिर्फ तीन दिन के लिए दूर रहा है। लेकिन मेरा मतलब यह नहीं है कि वह उसके साथ अपना धैर्य नहीं खोता है, निराश नहीं होता है और कभी आशा नहीं छोड़ता है। हां, वह यह सब करता है और फिर भी, वह अपने प्यार के साथ जो रचता है वह इन छोटे चरणों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली है।

उसे वांछित महसूस करवाना

मुझे याद है जब मैं उनसे मिलने कोलकाता गई थी। सुबह के छह बजे थे और उन्होंने उनका मेडिटेशन खत्म ही किया था। मैंने देखा कि वह बहुत मुश्किल से खड़ी हुई और उस सोफे के पीछे खड़ी हो गई जिसपर उसका पति बैठा था। उसके पति ने फेस क्रीम का डिब्बा खोला और हाथ उपर किया ताकि बिमला उस तक पहुंच सके। बिमला ने उसमें से थोड़े लंप उठाए और थोड़ी मात्रा में अपने पति के गाल, माथे, ठुड्डी और नाक पर लगाए। फिर उसके पति ने डिब्बा नीचे कर लिया, उसे बंद कर दिया और सोफे पर अपना सिर टिका दिया। मालिश पूरे पांच मिनट तक चली। जिसके बाद नर्स ने एक गीला रूई का फाहा रखा और बिमला ने उस से उसका चेहरा पोंछ दिया। इस सब के दौरान वह गुनगुनाती रही।

जब उसका काम पूरा हो गया तो उसने बस दो शब्द कहे, ‘हो गया’। उसने अपनी आँखे खोली, मेरी ओर देखा, आँख मारी और कहा, ‘‘अब तुम्हें इस ग्लो का राज़ पता चला? यह इस फेशियल की वजह से है जो तुम्हारी मम्मी मुझे हर सुबह करके देती है!’’ वह मेरी ओर देख कर मुस्कुराई और मुझसे पूछा, ‘तुझे लगा दूं?’

बेशक मुझे भी कोलकाता में अपने आवास के दिनों में हर दिन यह विशेष फेशियल प्राप्त हुआ। मैंने कहीं पढ़ा था कि भोजन, पानी और हवा कि तरह हमारी एक और बुनियादी आवश्यकता होती है, जिसके बिना हम सभी मुरझा जाते हैं और मर जाते हैं….वांछित होने की ज़रूरत।

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मैंने कहीं पढ़ा था कि भोजन, पानी और हवा कि तरह हमारी एक और बुनियादी आवश्यकता होती है, जिसके बिना हम सभी मुरझा जाते हैं और मर जाते हैं….वांछित होने की ज़रूरत।

इन वर्षों में एक पल के लिए भी बिमला को अवांछित महसूस नहीं हुआ।

प्रिय डॉक्टर, हाँ ‘जीवन ऐसा ही है’ और फिर भी हर थोड़े समय में कोई हमारे साथ आता है, हमारी सीमा को आगे बढ़ाता है और हमारी समझ को फिर से परिभाषित कर देता है।[/restrict]

 

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