वो अब शादीशुदा नहीं, मगर… आज़ाद है

Priya Chaphekar
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(प्रिया चेपेकर को कथित)

हम दोनों दस सालों से विवाहित थे, और अक्सर विवाहित दम्पत्तियों के लिए एक मिसाल थे. जब कौशिक और मैं एक साथ होते थे तो लोग हमें देख कर रश्क़ करते थे. मुझे याद है कैसे तत्परता से कौशिक ने अपना हाथ देकर मुझे रॉक क्लाइम्बिंग करते एक पल में मुझे सहारा दिया था और कैसे हमेशा अपनी ऑफिस पार्टिओं में उसकी एक आँख हमेशा मुझ पर होती थी कि कहीं मैं अकेली या परेशां तो नहीं. ऐसे पार्टिओं में अक्सर पुरुष अपने ऑफिस के सहकर्मिओ के साथ गपशप मैं अपनी पत्नियों को अनदेखा कर देते हैं. मगर कौशिक उनसा नहीं था. मेरी ड्रिंक या प्लेट खाली होने से पहले ही वो तुरंत आ जाता था उन्हें भरने. हम अकेले हों या भीड़ में, कौशिक को मुझे खाना खिलाने में कभी कोई झिझक नहीं होती थी. मैं भी कुछ पीछे नहीं थी. मेरी इंस्ट्राग्राम की वाल पर प्यार और रिश्तों की कविताओं का खज़ाना था, और हर कविता मेरे प्रिय कौशिक को ही समर्पित होती थी. मुझसे लोग अक्सर पूछते कि मुझे ऐसे खूबसूरत छंद और रूपक कैसे लिखे जाते हैं. मैं ज़्यादातर चुप रहती या समझाने की कोशिश करती कि जब आप प्यार में सरोबार होते हो, तब शब्द अनायास ही उतर आते हैं कलम से, बिना किसी ज़ोर ज़बरदस्ती किये.

और फिर सब बिखरने लगा

और बस तब जब दुनिया को हमें देख कर जन्म जन्मांतर वाले प्यार पर भरोसा होने लगा था, हमारी खुद की कश्ती डगमगाने लगी.

यह सब शुरू हुआ साल २०१५ मैं जब कौशिक को नौकरी के सिलसिले में इधर उधर काफी शहरों में जाना शुरू करना पड़ा. शुरू शुरू में यूं दूर होना, बेसब्री से वापसी का इंतज़ार करना, सब कुछ अच्छा और नया लग रहा था.. मगर कुछ दिनों में ही इस जीवन शैली से मन ऊबने लगा. यूं तो कौशिक की गैरमौजूदगी में मेरी अपनी नौकरी थी, मेरे दोस्त थे जिनके साथ मैं शहर में होने वाले कई कार्यक्रम अब देख पाती थी, मगर कुछ था जिसका अभाव था. एक उत्तेजित स्पर्श की कमी महसूस होती थी मुझे. एक दुसरे को प्यार और सेक्सयूअल रंगो से सरोबार मैसेज करते, एक दुसरे को अपनी उत्तेजक चित्र भेजते, मगर ये सब शुरुवात में था. धीरे धीरे अब मैसेज “खाना खाया?” “मुझे आने में देर हो जाएगी” या “गुड नाईट प्रिय” से आगे बढ़ना बंद हो गए.

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मुझे उसकी तरफ से होने वाले द्वन्द का एहसास हो रहा था और मैंने भरपूर कोशिशें की यह पता करने की कि आखिर उसके मन में क्या है. मैं कभी उसके साथ उसके व्यावसायिक टूर पे उसके साथ हो लेती या फिर कभी ड्रिंक्स के बहाने उसे खींच बाहर ले जाती. इतना कुछ कर के भी मैं उसकी तरफ से आते उस विरक्त व्यवहार का कुछ ओर छोर नहीं ले पा रही थी. या तो आर्थिक तंगी थी या फिर इतना दूर रहने का नतीजा, हम दोनों कुछ ही महीनो में काफी बदल गए थे. यूँ तो वो महीने में दो तीन रविवार मेरे साथ ही होता था, मगर पास नहीं था. वो या तो नेटफ्लिक्स पर कोई फिल्म देख रहा होता, या फिर सोता, या दोस्तों के साथ कहीं सैर का प्रोग्राम ही बना लेता. और जब मैं उसके इस व्यवहार की आलोचना करती तो वो खीज जाता, और क्रोधित भी हो जाता था.

यह वही कौशिक था, जो कुछ महीनो पहले तक हर छुट्टी मेरे साथ मज़े करता था. हम सुबह सुबह किसी पारसी होटल में नाश्ते को निकल पड़ते, या यूँ ही मरीन ड्राइव की रेत अपने पैर में लपेट दिन गुज़र देते, या जिम ही चले जाते, कुछ भी करते मगर साथ होते थे. यह नया कौशिक बहुत उदासीन था, और बोरिंग भी.यह सब शुरू हुआ साल २०१५ मैं जब कौशिक को नौकरी के सिलसिले में इधर उधर काफी शहरों में जाना शुरू करना पड़ा. शुरू शुरू में यूं दूर होना, बेसब्री से वापसी का इंतज़ार करना, सब कुछ अच्छा और नया लग रहा था.. यह सब शुरू हुआ साल २०१५ मैं जब कौशिक को नौकरी के सिलसिले में इधर उधर काफी शहरों में जाना शुरू करना पड़ा. शुरू शुरू में यूं दूर होना, बेसब्री से वापसी का इंतज़ार करना, सब कुछ अच्छा और नया लग रहा था.. मगर कुछ दिनों में ही इस जीवन शैली से मन ऊबने लगा. यूं तो कौशिक की गैरमौजूदगी में मेरी अपनी नौकरी थी, मेरे दोस्त थे जिनके साथ मैं शहर में होने वाले कई कार्यक्रम अब देख पाती थी, कुछ था जिसका अभाव था. एक उत्तेजित स्पर्श की कमी महसूस होती थी मुझे.

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एक दुसरे को प्यार और सेक्सयूअल रंगो से सरोबार मैसेज करते, एक दुसरे को अपनी उत्तेजक चित्र भेजते, मगर ये सब शुरुवात में था. धीरे धीरे अब मैसेज “खाना खाया?” “मुझे आने में देर हो जाएगी” या “गुड नाईट प्रिय” से आगे बढ़ना बंद हो गए.

मुझे उसकी तरफ से होने वाले द्वन्द का एहसास हो रहा था और मैंने भरपूर कोशिशें की यह पता करने की कि आखिर उसके मन में क्या है. मैं कभी उसके साथ उसके व्यावसायिक टूर पे उसके साथ हो लेती या फिर कभी ड्रिंक्स के बहाने उसे खींच बाहर ले जाती. इतना कुछ कर के भी मैं उसकी तरफ से आते उस विरक्त व्यवहार का कुछ ओर छोर नहीं ले पा रही थी. या तो आर्थिक तंगी थी या फिर इतना दूर रहने का नतीजा, हम दोनों कुछ ही महीनो में काफी बदल गए थे. यूँ तो वो महीने में दो तीन रविवार मेरे साथ ही होता था, मगर पास नहीं था. वो या तो नेटफ्लिक्स पर कोई फिल्म देख रहा होता, या फिर सोता, या दोस्तों के साथ कहीं सैर का प्रोग्राम ही बना लेता. और जब मैं उसके इस व्यवहार की आलोचना करती तो वो खीज जाता, और क्रोधित भी हो जाता था.

यह वही कौशिक था, जो कुछ महीनो पहले तक हर छुट्टी मेरे साथ मज़े करता था. हम सुबह सुबह किसी पारसी होटल में नाश्ते को निकल पड़ते, या यूँ ही मरीन ड्राइव की रेत अपने पारो पैरो पैर लपेट दिन गुज़र देते, या जिम ही चले जाते, कुछ भी करते मगर साथ होते थे. यह नया कौशिक बहुत उदासीन था, और बोरिंग भी.

मैंने अपने दिन अपने लिए ढाल लिए

जब मैंने देखा की चीज़ें बद से बदतर होने लगी हैं, मैंने अपनी जीवन शैली थोड़ी सी बदल ली. मैं अपने खुद के प्लान्स बनाने लगी. मैं कौशिक को यह नहीं जताना चाहती थी कि मैं उसे छोड़ कर कहीं जा रही हूँ, मगर साथ ही साथ अपने सप्ताहांत घर में फिल्मे देखते नहीं बिताना चाहती थी. ऐसे ही एक रविवार एक कविता की कक्षा में मैं ऋषभ से टकराई. ऋषभ और मैं कॉलेज में बहुत अच्छे दोस्त थे और हम सब कुछ साझे में करते थे — बातों से ले कर टिफ़िन तक. ऋषभ मेरा पिता, मेरा भाई, मेरा बॉयफ्रेंड, सब बन गया था और यह सारे किरदार बड़ी ही बखूबी से निभाता था. हमारे दोस्तों को तो यकीन था की हम दोनों आगे जाकर एक हो ही जायेंगे, मगर मैं तो ढूंढ रही थी एक समझदार, गंभीर, सफल और धनी जीवनसाथी. तो मुझे कौशिक मिल गया और ऋषभ ध्वनि इंजीनियरिंग के कोर्स के लिए अमेरिका चला गया.

और फिर मैंने वह कर ही लिया

सिल्विया प्लाथ ने सच ही कहा है की जो चीज़ हमें सबसे ज़्यादा हानि पहुंचने की क्षमता रखती है, उसके प्रति हमारा आकर्षण भी सबसे अधिक ही होता है. इतने वर्षों बाद ऋषभ से मिली तो हमारी मुलाकातें बढ़ने लगी. वो मेरे ही शहर में था तो हम अक्सर डिनर पर मिलने लगे. अच्छा लगने लगा भागते दौड़ते दिन के बाद किसी करीबी दोस्त को बैठ कर सारे मन की भड़ास निकालना. बस ऐसे ही एक शाम चीज़ और वाइन की चुस्कियों के बीच ऋषभ ने मुझे बहुत ही भावपूर्ण चुम्बन दिया. मैं आज भी जब उस किस को याद करती हूँ तो अधर काँप जाते हैं, सीने में एक खिचाव सा महसूस होता है और एक अजीब सी सनसनाहट पूरे शरीर को गुदगुदा देती है. उस रात अपने सबसे प्रिय मित्र के सामने नग्न होते मुझे कोई शर्म नहीं महसूस हुई. मुझे पता था की मेरा यह मित्र मुझे कई सालों से प्यार करता आया है. उस रात जब उसके होंठ मेरे शरीर के एक एक अंग को अपनी भावनाओं से सरोबार कर रहे थे, मुझे लगा की मैं कोई काम देवी हूँ. उस रात, उसके आलिंगन में मेरी अंतरात्मा तक जी उठी.

मैंने उसे सब सच बता दिया

अगली सुबह मैंने कुछ फैसला किया. मैंने कौशिक को एक लम्बा मेल लिखा जिसमे मैंने उसे सब कुछ सच सच बता दिया. उस एक मेल से मैंने अपनी और कौशिक की बनाई उस ख़ूबसूरत दुनिया को एक सेंड के बटन के साथ ही धराशाई कर दिया. मैं इतनी बड़ी बात खुद तक नहीं रख सकती थी. ऐसा नहीं है की मुझे ऋषभ के साथ अपनी आगे की ज़िन्दगी बितानी थी मगर हाँ, कहीं भी रहूँ इस झूठ के साथ तो मुझे बिलकुल नहीं जीना था. मैंने जहाँ एक तरफ अपने पति को सारी सच्चाई बताई, वही मैंने ऐसे कोई वायदे नहीं किये कि जो हुआ, वह फिर नहीं होगा. यह सब लिख कर, भेज कर मन बहुत हल्का और उन्मुक्त लगा.

मेरा मानना है की हम सभी लोगों ने भावनात्मक या शारीरिक स्तर पर कभी न कभी तो बेवफाई की है. और सोशल मीडिया ने हमें अपने चाहने वालों के और करीब होना काफी आसान कर दिया है.

कौशिक और उसके परिवार ने मुझे सच्चाई सुनने के बाद बेदखल कर दिया. मगर इसके बाद भी मैं बिलकुल परेशां नहीं हुई. बीती बातो के बाद मैं सबसे इतना दूर हो चुकी थी की उनके इस फैसले से मुझे कोई ख़ास बुरा नहीं लगा. बस मुझे एक बात याद थी कि अब मैं फिर से आज़ाद हूँ, सीमाहीन उन्मुक्त आज़ाद. अब मुझे एक अवसाद में घिरी अतृप्त पत्नी बन कर रहने की कोई ज़रुरत नहीं थी.

आप हमें बताइये कि अगर आप काइरा कि परिस्तिथि में होते तो क्या करते…

मैं अकेली हूँ और 35 तक इंतज़ार करने के लिए तत्पर हूँ

मेरी पत्नी ने मुझे 40 साल बाद छोड़ दिया और मैं उसके लिए खुश हूँ

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